“महिलाओं पर बढ़ती हिंसा-प्रतिरोध के रास्ते” विषय पर एक दिवसीय कन्वेंशन आयोजित

इलाहाबाद, स्वराज विद्यापीठ। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर “महिला अधिकारों के लिए समर्पित इलाहाबाद के लोगों” की ओर से शहर की जनवादी-प्रगतिशील महिलाओं, महिला संगठनों और स्वराज विद्यापीठ का संयुक्त कन्वेंशन 14 मार्च को स्वराज विद्यापीठ के सभागार में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। कन्वेंशन का विषय था “महिलाओं पर बढ़ती हिंसा और प्रतिरोध के रास्ते”। 

सम्मेलन साहिर लुध्यानवी के प्रसिद्ध शेर पर आधारित एक सामूहिक गीत “औरतें उट्ठी नहीं, तो ज़ुल्म बढ़ता जायेगा” से हुआ, जिसे अमिता शिरीं, राधा गौढ, नज़राना और कौशिकी ने पेश किया. मुख्य अतिथि पद्मश्री सईदा हमीद, और अधिवक्ता लारा जेसानी, तथा शीरोज़ कैफे की माधवी मिश्र व रूपाली विश्वकर्मा को ऐडवा की वरिष्ठ नेता गायत्री गांगुली ने शाल भेंट कर सम्मानित किया।

कन्वेंशन का अप्रोच पेपर वरिष्ठ नेता कुमुदिनी पति की ओर से प्रस्तुत किया गया; उन्होंने कहा, “हमने यह तय किया है कि हमारे लिये महिला दिवस कोई औपचारिक समारोह न होकर, संघर्षों की अपनी शानदार विरासत को याद करने, महिला आंदोलन के समसामयिक मुद्दों को उठाने और हमारे आंदोलन को आगे बढ़ाने के संकल्प का दिन होगा। साथ ही, हमने यह भी फैसला किया है कि हमारे इस संघर्ष में शहर और आस-पास के क्षेत्रों के सभी प्रगतिशील ताकतों को शामिल किया जायेगा; इसलिये हम आज के कंवेंशन का आवाहन ‘महिला अधिकारों के लिये प्रतिबद्ध इलाहाबाद के लोगों’ की ओर से कर रहे हैं. नारी मुक्ति संघर्ष हम सबका साझा संघर्ष है!”

उन्होंने एप्स्टीन फाइल्स को “इंसानियत को शर्मसार करने वाले, और विश्व पूंजीवाद की चमक-दमक को, विज्ञान व तकनीक के उच्चतम संस्थानों तथा राजनीति के सर्वोच्च पदों पर काबिज लोगों के तथाकथित वैश्विक सम्मान को तार-तार करके रख देने वाले घृणित काण्ड” के रूप में चिन्हित करते हुए आगे कहा कि “हमारे अपने देश में कोई ‘डिपार्टमेंट आफ जस्टिस’ होता, जो स्वायत्त ढंग से काम करता, तो यहां भी एप्सटीन फाइल्स जैसे कई वीभत्स खुलासे हो सकते थे!

उत्तर प्रदेश की बात करें तो धर्म गुरुओं से लेकर राजनेताओं, धन्नासेठों, बड़े ठेकेदारों, आश्रमों के मठाधीशों व धर्मगुरुओं, पुलिस व प्रशासन के अधिकारियों व कर्मचारियों, स्कूल-कालेजों के प्रिंसिपल और अध्यापकों से लेकर भाजपा के आईटी सेल के संचालकों तक के नाम इसमें पाए जाएंगे।

संघी गुंडों द्वारा महिलाओं पर हिंसा और दलित-आदिवासी महिलाओं के उत्पीड़न के सैकड़ों मामले सामने आयेंगे; परंतु, हर बार देखा गया कि आरोपियों को बचाने के लिये एड़ी-चोटी का दम लगाया गया और उत्पीड़ितों को न ही सुरक्षा दी गयी, न ही उनकी कोई सुनवाई हुई।

बल्कि उत्पीड़ितों का पक्ष लेने वालों पर दमन चक्र चलाया गया. बगल के उत्तराखंड में भी सेक्स टूरिज़्म के फैलते जाल की शिकार बनी अंकिता भंडारी का केस सुलझा नहीं है, क्योंकि अपराधी वीआईपी को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी है।”

