प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा को लेकर भारत और विदेश में बेचैनी और चिंता का माहौल है। मध्य पूर्व की अस्थिर स्थिति, ईरान-अमेरिका युद्ध की आशंका का हवाला देते हुए लोग नरसंहार के आरोपों का सामना कर रहे देश में भारतीय प्रधानमंत्री का एकल दौरे की तर्कसंगतता पर सवाल उठा रहे हैं। मोदी सरकार भी गाजा की घटनाओं की आलोचक रही है, हालांकि दबी आवाज में।
फिलिस्तीनी मुद्दे का समर्थन करने में सरकार ने संकोच जरूर किया है, लेकिन इजराइल का साथ देने से परहेज किया है। अब मोदी सरकार ने अपना संकोच त्याग दिया है और इजराइल-अमेरिका गठबंधन में शामिल होने का दृढ़ संकल्प दिखाया है।
इज़रायली संसद, नेस्सेट को उन्होंने बताया, “और हम अलग अलग रूपों जैसे भारत – मध्य पूर्व – यूरोप आर्थिक कॉरिडोर और भारत, इज़राइल, यूएई और अमेरिका के बीच आई टू यू टू फ्रेमवर्क, में मिलकर काम करेंगे। रक्षा और सुरक्षा हमारी सहभागीदारी का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है। पिछले साल नवम्बर में, हमने रक्षा सहयोग के एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। आज की अनिश्चित दुनिया में, भारत और इज़राइल जैसे भरोसेमंद साझेदारों के बीच एक मजबूत रक्षा साझेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है।”
इस घोषणा को उनके इस कथन के साथ पढ़ा जाना चाहिए, “मैं भारत की जनता की ओर से उन सभी लोगों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करता हूँ जिन्होंने 7 अक्टूबर को हमास द्वारा किए गए बर्बर आतंकवादी हमले में अपनी जान गंवाई और उन सभी परिवारों के प्रति भी संवेदना व्यक्त करता हूँ जिनका जीवन तबाह हो गया। हम आपके दर्द को महसूस करते हैं। हम आपके शोक में आपके साथ हैं। भारत इस समय और भविष्य में भी, पूरी दृढ़ता और विश्वास के साथ इज़राइल के साथ खड़ा है।”
हो सकता है यह कथन उचित ध्यान आकर्षित न करे, क्योंकि इसे बहुत सावधानी से दया और करुणा में लपेटा हुआ है। लेकिन, यह केवल फिलिस्तीनी संघर्ष को अपराध घोषित करता है। यह फिलिस्तीनी जनता के उत्पीड़न को संदर्भरहित बनाता है। मध्य-पूर्व राजनीति का कोई भी छात्र आपको आसानी से बता सकता है कि हमास इज़राइल की ही उपज है, जैसे तालिबान अमेरिका की देन है।
इस संगठन को बढ़ावा महान नेता यासिर अराफात के नेतृत्व में चल रहे फिलिस्तीनी संघर्ष को बांटने के लिए दिया था। हमास ने फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन को हाशिए पर धकेल दिया।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा भारत में हुए आतंकी हमलों और हमास द्वारा किए हमलों की तुलना को उसी संदर्भ में देखना चाहिए जो एक सदी से लंबे इतिहास वाले संघर्ष को अमान्य ठहराता है। मोदी ने फिलिस्तीनी जनता के लिए भारत के समर्थन की विरासत को भी त्याग दिया है।
भारतीय समर्थन के लंबे इतिहास को रेखांकित करने की आवश्यकता है। 1921 में ही, महात्मा गांधी ने यह शपथ ली थी कि खिलाफत आंदोलन फिलिस्तीन को उसके लोगों को लौटा देगा। ब्रिटिश हुकूमत ने उस क्षेत्र पर कब्ज़ा कर एक मैंडेट बना दिया था। गांधी अडिग रहे और 1931 में ज़ायनवाद की आलोचना की। उन्होंने यहूदियों की एक समुदाय के रूप में प्रशंसा की और उनकी एकता को स्वीकारा। उन्होंने अपने उस यहूदी दोस्त को धन्यवाद भी दिया जिसने दक्षिण अफ्रीका में उनकी मदद की थी।
लेकिन, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जेरूशलम पर यहूदियों द्वारा कब्जा करने की आकांक्षा गलत है। उन्होंने यहूदियों को जेरूशलम पर आध्यात्मिक अधिकार जमाने की सलाह दी, चूंकि पवित्र भूमि एक भावना थी और हर यहूदी के दिल में यह भावना बनी रहनी चाहिए। उस पवित्र भूमि पर किसी भी तरह के शारीरिक अधिकार की कोशिश की वे भर्त्सना करते थे।
