“मैं जिंदा हूं, लेकिन ऐसा लगता है जैसे दुनिया मुझे भूल गई है। न्याय अभी भी दूर है। उस घटना के बाद हमारा पूरा जीवन बदल गया। घर, गांव और सामाजिक पहचान सब छूट गया। मानसिक आघात अब भी बना हुआ है।”
ये शब्द हैं उन दो लड़कियों के जिन्हें आज से कोई तीन साल पहले कपड़े उतार कर मणिपुर की सड़कों पर जुलूस के साथ पुरुषवादी समाज ने घुमाया था और ठहाके लगाए थे।
लेकिन आज तीन साल बीत जाने के बाद भी उन महिलाओं की स्थिति क्या है यह कोई नहीं जानता। संभव है सरकार के फाइलों में वे लड़कियां आज भी जीवित हों और सुरक्षा के बीच विस्थापन की जिंदगी जीने को अभिशप्त हों। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या उन दोनों लड़कियों को कोई न्याय मिल सका? इनकी जिंदगी पटरी पर लौटी? अहम् सवाल तो यह है कि क्या तीन साल के बाद भी इनके दोषियों के खिलाफ कोई कार्रवाई हो सकी? इसका जवाब कहीं नहीं है और न किसी के पास भी।
सच तो यही है कि वह दोनों लड़कियां आज भी मणिपुर से बाहर एक सुरक्षित स्थान पर रहने को विवश हैं। सुरक्षा कारणों से आज भी इनकी पहचान और लोकेशन को सार्वजानिक नहीं किया जा रहा है। ये लड़कियां गवाह संरक्षण कार्यक्रम के तहत रह रही हैं और बड़ी बात यह भी है कि इन दोनों लड़कियों के परिवार भी विस्थापन और सामजिक आघात से गुजर रहे हैं।
परिवार के लोग किसी से मिलना नहीं चाहते और आज भी कुछ कहने से बचते हैं। बेटी की बात जब उठती है तो आँखे भर आती हैं और सिर्फ यही आवाज निकलती है कि अब जिंदगी में बचा ही क्या है? हम नहीं चाहते कि वैसा दृश्य फिर से सामने आये और फिर किसी बेटी के साथ वैसा कुछ देखने को मिले।
बता दें कि 3 साल से चल रही सुनवाई आज तक पूरी नहीं हुई है। मामले की जांच सीबीआई कर रही है। यह जांच कब तक चलेगी कोई नहीं जानता। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इस केस को मणिपुर से असम में ट्रांसफर किया गया था ताकि जल्द और निष्पक्ष जांच हो सके लेकिन ऐसा कुछ भी संभव नहीं हो पाया है। इस मामले में कई आरोपी गिरफ्तार भी हुए थे लेकिन अभी सिर्फ ट्रायल ही चल रहे हैं। यह ट्रायल कब तक चलेगा इसकी जानकारी भी किसी के पास नहीं है।
अंतरात्मा को झकझोर देने वाली यह कहानी मई 2023 की है। मणिपुर के कांगपोकपी जिले में हुई उस भयावह घटना का वीडियो जब जुलाई 2023 में सामने आया था, तो पूरे देश में आक्रोश फैल गया था। भीड़ ने दो कुकी-जोमी समुदाय की महिलाओं को नग्न कर सड़कों पर घुमाया और यौन हिंसा की। उस समय प्रधानमंत्री से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। देश यह दृश्य देखकर अवाक रह गया था।
घर -घर यह चर्चा होने लगी थी कि क्या आजाद भारत का सच यही है कि महिलाओं को बर्बर तरीके से जुलुस निकाल कर सड़कों पर दौड़ाया जाय और उसके साथ घिनौना व्यवहार किया जाय। महिलाओं से वह वायरल वीडियो देखा नहीं जा रहा था और जो लोग उन महिलाओं के अंग छूकर नारे लगा रहे थे उसके खिलाफ लोगों का गुस्सा फुट रहा था। लेकिन अब सब कुछ शांत है। किसी को पता भी नहीं कि वे महिलाएं अब कहाँ हैं और किस हालत में हैं ?