आगे कहा गया कि, “एलजीबीटीक्यू समुदाय पर उत्पीड़न के मामले तो दर्ज़ ही नहीं किये जाते, और जो नया विधेयक लाया गया है, वह उनके देह की स्वायतता और संवैधानिक अधिकारों पर हमला है।

जहां घरेलू हिंसा की बात आती है तो राष्ट्रीय महिला आयोग के अनुसार 2024 में उत्तर प्रदेश से सबसे अधिक घरेलू हिंसा के मामले सामने आये थे। तेजाब से हमले के मामले में भी उत्तर प्रदेश दूसरे नम्बर पर रहा है; 2025 में 25 मामले दर्ज़ किये गये थे. पर जहां तक न्याय पाने की बात है, इलाहाबाद उच्च न्यायालय एक-से-एक महिला-विरोधी फैसले दे रहा है, जिससे बलात्कार की परिभाषा ही बदल दी जा रही है। 

हमारे देश में जिस तरह से ‘रेप और महिलाओं पर हिंसा का कल्चर’ पनप रहा है, वह सभ्य समाज के लिये बेहद भयावह और शर्मनाक है. हम इसे एक ‘कल्चर’ के बतौर इसलिये चिन्हित करते हैं कि उत्पीड़कों का बाल बांका नहीं होता, बल्कि उन्हें सरकारों का समर्थन मिलता है, जिसके कारण उनके मनसूबे और भी बुलंद होते जा रहे हैं। राजनेता बेधड़क सार्वजनिक रूप से औरतों पर अश्लील टिप्पणियां करते हैं, और इसे ‘नार्मलाइज़’ किया जा रहा है।

दूसरी ओर ‘विक्टिम ब्लेमिंग’ चलती है, यानी औरतों पर ही दोष मढ़ा जाता है और ‘मॉरल पुलीसिंग’, यानी बंदिशें बढ़ाई जाती हैं। आंदोलनकारियों पर दमन होता है, यहां तक कि बलात्कार की धमकियां तक मिलती है मणिपुर की घटना वाइरल होने के बाद ही सरकार ने उसे स्वीकारा, पर ऐसे कितने ही मामले दबा दिये गये होंगे।

आदिवासी औरतें जब जल, ज़मीन और जंगल की रक्षा के लिये और बड़ी परियोजनाओं, बांधों, एसईज़ेड्स और हवाई अड्डों के लिये बेरोकटोक भूमी अधिग्रहण के विरुद्ध लड़ती हैं, उन्हें जेल भेजकर अमानवीय यातनाएं दी जाती हैं, और मार तक डाला जाता है। यह सब विकास के नाम पर चल रहा है””

बढ़ती हिंसा का कारण बताते हुए कहा गया, “ हमारी समझ में इसका कारण है कि विश्व भर में और हमारे देश में एक दक्षिणपंथी हवा तेज़ी से बह रही है-यानी पुरानी परंपराओं, अंधराष्ट्रवाद और यथास्थिति को महत्व देने वाली विचारधारा का बोलबाला तेज़ी से बढ़ा है. यह भी सच है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद और पूंजीवाद का शिकंजा जिस तरह पूरे विश्व पर कसता जा रहा है, महिलाएं और भी अधिक हाशिये पर धकेली जा रही हैं, नतीजतन उनपर हिंसा भी बढ रही है।“

कन्वेंशन में आए तमाम लोगों के समक्ष सवाल रखे गये-“इस विचार का मुकाबला करना क्या केवल महिलाओं का दायित्व है? क्या हम केवल सरकारों और न्यायपलिका पर निर्भर रह सकते हैं? हम नई पीढ़ी को सचेत कैसे करें, पतनशील संस्कृति का विरोध करते हुए नए सांस्कृतिक मूल्यों के पैरोकार कैसे बनें? सरकारों को महिलाओं की सुरक्षा के प्रति जवाबदेह कैसे बनाएं, मीडिया और फिल्म निर्माताओं व गीतकारों पर जन-दबाव कैसे बढ़ाएं?

साथ ही न्यायपालिका से जवाबदेही की मांग को संघर्ष का अनिवार्य हिस्सा कैसे बनाएं? साथ ही, महिला मुक्ति के लिये देश-विदेश में चल रहे आंदोलनों व साम्राज्यवाद विरोधी आन्दोलनों के साथ अपनी एकजुटता कैसे व्यक्त करें, खासकर जब अमेरिका और इज़राइल दुनिया भर के निर्दोषों पर बम बरसा रहे हैं, मासूम स्कूली बच्चियों तक का संहार कर रहे हैं?”  

