नेपाल: जेन-जी सरकार से कैसे होंगे भारत के रिश्ते?

नेपाल की सियासत इतिहास की सबसे बड़ी करवट ली है। चीन और भारत के बीच स्थित नेपाल में लंबे समय से कुछ स्थापित पार्टियों का वर्चस्व रहा है। 1990 के बाद से 32 सरकारें सत्ता में आ चुकी हैं और उनमें से कोई भी पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है। नेपाल में पहली बार ऐसा हो रहा है जब कोई नई नवेली पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है। इंजीनियर और काठमांडू के पूर्व मेयर बालेंद्र शाह, जिनको पूरा नेपाल ‘बालेन’ कहकर पुकारता है,वो देश के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं।

‘नेपाल फर्स्ट’ की नीति पर चलने वाले बालेन शाह के पिछले बयानों और टिप्पणियों के कारण आपसी संबंधों के मामले में भारत ‘वेट एंड वाच’ की नीति पर आगे बढ़ रहा है। केपी शर्मा ओली की सरकार के दौरान कई वजहों से दोनों देशों के आपसी संबंधों में दूरियां काफी बढ़ गई थी। गौरतलब है कि करीब तीन साल पहले शाह ने एक नक्शे को सोशल मीडिया पर भी शेयर किया था। उसमें पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को ग्रेटर नेपाल का हिस्सा बताया गया था। हालांकि बाद में पोस्ट को हटा दिया गया था। 

मैथिली लेखक और पत्रकार आत्मेश्वर झा कहते हैं कि, ”चुनाव जीतने के लिए कई तरह के बयान दिए जाते हैं। हाल के वर्षों में सत्ता में रहीं सरकारों का झुकाव चीन की ओर बढ़ा है, लेकिन बालेन शाह से भारत और चीन के साथ संबंधों में संतुलन कायम रखने की उम्मीद है।”

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से पढ़ाई कर रहे शिवम यादव कहते हैं कि,”भारत-विरोधी बयान देकर देश में अपनी लोकप्रियता बढ़ाना नेपाल के नेताओं का मशहूर शगल रहा है। बालेन शाह भी अपवाद नहीं हैं। भारत, जिसने अपनी विदेश नीति में ‘पड़ोसी पहले’ का सिद्धांत अपनाया है, चुनावों के बाद अपनी नेपाल नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं करेगा। सबसे जरूरी बात यह है कि बालेन शाह अपने चुनाव अभियान के दौरान भारत-विरोधी टिप्पणी करने से बचते रहे है । सत्ता संभालने के बाद वो नेपाल के हितों को ध्यान में रखने के साथ ही भारत के साथ रिश्तों को मजबूत करने पर जोर देंगे।”

वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र नाथ मिश्रा लिखते हैं कि,”नेपाल में युवा रैपर बालेन शाह का चुनाव जीतना सबूत है कि नेपाल का जेन जी आंदोलन जमीनी था। इस पीढ़ी को हंस कर टाल देना/मजाक उड़ा देने से हकीकत नहीं बदल जाएगी कि अब ये समाज, राजनीति में एक्स फैक्टर बन गए हैं। इनकी बात इनके हिसाब से सुनना होगा।”

कौन है बालेन शाह?

इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त 35 वर्षीय बालेन शाह वर्षों से नेपाल के हिप-हॉप संगीत जगत ‘नेफहॉप’ से जुड़े हुए हैं। उनका जन्म 1990 में काठमांडू के थमेल क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता राम नारायण शाह आयुर्वेद के चिकित्सक हैं, जबकि माता का नाम ध्रुवदेवी शाह है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, मई 2022 में जब बालेन शाह पहली बार काठमांडू महानगरपालिका के मेयर बने, तो यह हर किसी के लिए आश्चर्यजनक था।

लोकप्रिय रैपर बालेन ने जब मेयर चुनाव में अपनी उम्मीदवारी घोषित की, तभी से उनका नाम चर्चा में आ गया।

पिछले दिसंबर में, शाह पूर्व टीवी होस्ट से राजनेता बने रवी लामिछाने के नेतृत्व वाली आरएसपी में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में शामिल हुए थे। अपने घोषणापत्र में, शाह की आरएसपी ने 12 लाख नौकरियां सृजित करने और जबरन पलायन को कम करने का वादा किया है, ताकि बेरोजगारी और कम वेतन को लेकर लाखों नेपालियों में व्याप्त निराशा का लाभ उठाया जा सके, जिसके कारण वे विदेशों में काम की तलाश में मजबूर हुए हैं।

पार्टी ने नेपाल की प्रति व्यक्ति आय को 1447 डॉलर से बढ़ाकर 3000 डॉलर करने, देश की अर्थव्यवस्था को दोगुने से अधिक बढ़ाकर 100 अरब डॉलर की जीडीपी तक पहुँचाने और पूरी आबादी के लिए स्वास्थ्य बीमा जैसे सुरक्षा जाल प्रदान करने का भी संकल्प लिया है

