जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे, तो एक डॉलर की कीमत करीब 59 रूपए थी। नरेंद्र मोदी के पूरे कार्यकाल में रूपए की कीमत में 64 प्रतिशत की गिरावट आई है। रूयया गिरता है, तो देश की प्रतिष्ठा गिरती है, पता नहीं नरेंद्र मोदी को अपना यह जुमला याद है या नहीं। क्यों इस गिरावट को भारत सरकार नहीं रोक पा रही है और न रोक पाने की स्थिति में है। इसके कारणों पर नजर डालते हैं-
वर्तमान समय में रूपया एक डॉलर के मुकाबले गिरकर 96 रूपए हो गया। जनवरी में एक डॉलर की कीमत करीब 90 रूपए थी। द इंडियन एक्सप्रेस ने अर्थशास्त्रियों और बाजार के जानकारों के हवाले से कहा है कि रूपया डॉलर के मुकाबले 100 रूपए की तक के गिरावट को जल्द पार कर जाएगा।
भारत सरकार इस गिवरावट रोक पाने में सक्षम नहीं है। भारतीय अर्थव्यवस्था की निम्न बुनियादी कमजोरियों के चलते इस गिरावट को रोक पाना संभव नहीं दिख रहा है-
1- भारत का विदेशी मुद्रा भंडार गिर रहा है
भारत का वर्तमान विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 697 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग 696.99 बिलियन डॉलर) है। यह आँकड़ा भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा मई 2026 में जारी ताज़ा डेटा पर आधारित है।
पिछले तीन महीनों में इसमें करीब 38 अरब डॉलर की गिरावट आई है। देश- दुनिया के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह गिरावट जारी रहने वाली है या विदेशी मुद्रा भंडार फिलहाल बढ़ने वाला नहीं है।
खुद प्रधानमंत्री ने सोना न खरीदने, उर्जा की खपत कम करने, विदेश यात्रा कम करने और खाद ( यूरिया आदि) की खपत की अपील इसी मुख्य वजह से की है, क्योंकि इन चारों चीजों पर विदेशी मुद्रा विशेषकर डॉलर खर्च होता है।
यदि विदेशी मुद्रा भंडार गिर रहा है और गिरने की ओर बढ़ता जा रहा है, इस स्थिति में रिजर्ब बैंक बाजार में डॉलर का फ्लो ( अधिक मात्रा में डॉलर) बढ़ा कर रूपये की गिरावट को रोक नहीं सकता है। उसके हाथ पूरी तरह बंधे हैं। यदि वह डॉलर फ्लो बढ़ाता है, तो विदेशी मुद्रा भंडार और तेजी से गिरेगा।
2- सिर्फ जनवरी 2026 के बाद से विदेशी निवेशकों — विशेषकर फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (एफपीआई/एफआईआई) — ने भारतीय शेयर बाजार से भारी निकासी की है-
ताज़ा उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार:
मई 2026 तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजार से कुल लगभग ₹2.2 लाख करोड़ (₹2.2 ट्रिलियन) निकाले हैं।
डॉलर में यह राशि लगभग 25–26 अरब अमेरिकी डॉलर के बराबर बैठती है।
केवल जनवरी 2026 में ही लगभग ₹35,962 करोड़ की निकासी हुई थी।
अप्रैल 2026 तक कुल आउटफ्लो लगभग ₹1.92 लाख करोड़ पहुँच चुका था।
विदेशी निवेशकों की यह निकासी लगातार जारी है। इसकी फिलहाल वापसी की कोई उम्मीद नही लग रही है। भारत सरकार हर आर्थिक सर्वे में विदेशी निवेश में लगातार कमी बात स्वीकार कर रही है। इसके दो कारण हैं-
पहला भारतीय अर्थव्यवस्था के बेहतर भविष्य को लेकर निवेशक आश्वस्त नहीं है। दूसरे देशों में उन्हें निवेश ज्यादा लाभदायक और सुरक्षित लग रहा है। व्यापार घाटा वाले देशों में विदेशी निवेश मुद्रा भंडार को बढ़ाने और सुरक्षित लेवल तक रखने का एक बड़ा स्रोत होता है।