एनएफआईडब्ल्यू की अध्यक्ष, पद्मश्री प्राप्त सईदा हमीद ने  सीएए एनआरसी प्रदर्शनों को याद करते हुए कहा वह मुसलमान औरतों का मिला-जुला शानदार प्रदर्शन था। पार्टीशन के वक्त दोनों ओर की औरतें अपने घरों में पर्चियां लगा कर गई थीं कि हम वापस आयेंगे। वे अधिक वतन प्रेमी रही हैं।

उन्होंने बताया कि जामियानगर, जहां वह रहती हैं, इतना खौफ पैदा कर दिया गया है कि हिंदू परिवार, जिनके संग बचपन से मुसलिम परिवार एक गंगा-जमुनी तहज़ीब को दशकों से संजोये रखे थे, अब घेट्टो बन गया है, जो बेहद दुखद है। उन्होंने आप बीती सुनाते हुए खुद के मुस्लिम औरत होने का दर्द साझा किया।

उन्होंने ईरान पर अमेरिकी इजरायल के हमले की निंदा करते हुए नई पीढ़ी को सावधान किया; ईरान में जिस तरह उनके प्रमुख अली खामेनेई और उनके परिवार के कई सदस्यों की नृशंस हत्या की गयी, भले ही देश में कुछ लोगों को वे नापसंद रहे हों, इस कायरतापूर्ण कार्यवाही की उन्होंने कड़े शब्दों में निंदा की।

कन्वेंशन में बोलते हुए महिला अधिकार ऐक्टिविस्ट और पीयूसीएल की राष्ट्रीय सचिव लारा जेसानी ने महिलाओं को मिले कानूनी अधिकार और उनकी सीमाओं पर बोलते हुए कहा कि लड़कियों की नागरिकता पुरुषों से अलग है, क्योंकि हमारे जीवन और शिक्षा के बारे में अलग तरीके से सोचा जाता है।

कानून भी पुरुष परिप्रेक्ष्य से बनाये और बदले जा रहे हैं-जैसे कि भारतीय न्याय संहिता में साफ देखा जा सकता है। कानूनों की तो छोड़िए, कोर्ट्स में भी हमे जजों की पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ लड़ना पड़ता है। महिलाओं के बड़े और पुराने संघर्षों की वजह से हमें बड़े कानूनी अधिकार मिले हैं, जिन्हें पितृसत्तात्मक सोच वाले अधिकारियों और जजों के कारण पीछे धकेला जा रहा है।

उन्होंने कहा कि औरतों की सोच तो आगे बढ़ी है लेकिन कोर्ट की सोच और पुलिस की सोच आगे नहीं बढ़ी। इसलिए भी औरतों के संवैधानिक मामलों पर एकजुट होना ज़रूरी है।

कन्वेंशन में आने वाली वक्ता कमला पंत उत्तराखंड में अंकिता भंडारी आंदोलन के तेज होने के कारण नहीं आ सकी लेकिन उन्होंने संदेश भेजा, जिसे पहचान संगठन की श्रीमती झरना मालवीय ने पढ़ा। कमला पंत ने राज्य में लागू यूसीसी पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे महिलाओं के जीवन साथी चुनने का अधिकार छिन गया है।

उन्होंने संदेश में कहा कि, “अंकिता हत्याकांड का जो मामला सामने आया है, वह मात्र महिला हिँसा के अपराध का ही एक मामला नहीं है, बल्कि वर्तमान में जो विकास माडल देश/ प्रदेश में बहुत तेजी से विकसित किया जा रहा, वह चहुं ओर महिला सुरक्षा के बढ़ते खतरे को और सत्ता के व्यभिचारी चरित्र को उजागर कर रहा हैI 

इस समय उत्तराखण्ड में, विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों की जो लड़कियां अपने घरों से बाहर पढाई या नौकरी के लिए निकल रही हैं, उनकी सुरक्षा गहरे ख़तरे में है l उत्तराखंड के पर्वतीय कस्बे और देहरादून शहर जो कभी बहुत सुरक्षित माने जाते थे, वे भी अब बहुत तेजी से असुरक्षित होते जा रहे हैं।“ 