1938 में गांधीजी ने भी फिलिस्तीन के मसले पर अपने राजनीतिक विचार रखे। उन्होंने नाजियों की कार्रवाईयों के खिलाफ यहूदियों का समर्थन किया, पर उनके द्वारा फिलीस्तीन पर कब्जा करने के प्रयास का विरोध भी किया।
उन्होंने लिखा, “मेरी पूरी सहानुभूति यहूदियों के साथ है। वे ईसाई धर्म में अछूत रहे हैं। पुराने तानाशाह कभी हिटलर की हद तक नहीं गए थे। मानवता के हित में अगर कभी कोई जंग होगी तो वह जर्मनी के विरुद्ध एक पूरी कौम की प्रताड़ना को रोकने के लिए होगी। लेकिन मैं युद्ध में विश्वास नहीं रखता। और फ़िर, यहूदियों के साथ मेरी हमदर्दी, न्याय की जरूरत के खिलाफ मुझे अंधा नहीं बना देती। यहूदियों को अरब लोगों पर थोपना गलत और अमानवीय है।”
“फ़िलिस्तीन में आज जो कुछ हो रहा है, उसे किसी भी नैतिक आचार संहिता से उचित नहीं ठहराया जा सकता। इन आदेशों का एकमात्र आधार पिछला युद्ध है। बेहतर रास्ता यही होगा कि यहूदियों के साथ वहीं न्यायपूर्ण व्यवहार पर ज़ोर दिया जाए जहां वे जन्मे और पले बढ़े हैं। फ्रांस में जन्मे यहूदी उसी तरह फ्रांसिसी हैं जिस तरह फ्रांस में जन्मे ईसाई। हर मुल्क उनका घर है, फिलिस्तीन भी, आक्रामकता से नहीं बल्कि प्रेमयुक्त सेवा से।”
नाज़ी शोषण के खिलाफ यहूदियों को समर्थन की जरूरत थी, लेकिन इसका ये मतलब नहीं था कि फिलिस्तीन पर उनके कब्ज़े का भी समर्थन किया जाए, गांधी अपने नज़रिए में स्पष्ट थे।
गांधी का फ्रेमवर्क फिलिस्तीनी मसले पर भारतीय नीति का मूल बना रहा। इसने यहूदियों के खिलाफ नफरत फैलाने में लिप्त हुए बिना फिलिस्तीन का समर्थन किया। हालांकि, भारत ने “टू नेशन फॉर्मूले” का समर्थन किया है और एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के लिए दृढ़ता के साथ खड़ा रहा है। फिलिस्तीनी मसले पर भारतीय पक्ष उसकी स्वतंत्र विदेश नीति का एक मुख्य हिस्सा रहा है।
नजदीक से देखने पर राहुल गांधी का यह आरोप कि प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका के आगे आत्मसमर्पण कर लिया है, निराधार नहीं है। प्रधानमंत्री ने जो छवि बनाने की कोशिश की है, उससे यही बात पुष्ट होती है। वे उस समय इज़राइल के दौरे पर गए जब उसके पास उन देशों का समर्थन नहीं जो हमेशा से उसे समर्थन देते आए हैं।
उनके कथनों पर नज़र डालिए:
“भारत में, इज़राइल के संकल्प, साहस और उसकी उपलब्धियों की बहुत प्रशंसा है। आधुनिक राज्यों के रूप में एक दूसरे से संबंध रखने से बहुत पहले, हम उन तारों से जुड़े हुए थे जो दो हज़ार साल से भी पुराने हैं। एस्थर की किताब भारत को होडू नाम से संबोधित करती है। तालमुद भारत के साथ हुए व्यापार का लेखा जोखा रखता है।” “यहूदी व्यापारी भूमध्य सागर को भारतीय महासागर से जोड़ने वाले समुद्री रास्तों से होते हुए आए थे। वे यहां अवसरों और गरिमा की तलाश में आए। और भारत आकर, वे हम में से एक बन गए।”
“यहूदी समुदाय बिना किसी प्रताड़ना और भेदभाव के डर के भारत में रहे हैं। उन्होंने अपनी आस्था को संरक्षित कर समाज में पूरी तरह हिस्सा लिया। ये बात हमारे लिए गर्व का स्रोत है।”
और ये भी, “आखिरकार, मैं उसी दिन – 17 सितंबर, 1950 – पैदा हुआ था जिस दिन भारत ने इज़राइल को अधिकारिक रूप से मान्यता दी थी!” क्या कूटनीति में इन शब्दों का कोई अर्थ है? ये शब्द गांधी द्वारा निर्मित राष्ट्रीय विज़न से उनकी पथभ्रष्टता से हमारा ध्यान हटाने के लिए हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और राजनीति, समाज, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर लिखते हैं। मूल अंग्रेज़ी में लिखा उनका यह लेख बिज़बज़ से साभार। अनुवाद : शुभम रौतेला। मूल लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)