नीतीश के पैंतरे से जदयू में उबाल : सम्मानजनक ट्रांजिशन या फिर राजनीतिक समर्पण?

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पैंतरेबाज़ी से जनता दल यूनाइटेड (जदयू) घायल है। एक दिन पहले उनका सोशल मीडिया पर बयान आया कि वे अब राज्य सभा जाना चाहते हैं और बिहार की नयी सरकार को उनका हर तरह से समर्थन जारी रहेगा। और इस बयान के दूसरे दिन ही यानी गुरुवार को राज्यसभा सीट के लिए पार्टी कोटे से अपना नामांकन भी भर दिया। लगा मानो बुलेट ट्रैन की रफ़्तार में बिहार की राजनीति दौर रही है। लेकिन अब जो होना था वह तो हो गया।

नीतीश कुमार अब राज्यसभा में आएंगे और देश की राजनीति में भूमिका निभाते नजर आएंगे। यहाँ तक तो सब कुछ ठीक है लेकिन नीतीश कुमार के इस फैसले से दो सवाल उठ रहे हैं। पहला सवाल तो यही है कि क्या जदयू में कोई बड़ा बिखराव होगा? और दुसरा सवाल वही है कि क्या बिहार में भी बीजेपी ने वही किया जो अब तक कई राज्यों में करती रही है। यानी जिस पार्टी को अपना सहयोगी बनाया उसे ख़त्म कर दिया या फिर बौना बनाकर अपने पीछे चलने को विवश कर दिया ?

कुछ और सवाल भी राजनीतिक गलियारों में तैर रहे हैं। मसलन कि बीजेपी के साथ मिलकर जदयू के कई बड़े नेताओं ने ही नीतीश कुमार को यह सब करने को विवश कर दिया है? एक सवाल यह भी है कि अगर जदयू के नेताओं ने जदयू और खासकर नीतीश कुमार के साथ कोई बड़ा खेल किया है तो क्या बीजेपी को कोई बड़ा लाभ भविष्य में मिल सकता है और फिर यह सवाल भी कि क्या सत्ता परिवर्तन के इस खेल में बीजेपी की पैठ अब बिहार में मजबूत होगी और राजद समेत विपक्ष की भूमिका कमतर हो जाएँगी?

पटना की सड़कों पर बवाल मचा हुआ है। यह बवाल जदयू के लोगों का है। पटना से दूर बिहार के कई इलाकों में भी जदयू के लोग सड़कों पर उतरे हुए हैं और जो नारे लगा रहे हैं उसके कई मायने लगाए जा रहे हैं। सड़कों पर उतरे लोगों का यही कहना है कि ”हम नीतीश के सिवा किसी को नेता नहीं मान रहे। बिहार की जनता ने नीतीश को ही नेता मानकर वोट डाला था ताकि सत्ता बीजेपी के हाथ नहीं जाए।”

पटना की सड़कों पर और जदयू कार्यालय के भीतर जो दृश्य दिखे हैं वे भयानक भी है और भविष्य के संकेतक भी। जिस प्रकार का असंतोष जदयू के लोगों में है आज से पहले कभी नहीं देखा गया। कई महिलाएं रोते दिखाई पड़ रही हैं तो कई युवा जदयू के बड़े नेताओं को ही विभीषण और जयचंद कहते नजर आ रहे हैं। 

सबसे पहले पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पार्टी दफ्तर के भीतर तोड़फोड़ की है और नारेबाजी करते हुए पार्टी नेता संजय गाँधी से धक्कामुक्की करते भी देखे गए। कइयों ने अभद्र भाषा का भी उपयोग किया और कहते सुने गए कि पार्टी के कई ऐसे नेता है जो बीजेपी के साथ मिलकर महीनों से जदयू को बर्बाद कर रहे थे। ये सभी जयचंद की तरह हैं और पार्टी इनको छोड़ेगी नहीं।

जाहिर है ये घटनाएँ बता रही हैं कि बिहार में चाहे जिस समीकरण के आधार पर सत्ता परिवर्तन होगा, जदयू के लिए अस्तित्व के संकट के समान ही होगा। 