शीरोज़ कैफे और छांव फाउंडेशन की माधवी मिश्रा ने अपने संगठन का परिचय देते हुए बताया कि वे ऐसिड अटैक सर्वाइवर महिलाओं के इलाज से लेकर उनके प्रशिक्षण और पुनर्वास के काम में लगे हैं और अब लखनऊ सहित कई प्रांतों में अपनी शाखाओं को सफलतापूर्वक चला रहे हैं। ऐसिड सर्वाइवर रूपाली विश्वकर्मा ने अपने साथ हुई घटना के बारे में बताया कि “ आज तक मुझे मालूम नहीं कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ।

ऐसिड अटैक के पीछे का बड़ा कारण, एक पितृसत्तात्मक ईर्ष्या है कि ‘उसने मुझे मना क्यों किया, वो मुझसे आगे कैसे बढ़ गयी, अधिक सफल क्यों है?’ मैने बहुत सारे ऐसे काम किये जो मेरे गांव की लड़कियों ने कभी नहीं किया था। मैं अपने गांव की पहली लड़की थी जो कुछ करने के लिये बाहर निकली। इस अटैक के पहले मैं एक भोजपुरी फिल्म अभिनेत्री थी, और बहुत आगे तक जाना चाहती थी, लेकिन इस अटैक ने मेरी जिंदगी बदल दी।

रूपाली ने इस अटैक से जुड़ी दर्दनाक कहानी सुनायी कि अस्पताल में उसे कैसे एक बोरे की तरह फेंका जाता था, और उसकी हालत मरने जैसी हो जाती थी। उसने एक बेहद प्रेरणादाई कहानी सुनाई कि कैसे उसने छांव फाउंडेशन की मदद से और अपनी मां की प्रेरणा से अपनी कई-कई सर्जरी करवाकर अपने को खड़ा किया, पर उसकी एक आंख चली गयी। उन्होंने कहा हमलावर तीन होते हैं, एक हमला करने वाला, दूसरा समाज, तीसरा आपका अपना परिवार।‘’ 

कन्वेंशन में वक्तव्यों के बीच-बीच में एपवा की राधा, कोरस की आकांक्षा, स्त्री मुक्ति की नज़राना और अमिता शीरीन ने गीत प्रस्तुत किये।

युद्ध के खिलाफ़ और महिला हिंसा को रोकने के लिए 22 प्रस्ताव पारित किए गए, जिन्हें सीमा आज़ाद, आबिदा जी और तोशी ने पढ़कर पारित करवाया। कन्वेंशन को सफल बनाने में जिन संगठनों की भूमिका रही उनमें  ऐडवा, ऐपवा, कोरस, स्त्री मुक्ति संगठन, प्रगतिशील महिला संगठन,पहचान, रक्स, आईसा,  पी यू सी एल और सफ़्दर कला मंच शामिल थे. पद्मा सिंह ने कार्यक्रम का संचालन किया था।

कन्वेंशन का अंत मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘मनोवृत्ति’ पर आधारित नाटक नज़रिया से हुआ, जिसका निर्देशन सफ्दर कला मंच के का.अजीत बहादुर ने किया। नाटक के माध्यम से औरतों के प्रति लोगों के पितृसत्तात्मक नजरिए को संबोधित किया गया।

कन्वेंशन में इलाहाबाद शहर के प्रमुख बुद्धिजीवी और ऐक्टिविस्ट, रंजना कक्कड़, अनिता गोपेश, अनुराधा अग्रवाल, राजुल माथुर, सुप्रिया पाठक,मालविका राव अवंतिका शुक्ला, रश्मि मालवीय, ज्योतिर्मयी, माधवी मित्तल, शिवांगी गोयल, सुरेन्द्र राही, प्रणय कृष्ण, विवेक तिवारी, संतोष भदौरिया, आशीष मित्तल, प्रेम शंकर, नीलम शंकर, फरीदा परवीन, विश्वविजय, रूपम मिश्रा, सोनी आज़ाद, एड कुंवर जी, सौम्या, फिरदौस, सुमन, एड आबिदा, भोर महिला स्वावलंबन केंद्र की कुमकुम, सुधांशु मालवीय, अनिता त्रिपाठी उपस्थित थे।

(जनचौक ब्यूरो)

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