उत्तर प्रदेश : खदान मजदूरों की हुंकार, खदानों से बढ़ते प्रदूषण और बढ़ते मशीनीकरण पर तत्काल लगे रोक

मिर्ज़ापुर, (उत्तर प्रदेश)। खनन क्षेत्रों में तेजी के साथ बढ़ते प्रदूषण और मशीनीकरण पर खदान मजदूरों ने चिंता जताई है। पिछले दिनों मिर्ज़ापुर जिले के अहरौरा गांव में जुटे खदान मजदूरों ने खदान मजदुर यूनियन के जिला सम्मेलन के दौरान श्रमिक हितों के लिए संघर्षरत मजदूर नेताओं के समक्ष हुंकार भरी।

सम्मेलन में आए मैग्सेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय ने मजदूरों के शोषण, उपेक्षा तथा शोषणकारी नीतियों को बड़ी समस्या ठहराते हुए कुंद होती मजदूरों की हितकारी आवाज को दबाने की कुचेष्टा बताया और कहा मजदूर इस देश का असल भाग्यविधाता है, किसान और कामगारों की आवाज को कुचल कर राष्ट्र और समाज को खुशहाल नहीं रखा जा सकता है।

महिला मजदूरों ने सुनाई शोषण उपेक्षा की दास्तां 

खदान मजदूर यूनियन के सम्मेलन में महिला मजदूरों की अत्यधिक संख्या जहां उनकी एकजुटता को दर्शा रहीं थीं तो वहीं उनकी शोषण भरी दास्तां भी विचलित करने वाली रही। पत्थर खदानों से लेकर मनरेगा मजदूर के तौर पर काम करने वाली महिला मजदूरों ने अपने शोषण उपेक्षा की दास्तां सुनाते हुए कहा कि उन्हें पुरुष प्रधान देश में जाति से लेकर उन तमाम भेदभावपूर्ण व्यवहार से लेकर काम और मजदूरी तक के लिए जद्दोजहद करना पड़ जाता है। जबकि वह किसी पुरुष से कमतर काम नहीं करती हैं।

यूनियन से जुड़े रामआसरे ने खदान मजदुर यूनियन संगठन की ज़रुरत पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह संगठन अभी मिर्ज़ापुर के 2 ब्लॉक में क्रियाशील है, जिसमें तकरीबन 700 सक्रिय कार्यकर्ताओं की संख्या हैं, इनमें महिला श्रमिकों की तादाद अत्यधिक है।

संगठन की जिला स्तर की कमेटी और गांव स्तर की कमेटियां बनी हुई हैं। सम्मेलन में संगठन का ढांचा एवं 1 वर्ष की कार्ययोजना प्रस्तुत की गई। इसी क्रम में रेखा जी द्वारा संगठन के बारे तथा संगठन में जुड़े रहने का और संगठन के कार्य के बारे में अपना अनुभव साझा किया गया।

अध्यक्षता कर रही उर्मिला विश्वकर्मा ने अहरौरा सहित जिले के मड़िहान से लगाय अन्य खनन क्षेत्रों में सिलिकोसिस रोग के बढ़ते प्रभावों पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा, “सिलिकोसिस एक गंभीर फेफड़ों की बीमारी है, जो सांस के जरिए क्रिस्टलीय सिलिका की बारीक धूल के साथ जाकर फेफड़ों में जमा होने से होती है। पत्थर कटर मशीनों, क्रेशर प्लांटों, खदानों में काम करने वाले लोग इससे ज्यादा प्रभावित होते हैं जिन्हें जागरूक करने, इससे बचाव के लिए स्थानीय स्तर पर न तो कोई उपाय होते हैं ना ही कोई सरकारी स्तर पर कार्यक्रम आयोजित होते हैं ऐसी दशा में गरीब मजदूर इन गंभीर बीमारी की चपेट में आकर घुट घुट कर दम तोड़ दिया करते हैं।”

उन्होंने कहा सिलिकोसिस मुख्य रूप से खदानों, निमार्ण स्थलों, सैंड ब्लास्टिंग और पत्थर काटने जैसे व्यवसायों के कणों के लंबे समय तक संपर्क में होने के कारण होती है। जिसकी जद में मिर्ज़ापुर, सोनभद्र जिला भी है लेकिन इस सत्य को स्वीकार करने के बजाए छुपाया जाता रहा है।”

