कैसा ये असर है…

मकसद ढांढस देना, हिम्मत बंधाना या प्रेरित करना नहीं था। वह तो खुद अपनी दुविधा को एक्सप्लेन कर रही थीं। एक तरह से देखा जाए तो अपने अंदर आ गई एक हलकी-सी गिल्ट फीलिंग से निपट रही थीं। उन्हें पता भी नहीं चला कि इसी क्रम में वह कैसे अपने उस दोस्त के लिए ताकत का एक बड़ा स्रोत बन गईं।

मुंबई की एक बहुमंजिला इमारत की छत थी, सूर्योदय से कुछ पहले का समय था। दोनों बात करते हुए टहल रहे थे। उम्र का फासला अच्छा खासा था दोनों के बीच, लेकिन आत्मीयता के गाढ़े जज्बे ने इस फासले को इस कदर भर दिया था कि दूरी का कोई अहसास भी नहीं रह गया था उनमें। पूरी सहजता से और उतने ही खुलेपन से दोनों अपनी-अपनी परेशानियां साझा कर रहे थे।

‘उस दिन जोश में आकर इस्तीफा दे दिया नौकरी से। कुछ सोचने-विचारने का वक्त ही नहीं मिला। गुस्सा इतना ज्यादा था कि वक्त मिलता तब भी उस समय शायद ही कुछ सोच पाता…’

‘क्या अब अफसोस हो रहा है उस दिन के फैसले पर? लग रहा है कि गलती हो गई?’

‘गलती तो मैं नहीं कहूंगा… अब भी सोच कर देखता हूं तो ऐसा नहीं लगता। उन परिस्थतियों में वहां काम करते रहना मुझे कबूल नहीं था, और वह सही भी नहीं होता। लेकिन यह जरूर है कि बेरोजगारी का दौर इतना लंबा चलेगा यह नहीं सोचा था।‘

‘इस बेरोजगारी से तुम्हारी सबसे बड़ी दिक्कत क्या है? तुम्हारी जरूरतें तो शायद पूरी हो ही रही हैं पहले की तरह।’

‘हां दोस्तों की मेहरबानी है। लेकिन असल समस्या यही है कि कोई बड़ी समस्या नहीं है। न तो यहां मेरे रहने-सहने खाने-पीने में कोई दिक्कत है और न ही गांव में माता-पिता को। वहां पिताजी का पेंशन है। तो स्थिति यह है कि मेरी ट्रेनिंग और एक्सपीरिएंस के अनुरूप नौकरी मिल नहीं रही और ईंटें ढोने जैसा कोई भी काम शुरू कर दूं, ऐसे हालात नहीं हैं। लेकिन जो खालीपन है, वह अब बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा है…’

लंबा वाक्य समाप्त करते-करते नजर उनके चेहरे पर गई तो वहां कुछ कशमकश के भाव दिखे, ‘क्या सोच रही हैं आप?’

‘यार मुझे लोकेश की चिंता हो रही है। उसे नौकरी मिलनी चाहिए अब जल्दी ही।’

लोकेश भोपाल में रहने वाले उनके मामाजी का पोता था, जो यहां जॉब करता था। सिंगल होने की वजह से वह जब-तब उनके घर आता रहता था। डेढ़ महीने पहले उसकी भी नौकरी चली गई थी।

इस जवाब ने उसे व्यथित कर दिया, ‘यार मैं आपके सामने हूं, छह महीने हो गए मेरी नौकरी गए। लोकेश की बेरोजगारी को दो महीने भी नहीं हुए हैं और आप मेरे बजाय उसकी चिंता कर रही हैं?’

‘नहीं, तुम्हारी मुझे चिंता नहीं है। तुम्हें मैं जानती हूं। मुझे पता है कि तुम छह महीने क्या एक साल, डेढ़ साल भी बगैर नौकरी के रहे तो संभाल लोगे। तुम्हारी पर्सनैलिटी पर उसका कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन उसके व्यक्तित्व में मुझे अभी से समस्याएं दिखने लगी हैं। इसलिए उसकी चिंता है।’

बेरोजगारी की चुनौती और भविष्य की अनिश्चितताओं से जूझते उसके मन के लिए ये शब्द एक अमृतकोश बन जाएंगे, इसका अंदाजा शायद दोनों में से किसी को नहीं था। दशकों बाद, आज भी जब मुश्किलें भारी पड़ने लगती हैं तो उनके वे शब्द इसके काम आते हैं। यह शायद उनके व्यक्तित्व का जादू था, या दोनों के बीच के अनूठे रिश्ते का कमाल या सीधी-सच्ची बात का असर या…।

(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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