2023 में जब इस घटना का वीडियो सामने आया, तब यह सिर्फ एक अपराध की खबर नहीं थी, बल्कि भारत के लोकतंत्र, समाज और राज्य की नैतिक जिम्मेदारी पर खड़े एक गंभीर सवाल की तरह था। लेकिन समय के साथ यह सवाल धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श से गायब होने लगा। आज, तीन साल बाद, वे महिलाएं खुद कह रही हैं—“मैं जिंदा हूं, लेकिन दुनिया मुझे भूल गई है।”
यह बयान सिर्फ व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि उस सामूहिक विस्मृति की ओर इशारा करता है जो हमारे समाज और राजनीति में बार-बार दिखाई देती है।
गौरतलब है कि मणिपुर में मई 2023 से शुरू हुई जातीय हिंसा में दो बड़े समुदाय मैतेई और कुकी आमने-सामने आ गए थे। यह बात और है कि मणिपुर का यह दोनों समाज आज भी एक दूसरे के खिलाफ खड़े हैं और वक्त मिलते ही एक दूसरे के खिलाफ विष वमन करने से बाज नहीं आते। हिंसा भी होती है। लोग मारे भी जा रहे हैं लेकिन अब शोर नहीं होता। तब की हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए, हजारों घर जलाए गए और लाखों लोग विस्थापित हुए।
लेकिन जिस घटना ने पूरे देश को झकझोरा, वह इन दो महिलाओं के साथ हुई बर्बरता थी। इस वीडियो ने यह दिखा दिया कि हिंसा के दौरान महिलाओं के शरीर को किस तरह युद्ध के मैदान की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
इस पूरी घटना ने राजनीति की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए। मणिपुर महीनों तक हिंसा की आग में जलता रहा, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में यह मुद्दा उतनी गंभीरता से नहीं उठ पाया जितनी जरूरत थी। राजनीतिक दलों ने इसे अपने-अपने तरीके से इस्तेमाल किया, लेकिन पीड़ितों की वास्तविक पीड़ा धीरे-धीरे राजनीतिक बयानबाजी के पीछे छिपती चली गई।
मीडिया की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जिस वीडियो के सामने आने के बाद देशभर में गुस्सा उमड़ा था, वही घटना कुछ महीनों बाद खबरों से गायब हो गई। यह हमारे मीडिया की उस प्रवृत्ति को दिखाता है जिसमें किसी घटना को कुछ समय के लिए सनसनी की तरह दिखाया जाता है, लेकिन उसके बाद उसकी निरंतर निगरानी नहीं होती।
लोकतंत्र में मीडिया को केवल घटनाओं को उजागर करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि न्याय की प्रक्रिया पर लगातार नजर रखने की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए।
मणिपुर की उन लड़कियों की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ दो व्यक्तियों की त्रासदी नहीं है। यह उस व्यापक सवाल का प्रतीक है कि क्या हमारा समाज और राज्य ऐसी घटनाओं के बाद पीड़ितों के साथ खड़ा रह पाता है, या फिर समय के साथ उन्हें भुला देता है। जब कोई पीड़ित यह कहने लगे कि “दुनिया मुझे भूल गई है”, तो यह केवल उसकी निजी निराशा नहीं होती। यह उस लोकतांत्रिक संवेदनशीलता की परीक्षा होती है जिस पर हम गर्व करते हैं।
मणिपुर की वे लड़कियां आज भी न्याय की प्रतीक्षा कर रही हैं। उनका सवाल अब भी वही है—क्या देश उन्हें याद रखेगा, या वे इतिहास के एक दर्दनाक फुटनोट बनकर रह जाएंगी? लोकतंत्र की असली परीक्षा इसी सवाल के जवाब में छिपी है।
(अखिलेश अखिल पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)