नेपाल की स्थानीय मीडिया के मुताबिक शाह की राष्ट्रव्यापी लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण काठमांडू महापौर के रूप में उनके कार्य हैं, जहाँ उन्होंने अपशिष्ट प्रबंधन जैसे शहरी बुनियादी ढांचे में सुधार तथा स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित किया। उन्हें कथित तौर पर सड़क विक्रेताओं और भूमिहीन लोगों की संपत्तियों को जब्त करने के लिए पुलिस का उपयोग करने के आरोप में ह्यूमन राइट्स वॉच सहित कई संगठनों की आलोचना का भी सामना करना पड़ा है।

पिछले साल के प्रदर्शनों के बाद यह चुनाव पुराने और नए नेतृत्व के बीच मुकाबले के रूप में देखा जा रहा था। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी 2022 में हुए आम चुनाव में चौथे स्थान पर रही थी। करीब 8 लाख पहली बार वोट देने वाले देश के युवाओं ने इस चुनाव में अहम भूमिका निभाई है। सोशल मीडिया पर 3.5 मिलियन से अधिक फॉलोअर्स वाले बालेन शाह मीडिया से काफी कम बात करते हैं। 

हाल के वर्षों में, नेपाल में राजशाही के साथ एक हिन्दू राष्ट्र बनाने की मांग बढ़ रही है, जबकि भारत में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर झुकाव रखने वाली आबादी का एक वर्ग इस मुद्दे के प्रति सहानुभूति रखता है।

जोगबनी के रहने वाले रोहित हयात बताते हैं कि, “मैं यहां इंडिया नेपाल बोर्डर पे रहता हूं। अक्सर काम की वजह से नेपाल के विराटनगर सिटी जाना पड़ता है। वहां पर हिंदूवादी संगठन वाले इसको जबरदस्ती का हिंदूवादी नेता बना रहा है जबकि ये बंदा का फंडामेन्टल सीधा है कि युवाओ क़ो आगे लाओ और देश से भ्रस्टाचार हटाओ।  आने वाले 5 साल में इसकी छवि पूरी तरह से बिगड़ने वाली है और उसका सारा श्रेय आरएसएस और विहिप क़ो जायेगा। ये लोग जो की नेपाल के सीमावर्ती इलाके में काफी एक्टिव है।

नेपाल चुनाव के रिजल्ट के बाद बालेन शाह की जाति को लेकर भी कई बातें हो रही है। दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे पंकज कुमार का शोध कार्य भारतीय समाज में जाति पर केंद्रित हैं। वह बताते हैं कि,”नेपाल के चुनाव परिणाम के दिन से ही अधिकांश लोग बालेन शाह की जाति खोज रहे हैं। खोजिए मत, वे न ब्राह्मण हैं और न ही क्षत्रिय। वे बनिया हैं। वे सूढी जाति समुदाय से आते हैं।

हालांकि नेपाल में भारत की तरह जातीयता नहीं है। भारत में जाति काम करती है लेकिन नेपाल थोड़ा अलग है भले ही वह धार्मिक रूप से हिन्दू हैं। अपने देश में लोगों के बीच यह धारणा बन चुकी है कि प्रधानमंत्री के रूप में वही नेता उपयुक्त होगा, जिसकी उम्र लगभग 50-60 वर्ष या उससे अधिक हो। वहीं वर्तमान समय में दुनिया के कई देशों में अपेक्षाकृत कम उम्र के नेता प्रधानमंत्री बन चुके हैं या इस पद पर कार्य कर रहे हैं। नेपाल भी इस लिस्ट में शामिल हो गए है‌।

राजनीति और अन्य विषयों पर लिखने वाले साकिब लिखते हैं कि,” विजयी दल राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी बालेन की नहीं है बल्कि उसने दो ढाई महीने पहले दिसंबर में इस पार्टी को ज्वाइन किया है। पार्टी बनाई हुई है रवि लमिछाने की। बालेन विचारधारा विहीन सोशल मीडिया ट्रेंड और सनसनी बनाने वाला आदमी है। वहीं दूसरी तरफ रवि लमिछाने की महत्वाकांक्षा।

वह बहुत कम समय में राजनीति में बहुत उतार चढ़ाव देख चुके हैं। प्रधानमंत्री बनना इनका भी अल्टीमेट लक्ष है। चुनावी मजबूरी में समझौता तो किया है लेकिन अपनी खड़ी की राजनीति का फल किसी दूसरे को बहुत दिन तक खाने दे इतना त्याग की मूर्ति राजनीति में कोई होता नहीं है। वह भी जहां तालमेल विचारधारा को लेकर नहीं बल्कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए व्यक्तियों के बीच हो।”

नेपाल और भारत की सीमा पर रह रहे आम नागरिकों के मुताबिक नेपाल की नई सरकार के साथ संबंधों में बेहतरी के लिए भारत को भी बड़े भाई वाली मानसिकता से बचना चाहिए। नेपाल में भारत के इस कथित रवैए के कारण ही आम लोगों में उसके खिलाफ नाराजगी बढ़ती रही है।

(राहुल गौरव पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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