जदयू के लोगों का आरोप है कि ललन सिंह, संजय झा और विजय चौधरी ने ही पार्टी को गर्त में मिलाया है। ये सभी नेता बीजेपी के साथ मिलकर पार्टी को कमजोर करते रहे हैं। और एक साजिश के तहत नीतीश कुमार को सीएम पद से हटवा रहे हैं। पार्टी के भीतर जो नारे लगाये गए हैं उसमें यह कहा गया है कि पार्टी के कई नेता बिक गए।

ऐसे में साफ़ कहा जा सकता है कि जमीनी कार्यकर्ता अब पार्टी नेताओं पर अपना भरोसा खो चुके हैं। अब उनके पास यही चारा है कि जो हो रहा है उसे सहा जाए या फिर वक्त को देखते हुए अपना पैंतरा भी बदल ले। 

पार्टी के ही एक नेता कहते हैं कि ”अभी जो हुआ है वह काफी पहले से चल रहा था। जब जदयू के लोग ही बीजेपी के साथ जाने को तैयार हैं तो कोई क्या कर सकता है। और यह सब इसलिए हो रहा है कि जो नयी सरकार बनेगी वहां भी ये सभी मंत्री बनेंगे और बिहार को लूटने का काम करेंगे। नीतीश कुमार कहीं भी जाने को तैयार नहीं थे लेकिन पार्टी के कई बड़े नेताओं ने ऐसे हालात बना दिए कि नीतीश कुमार को यह सब निर्णय लेना पड़ा है। ”

कार्यकर्ताओं की भावनात्मक प्रतिक्रिया को हल्के में नहीं लिया जा सकता। नीतीश कुमार जदयू के लिए सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि पार्टी की पहचान रहे हैं। 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए की 200 से अधिक सीटों की जीत काफी हद तक उनके चेहरे और सामाजिक समीकरणों पर टिकी थी। ऐसे में चार महीने के भीतर उनका “दिल्ली जाना” कार्यकर्ताओं को स्वाभाविक नहीं लग रहा।

राजनीतिक हलकों में पहले से यह धारणा रही है कि बीजेपी अपने सहयोगियों को धीरे-धीरे कमजोर कर देती है। बिहार में अगर पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बनता है, तो यह ऐतिहासिक होगा—लेकिन जेडीयू के लिए यह सत्ता-साझेदारी से सत्ता-त्याग जैसा दिखेगा। जेडीयू के भीतर यह डर भी है कि मुख्यमंत्री पद जाने के बाद पार्टी की राजनीतिक हैसियत घट जाएगी और वह बीजेपी की “जूनियर पार्टनर” बनकर रह जाएगी।

यही कारण है कि कार्यकर्ता इसे “सम्मानजनक ट्रांजिशन” नहीं, बल्कि “राजनीतिक समर्पण” के रूप में देख रहे हैं। जानकार मान रहे हैं कि जदयू अब पहले वाली पार्टी नहीं रह गयी। अगर जदयू की तरफ से कोई सीएम नहीं बनता है तो साफ़ है कि चुनाव के बाद या तो नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ कोई समझौता किया होगा। मसलन राष्ट्रपति पद के लिए कोई बात हुई होगी। या कोई और भी बड़ा खेल हुआ होगा।

खेल क्या हुआ है अभी तक इसकी कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं है लेकिन एक बात साफ़ है कि नीतीश कुमार का हालिया फैसला यह बता रहा है कि या तो वे बीजेपी के दबाव में हैं या फिर अपने नेताओं के खेल से ऊब से गए हैं। ऐसे में बीजेपी के हाथ में अगर सत्ता जाती है तो कह सकते हैं कि यह सब जदयू के कुछ लोगों की वजह से संभव हुआ है। 

