आर्मी की महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन का अधिकारः सुप्रीम कोर्ट

supreme court delhi

भारतीय सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत सेवा देने वाली महिला अधिकारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए मंगलवार को कहा कि महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) अधिकारी भारतीय सशस्त्र बलों में स्थायी कमीशन की हकदार हैं। अदालत ने 250 महिला अधिकारियों की कैप को रद्द किया और एकमुश्त उपाय के रूप में पेंशन लाभ देने का निर्देश दिया।

अदालत ने सेना में महिलाओं के खिलाफ होने वाले प्रणालीगत भेदभाव को स्वीकार करते हुए अपनी विशेष संवैधानिक शक्तियों (अनुच्छेद 142) का इस्तेमाल किया। कोर्ट ने उन महिलाओं के पक्ष में फैसला दिया जिन्हें स्थायी कमीशन से वंचित रखा गया था। 

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने कहा, “पुरुष एसएससी अधिकारी यह उम्मीद नहीं कर सकते कि स्थायी कमीशन केवल पुरुषों तक ही सीमित रहेगा। महिला एसएससी अधिकारियों को स्थायी कमीशन से वंचित रखना मूल्यांकन की जड़ में बसी भेदभावपूर्ण व्यवस्था का नतीजा है।”

कोर्ट ने पाया कि महिला अधिकारियों का मूल्यांकन दोषपूर्ण और भेदभावपूर्ण ढांचे के तहत किया गया, जिसमें मनमाना कैप (सीमा) और अनुचित मूल्यांकन प्रक्रिया शामिल थी। सालाना 250 महिला अधिकारियों की सीमा को कोर्ट ने मनमाना करार दिया और कहा कि इसे पवित्र नहीं माना जा सकता।

पीठ ने वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट के मूल्यांकन में गंभीर खामियां पाईं। कोर्ट ने कहा कि महिला अधिकारियों की रिपोर्ट लापरवाही से तैयार की गईं, बिना उचित मनन के और इस पूर्वधारणा पर कि वे कभी स्थायी कमीशन की पात्र नहीं होंगी। इससे उनकी तुलनात्मक योग्यता का ध्यान नहीं रखा गया और वे पुरुष समकक्षों की तुलना में नुकसान में रह गईं।

कोर्ट ने 2019, 2020 और 2021 के सिलेक्शन बोर्डों के माध्यम से दिए गए स्थायी कमीशन को बरकरार रखा। एक बारगी उपाय के तौर पर, इन बोर्डों में विचाराधीन सभी एसएससी अधिकारियों (जिन्हें अयोग्य घोषित किया गया हो, उनको भी) को 20 वर्ष की योग्य सेवा पूरी मान ली जाएगी। उन्हें पेंशन और अन्य परिणामी लाभ मिलेंगे, सिवाय बकाया वेतन के। यह पेंशन 20 वर्ष की काल्पनिक सेवा के आधार पर 1 नवंबर 2025 से तय की जाएगी।

हालांकि, यह उपाय जज एडवोकेट जनरल और आर्मी एजुकेशन कोर कैडर की महिला एसएससी अधिकारियों पर लागू नहीं होगा।

नौसेना के मामले में, एक बारगी उपाय के तहत पात्र महिला अधिकारियों को मेडिकल फिटनेस के अधीन स्थायी कमीशन दिया जाएगा। 2009 के बाद भर्ती हुई महिला अधिकारियों को भी स्थायी कमीशन का अधिकार होगा। कोर्ट ने नौसेना के ‘डायनामिक वैकेंसी मॉडल’ को तर्कसंगत और गैर-मनमाना माना।

कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय और नौसेना की आलोचना की कि उन्होंने चयन मानदंड और अंक सार्वजनिक नहीं किए, जिससे खासकर पुरुष अधिकारियों के मामले में जटिलताएं पैदा हुईं।

सुप्रीम कोर्ट ने सशस्त्र बलों में मूल्यांकन पद्धति और वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट प्रणाली की व्यापक समीक्षा का निर्देश दिया ताकि न्यायिक हस्तक्षेप के बाद स्थायी कमीशन के पात्र बनी महिला अधिकारियों पर किसी भी तरह का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। कोर्ट का उद्देश्य था कि पिछला भेदभाव आगे महिला अधिकारियों के करियर को नुकसान न पहुंचाए।

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक जिन महिला अधिकारियों ने अपनी सेवा से हटाए जाने को लेकर अदालत में चुनौती दी थी, उन्हें 20 साल की सेवा के बराबर पेंशन पाने का हकदार माना जाएगा। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि सेना में महिलाओं के खिलाफ प्रणालीगत भेदभाव की वजह से उन्हें परमानेंट कमीशन नहीं मिल पाया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेना में केवल पुरुषों का एकाधिकार नहीं हो सकता। जस्टिस ने साफ किया कि पुरुष अधिकारी यह उम्मीद नहीं कर सकते कि भविष्य के सभी खाली पद केवल उनके लिए ही होंगे। कोर्ट के अनुसार, अवसरों की कमी और गलत तरीके से अयोग्य ठहराए जाने के कारण महिला अधिकारियों की योग्यता और उनके करियर की प्रगति पर बुरा असर पड़ा है।

यह फैसला उन महिला अधिकारियों के लिए एक बार का उपाय के रूप में आया है जो कानूनी लड़ाई के दौरान सेवा से मुक्त हो गई थीं।

यह विवाद तब शुरू हुआ जब कई महिला अधिकारी जिनमें ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का हिस्सा रहीं अधिकारी भी शामिल थीं, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट के पिछले स्पष्ट आदेशों के बावजूद केंद्र सरकार और सेना स्थायी कमीशन देने में पुरुषों के मुकाबले उनके साथ भेदभाव कर रही है। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने अब यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

Leave a Reply