उन्होंने जोर देकर कहा कि, “मिर्जापुर के अहरौरा, मड़िहान में प्रदूषण तेजी से फैल रहा है, यहां के खदानों से निकलने वाली धूल कण के कारण इसका प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है। इनकी वजह से खेती में पैदावार दिन प्रतिदिन कम हो रही है। भू-गर्भ जलस्तर भी तेज़ी से गिर रहा है। खदान मजदूरों सहित इन्हीं सब ज्वलंत जन समस्याओं से लड़ने के लिए खदान मज़दूर यूनियन संगठन की स्थापना की गई।”  

गहरी खदानों से ख़त्म होते जल-जीवन पर जताई गई गहरी चिंता 

कार्यक्रम में खदानों के चलते ख़ाक होते जल जीवन से लेकर पर्यावरण पर विस्तार से चर्चा की गई। इस दौरान अरुण जी ने खदानों से निकलने वाली धूल और खनन से मजदूरों को किन-किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। इन खदानों से निकलने वाले धूल के कारण सिलकोसिस बीमारी होती है, जिसका कोई इलाज नहीं है, पर गहरी चिंता जताई गई। बताया कि अत्यधिक खनन के कारण यहां का जल का स्तर कम हो रहा है। 

मनरेगा मजदूरों को बेवकूफ बना रही सरकार 

मजदूरों की विभिन्न समस्याओं के बीच मनरेगा कानून को लेकर सम्मेलन में खासा चर्चा में रहा है। वक्ताओं ने कहा, पहले के मनरेगा कानून को किस तरह से नाम बदल दिया गया तथा इससे किस तरह से किसानों और मज़दूरों को सरकार बेवकूफ बना रही है, यह गहरी चिंता का विषय है। कहा यह सरकार योजनाओं का नाम बदलकर सिर्फ और सिर्फ लोगों को गुमराह करती आई है। मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार और मनरेगा मजदूरों की दशा किसी से छुपी हुई नहीं है।

सरकार को मनरेगा मजदूरों को भरपूर काम और दाम देने का काम करना चाहिए था ना कि नाम बदला चाहिए था, क्यों कि योजना का नाम बदलने से किसी मजदूर का भला होने वाला नहीं है।”

इस अवसर पर डॉ. संदीप पांडे ने अपना शुरुआती अनुभव साझा करते हुए मजदूरों की उपेक्षा और बढ़ते मशीनीकरण पर चिंता जतायी और बढ़ते मशीनीकरण को विकास के नाम पर बीमारी बताया। मनरेगा कानून के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि सरकार अब दिल्ली में बैठ कर यह तय करेगी कि किस राज्य और गांव में सभी मजदूरों को सम्मानजनक काम मिला है।

उन्होंने दिल्ली के बजाए गांवों में जाकर मनरेगा मजदूरों के काम की गारंटी तय करने और उनकी समस्याओं को दूर करने की बात कहते हुए सरकार का ध्यान दिलाया कि मनरेगा मजदूरों को भरपूर मज़दूरी और उनके काम का दाम सही तरीके से मिले सरकार को यह सुनिश्चित करते हुए इसकी निगरानी करनी चाहिए ताकि मनरेगा को भ्रष्टाचार मुक्त बनाया जाए। इसी के साथ ही उन्होंने मजदूरी की गारंटी हो मजदूर परिवारों के शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए समान रूप से उपलब्ध हो इसपर भी जोर दिया।

डॉ. पांडेय ने खदान मजदूर यूनियन अहरौरा के सम्मेलन में उमड़ी महिला मजदूरों की भीड़ को संबोधित करते हुए कहा, सभी मजदूरों को श्रम कार्ड मिले, सिलिकोसिस जैसी गंभीर बीमारियों से जान गंवाने वाले मजदूरों को ₹5 लाख की आर्थिक मदद, 60 वर्ष से अधिक उम्र के सभी श्रमिकों को कम से कम ₹3000 पेंशन दिया जाए।

मजदूरों को रोजगार नहीं मिल पा रहा के मुद्दे पर चर्चा करते हुए अहरौरा सहित मिर्ज़ापुर जिले में तेज़ी से बढ़ रहे प्रदूषण, खनन में मशीनीकरण पर तत्काल बंद किये जाने की मांग की, ताकि मजदूरों को रोटी-रोजी मिल सके। साथ ही उन्होंने मनरेगा के पुराने प्रारूप को लागू करने की मांग करते हुए कहा कि बीजी रामजी योजना में मजदूरों का हित सुरक्षित नहीं है। उन्होंने कहा सभी मजदूरों को रोजगार मिले तबाही को खत्म किया जाए, तभी इसे सार्थक माना जा सकता है।

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