लुधियाना। ऑपरेशन ग्रीन हंट के विरोध में डेमोक्रेटिक फ्रंट, पंजाब द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में आदिवासी क्षेत्रों में क्रूर दमन का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया और झूठे केसों में फंसाकर जेल में बंद किये बुद्धिजीवियों, लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं तथा सजा पूरी कर चुके बंदियों की तत्काल रिहाई की मांग की गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता लोकतांत्रिक कार्यकर्ता एवं लेखिका सीमा आज़ाद, पंजाब से लोकतान्त्रिक कार्यकर्ता प्रो. ए.के. मलेरी और बूटा सिंह महमूदपुर ने की। सम्मेलन में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स पंजाब, रेशनलिस्ट सोसाइटी पंजाब, पंजाबी साहित्य अकादमी लुधियाना, पंजाब लोक सभ्याचारक मंच, बीकेयू (एकता उग्राहन), क्रांतिकारी किसान यूनियन, इंकलाबी केंद्र पंजाब, मुक्ति संग्राम मजदूर मंच सहित विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन में गुलज़ार सिंह पंधेर, प्रो. जोगमोहन सिंह, डॉ. हरबंस सिंह ग्रेवाल, जसवंत जीरख, क्रन्तिकारी पत्रिका सुर्ख लीह के संपादक जसपाल जस्सी, अमोलक सिंह और कंवलजीत खन्ना सहित कई प्रमुख लोकतांत्रिक, साहित्यिक और अकादमिक हस्तियां भी मौजूद रहीं।
पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला और पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ के छात्रों तथा कई सांस्कृतिक समूहों की भी सक्रिय भागीदारी रही। किसान, मजदूर, छात्र, युवा, महिलाएं, लेखक और कलाकार बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
अपने विस्तृत भाषण में सीमा आज़ाद ने कहा कि व्यापक गिरफ्तारियों, मनगढ़ंत मामलों और छत्तीसगढ़ समेत अन्य आदिवासी क्षेत्रों में चलाए जा रहे अभियानों के जरिए लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों का हनन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बस्तर, छत्तीसगढ़, झारखण्ड और अन्य आदिवासी इलाकों में ऑपरेशन कगार और इस तरह के अन्य ऑपरेशन प्राकृतिक संसाधनों—जमीन, जंगल, पानी और खनिज— सभ कुछ पूरी तरह इजारेदार कॉर्पोरेट के हवाले करने के लिए हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि अर्धसैनिक बलों की तैनाती और ड्रोन जैसी तकनीकों के उपयोग से आदिवासी क्षेत्रों में प्रतिरोध को दबाया जा रहा है, जिससे समुदायों का विस्थापन और पारंपरिक जीवन-शैली पर गंभीर असर पड़ रहा है। पूरी आदिवासी ज़िंदगी को अर्ध सैनिक बल के नियंत्रण में किया गया है। अगर जन आंदोलन के ज़रिये इसको न रोका गया तो इसी तरह क्रूर दमन से पूरे देश में संसाधनों को लूटा जायेगा।
“विचारधारा के अपराधीकरण” पर चिंता जताते हुए सीमा आज़ाद ने कहा कि असहमति रखने वाले, लोकतान्त्रिक अधिकारों की रक्षा करने वाले लोगों—जैसे अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग, उमर खालिद और पत्रकार रुपेश कुमार सिंह—को “अर्बन नक्सल” जैसे आरोपों के तहत जेल में रखा जा रहा है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि सजा पूरी कर चुके बहुत से कैदियों की रिहाई में देरी न्यायिक उदासीनता को दर्शाती है।
उन्होंने चेतावनी दी कि बीजेपी के सूरज कुंड शिवर में चर्चा किये हिन्दू राष्ट्र के राजनीतिक प्रोजेक्ट के तहत केंद्रीय ग्रह मंत्री का विचारधाराओं को अपराध की श्रेणी में रखना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए गंभीर खतरा है। पूरे मुल्क को व्यापक फासीवादी दमन की तरफ बढ़ाया जा रहा है।
सम्मेलन में जसविंदर फगवाड़ा द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किए गए। प्रमुख मांगें इस प्रकार रहीं: आदिवासी क्षेत्रों से सैन्य और अर्धसैनिक बलों को वापस बुलाना; पुलिस कैंपों और विशेष बलों की तैनाती समाप्त करना; आदिवासी समुदायों के विस्थापन पर रोक; प्राकृतिक संसाधनों के कॉर्पोरेट दोहन का अंत; यूएपीए, अफस्पा और श्रम संहिताओं जैसे कानूनों को निरस्त करना; राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को समाप्त करना; भीमा-कोरेगांव, लखनऊ साजिश और दिल्ली हिंसा से जुड़े मामलों में बंद कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों की तुरंत रिहाई; अंडरट्रायल और सजा पूरी कर चुके कैदियों की तत्काल रिहाई; संगठन और विरोध के लोकतांत्रिक अधिकारों के कथित उल्लंघन पर रोक; पंजाब में कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ों को समाप्त करना।
इसके अलावा सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी प्रस्ताव पारित किए गए, जिनमें गाज़ा और ईरान के खिलाफ अमरीका इजराइल की तरफ से चलाए जा रहे हमलावर युद्ध को समाप्त करने, भारत से इज़राइल के साथ कूटनीतिक संबंध समाप्त करने की मांग की गई और इज़राइल की तरफ से फिलिस्तीनियों को मौत की सजा का कानून पास करने और फिलिस्तीनियों के खिलाफ अन्य रूपों में दमन का विरोध किया गया।
कार्यक्रम के दौरान क्रांतिकारी गायकों—गुरमीत जज, कस्तूरी लाल, बृज राजियाना और मौसम—ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। अंत में प्रो. ए.के. मलेरी ने धन्यवाद के साथ सम्मेलन का समापन किया।
(बूटा सिंह महमूदपुर की रिपोर्ट)