गुजरात स्थानीय निकाय चुनाव और ओवैसी का अहमदाबाद दौरा

अहमदाबाद। गुजरात की सियासत में स्थानीय निकाय चुनावों से पहले माहौल गर्म है, और इसी बीच असदुद्दीन ओवैसी का अहमदाबाद दौरा कई राजनीतिक संदेश और विवाद अपने साथ लेकर आया। इस एकदिवसीय दौरे को ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (मजलिस) ने शक्ति प्रदर्शन के रूप में पेश करने की कोशिश की, लेकिन घटनाक्रम ने इस दौरे को सवालों और असहज पलों में बदल दिया।

यह दौरा ऐसे समय में हुआ जब गुजरात में 26 अप्रैल को नगर निगम, नगरपालिका और पंचायत चुनाव होने हैं। ऐसे में हर राजनीतिक दल अपनी जमीन मजबूत करने में जुटा है। लेकिन ओवैसी का यह दौरा अपेक्षित राजनीतिक प्रभाव छोड़ने में संघर्ष करता नजर आया।

पुरानी यादें और नई चुनौतियाँ

गौरतलब है कि 2020-21 के स्थानीय निकाय चुनावों से पहले जब ओवैसी अहमदाबाद आए थे, तब साबरमती रिवरफ्रंट पर उनकी विशाल सभा ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी थी। उस समय हजारों की भीड़ ने यह संकेत दिया था कि मजलिस गुजरात की मुस्लिम बहुल सीटों पर एक नई ताकत बन सकती है।

उस सभा में ओवैसी ने मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों—जैसे पीराना डंप साइट, शहरी भेदभाव और नागरिक अधिकारों—को जोर-शोर से उठाया था। उनके भाषणों का असर यह हुआ कि कुछ हद तक मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव मजलिस की ओर देखने को मिला था।

लेकिन 2026 के इस दौरे में तस्वीर बदलती नजर आई। जहां पहले उम्मीद थी, वहां अब सवाल हैं; जहां भीड़ थी, वहां अब सन्नाटा दिखा।

पहला झटका: पार्टी के भीतर से दरार

दौरे की शुरुआत से ठीक एकदिन पहले मजलिस को एक बड़ा राजनीतिक झटका लगा। अहमदाबाद के पार्षद मुश्ताक खादीवाला ने पार्टी से इस्तीफा देकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दामन थाम लिया।

यह केवल एक व्यक्ति का इस्तीफा नहीं था, बल्कि यह संकेत था कि पार्टी के भीतर असंतोष मौजूद है। चुनाव से ठीक पहले इस तरह का दलबदल यह भी दिखाता है कि जमीनी स्तर पर मजलिस अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने में संघर्ष कर रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह घटना मजलिस के लिए मनोवैज्ञानिक झटका भी है, क्योंकि इससे विपक्ष को यह कहने का मौका मिल गया कि पार्टी का जनाधार स्थिर नहीं है और मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा खो चुकी है|

उसके बाद प्रेस कांफ्रेंस में पूछे गए कुछ सवालों से ओवैसी स्पष्ट रूप से असहज नजर आए। इन सवालों में मुख्य तौर पर केवल मुस्लिम मुद्दों पर राजनीति करने और ज़मीनी संघर्ष के समय अनुपस्थित रहने, स्थानीय समस्याओं की अनदेखी करने के आरोपों से संबंधित सवाल थे।

उन्होंने जवाब देने के बजाय माइक अपने प्रदेश अध्यक्ष साबिर काबलीवाला की ओर बढ़ा दिया। काबलीवाला ने संक्षिप्त और सामान्य जवाब देते हुए कहा कि पार्टी हर जगह काम करती है और जरूरत पड़ने पर पहुंचती है।

ओवैसी ने अंत में यह जरूर कहा कि “हमारा कोई विधायक विधानसभा में नहीं है, जब होगा तो वहां भी मुद्दे उठेंगे। आप व्हाट्स एप्प नंबर दे दें हम क्या करते हैं आपको भेज देंगे|”

एक और झटका मजलिस को मिला जब खानपुर में आयोजित सभा में केवल 200–300 लोग ही पहुंचे। यह संख्या 2021 की उस ऐतिहासिक सभा से बिल्कुल उलट थी, जहां 20–25 हजार लोगों की भीड़ उमड़ी थी।कम भीड़ ने यह संकेत दिया कि मजलिस का जनाधार कमजोर पड़ा है या फिर लोगों में पहले जैसा उत्साह नहीं रहा।

सभा का आयोजन बीजेपी कार्यालय के ठीक सामने किया गया था, जिस पर भी सवाल उठे। पूर्व विधायक गयासुद्दीन शेख ने कहा कि आमतौर पर विपक्षी दलों को वहां सभा की अनुमति नहीं मिलती, ऐसे में मजलिस को अनुमति मिलना संदेह पैदा करता है।

शैख़ ने मजलिस पर बीजेपी को फायदा पहुंचाने वाली राजनीति करने के आरोप लगाए और कहा कि पार्टी केवल चुनाव के समय सक्रिय होती है ओवैसी नगर निगम और विधानसभा चुनाव में ही आते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ओवैसी और उनकी पार्टी असली उद्देश्य भारतीय जनता पार्टी को फायदा पहुंचाना है और वह मुस्लिम वोटों का विभाजन कर विपक्ष को कमजोर करने की राजनीति करते है। 

इस बीच गुजरात सरकार द्वारा यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू किए जाने और मैरिज रजिस्ट्रेशन कानून में बदलाव ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। उप मुख्यमंत्री हर्ष संघवी के “सलीम-सुरेश” बयान ने पहले ही विवाद पैदा कर दिया था। सलीम सुरेश कर बीजेपी चुनावों को हिन्दू मुस्लिम के मुद्दों पर ले जाना चाहती है|

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि: बीजेपी इन मुद्दों के जरिए चुनाव को हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की दिशा में ले जाना चाहती है।वहीं ओवैसी भी यूसीसी को प्रमुख मुद्दा बनाकर इसी विमर्श को मजबूत कर रहे हैं। 

दूसरी तरफ़, कांग्रेस डेमोलिशन, भ्रष्टाचार, खराब तन्त्र और व्यवस्था पर चुनाव ले जाने का प्रयास कर रही है ताकि लोकल मुद्दों पर ही चुनाव हो और बीजेपी को परास्त किया जाए।

हालांकि, यह भी सच है कि चुनावी राजनीति में हालात तेजी से बदलते हैं। ओवैसी अपनी आक्रामक शैली और मुद्दों को उठाने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में उन्हें पूरी तरह खारिज करना भी जल्दबाजी होगी। कांग्रेस पार्टी भी मजलिस की राजनीति पर नज़र बनाए हुए है|

गुजरात में 26 अप्रैल को 15 नगर निगम, 84 नगरपालिकाओं, 34 जिला पंचायत और 260 तालुका पंचायतों के लिए मतदान होगा, जबकि 28 अप्रैल को परिणाम घोषित होंगे। 

(कलीम सिद्दीकी पत्रकार और एक्टिविस्ट हैं।)

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