बड़ा सवाल अब यही है कि नीतीश के दिल्ली आने के साथ ही जदयू का क्या होगा ? क्या जदयू टूट जाएगी या फिर जदयू का अधिकांश हिंसा बीजेपी में मर्ज कर जाएगा? हालांकि इसका कोई सीधा जवाब नहीं दिया जा सकता। चूंकि जदयू का पूरा ताना-बाना नीतीश कुमार के इर्द गिर्द ही घूमता रहा है और एक मात्र वही पार्टी के सर्वमान्य नेता रहे हैं इसलिए उनका सत्ता से हटने का मतलब है साफ़ है जदयू की सेहत ठीक नहीं है और आने वक्त में भी बड़ा खेल बिहार में हो सकता है।

ऐसे पार्टी के कुछ बड़े नेता जो कथित समाजवादी पृष्ठभूमि से आते हैं वे अलग राह पकड़ सकते हैं। किसी दूसरी पार्टी के साथ जा सकते हैं और राजद या कांग्रेस उनकी पहली पसंद हो सकती है। यह भी तय है कि पार्टी अभी भले ही न टूटे लेकिन जदयू का क्षरण होना तय माना जा रहा है। इसके साथ ही अगर सत्ता की बागडोर बीजेपी के हाथ जाती है तो जदयू बीजेपी का पिछलग्गू बनकर ही राज जाएगी।

अभी जो हालत है उसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सत्ता में बने रहने के लिए या फिर सत्ता का लाभ उठाते रहने के लिए अभी वे जो भी सरकार बनेगी उसके साथ जाना ज्यादा पसंद कर सकते हैं लेकिन अगले चुनाव से पहले पार्टी बचेगी या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं होगी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पार्टी कार्यकर्ताओं को भरोसे में लिया गया? अगर जमीनी कैडर खुद को ठगा हुआ महसूस करता है, तो उसका असर चुनावी मशीनरी पर पड़ता है।

उधर बीजेपी की बांछे खिल गई हैं। जो वह चाहती थी वही सब उसे दिख रहा है। सत्ता पाने को बीजेपी बेचैन है और यह उसके लिए एक अवसर के सामान है। लेकिन बीजेपी के लिए यह एक जोखिम से भी कम नहीं है। बीजेपी के हाथ में सत्ता जाती है, जदयू अभी बीजेपी के साथ रहती भी है और जदयू का वह वोट बैंक जैसे पिछड़ा और महिला वोट बैंक अगर खिसकता है तो इसका सीधा लाभ राजद को मिल सकता है। और ऐसा हुआ तो बिहार में नए खेल की शुरुआत होगी। 

नीतीश के हालिया फैसले के बाद विपक्ष ने एक नया नैरेटिव भी तैयार किया है। नैरेटिव यही है कि बीजेपी ने नीतीश कुमार को पैदल कर दिया और बीजेपी जो बाकी राज्यों में अपने सहयोगियों के साथ करती आयी है वही खेल उसने बिहार में भी जदयू के साथ कर दिया।

विपक्ष अभी यह भी कह रहा है कि जिस तरह से सालों तक बीजेपी ने ओडिशा में बीजद की सहयोगी होकर बीजद को ख़त्म किया ठीक वही खेल बीजेपी ने जदयू के साथ भी कर दिया। कह सकते हैं कि उत्तर भारत में बिहार ही एक समाजवादी विचारवाली पार्टी थी जहाँ हिन्दू और मुसलमान प्रेम और भाईचारे से रह रहे थे और अब वह भी बीजेपी ने ख़त्म कर दिया।

अगर विपक्ष का यह नैरेटिव जनता के मन में घर कर गया तो इससे न सिर्फ जदयू की राजनीति पर असर पड़ेगा बल्कि आगामी लोकसभा चुनाव और अगले विधान सभा चुनाव तक बिहार की जातीय राजनीति भी बदल जाएगी। 

बिहार की राजनीति अब एक निर्णायक मोड़ पर है। यह केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि एक युग के अंत और नए शक्ति-संतुलन की शुरुआत है। आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि यह बदलाव नियंत्रित संक्रमण साबित होता है या जेडीयू के लिए अस्तित्व का संकट।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)

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