3- लगातार बढ़ता व्यापार घटा ( जिसे करेंट अकाउंट डिफिसिट) कहते हैं-
2025-26 में भारत का प्रति महीने व्यापार घाटा करीब 25-30 अरब डॉलर लगातार बना हुआ है। मतलब भारत प्रति महीने जितना वस्तुयों-सेवाओं का निर्यात कर रहा है और विदेशों में काम करने वाले भारतीयों द्वारा भेजा गया पैसा (Remittances) आ रहा है। उसकी तुलना में प्रति महीने भारत 25-30 अरब डॉलर अधिक का आयात कर रहा।
इसे सिर्फ चीन के एक उदाहरण से समझ जा सकता है। भारत चीन को सिर्फ 16 से 18 अरब डॉलर का निर्यात करता है, जबकि आयात 100 से 110 अरब डालर के आस-पास करता है।
चीन से भारत का व्यापार घाटा करीब 90- 100 अरब डॉलर के बीच हो गया है।
विदेशों से जो भारतीय पैसा भेज रहे हैं, उसमें एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीयों की है, उनकी नौकरी और पैसा दोनों फिलहाल गहरे संकट में है।
डॉलर के मुकाबले भारतीय रूपये की कीमत की गिर रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर मजबूत या और ताकतवर हो रहा है, या इसकी वजह से गिर रहा है। सच यह है कि अमेरिकी डॉलर अधिकांश मुद्राओं की तुलना में लगातार कमजोर हो रहा हैं। हां रूपए की तुलना में वह लगातार ताकतर हो रहा है।
जनवरी–फरवरी 2026: डॉलर कमजोर हुआ
साल की शुरुआत में डॉलर इंडेक्स काफी गिरा था।
जनवरी 2026 में डॉलर इंडेक्स लगभग 96 तक गिर गया, जो लगभग 4 वर्षों का निचला स्तर था।
यूरो, पाउंड और कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएँ डॉलर के मुकाबले मजबूत हुईं।
बीच में डॉलर थोड़ा सा मजबूत हुआ था।
मुख्य रूप से भारतीय रूपया भारतीय अर्थव्यस्था की अपनी कमजोरियों से गिर रहा है।
भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी के दो सबसे बड़े सबूत हैं-
1- पहला विदेशी निवेश का लगातार गिरना और विदेशी निवेशकों द्वारा लगातार अपना पैसा ( डॉलर में) निकालना।
2- देशी निजी निवेशकों द्वारा भारत में निवेश न करना
हर आर्थिक सर्वे में यह कहा जा रहा है कि कार्पोरेट मुनाफे में लगातार वृद्धि हो रही है, लेकिन निजी निवेशक पर्याप्त मात्रा में निवेश नहीं कर रहे हैं।
सच यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य इंजन सरकारी (सार्वजनिक) निवेश बना हुआ है। नरेंद्र मोदी सरकार जनता के टैक्स के पैसे, सार्वजनिक परिसंपत्तियों को बेंचकर, प्राकृतिक संसाधनों को कार्पोरेट के हवाले कर और पहले से मौजूद सार्वजनिक धन (बैंकों के रिजव आदि) आदि आए पैसा का इस्तेमाल करके बड़े पैमाने पर आधारभूत ढ़ांचे में निवेश कर रही है।
देशी-विदेशी निवेशक भारत में कई सालों से निवेश के लिए ज्यादा उत्साहित और इच्छुक नहीं रह गए हैं, क्योंकि जीडीपी के सारे लुभावने आंकड़ों के बाद भी भारत में अर्थव्यवस्था के मुख्य आधार मैनुफैक्चरिंग का जीडीपी में हिस्सेदारी 13-15 प्रतिशत के बीच बनी हुई है। फिलहाल की गिरकर 13 प्रतिशत हो गई है।
एआई, ग्रीन एनर्जी, बैट्री, रोबोटिक्स, इलेक्ट्रिक वाहन, चीप, रेयर अर्थ जैसी आधुनिक टेक्नालॉजी और उत्पादन में भारत बहुत झूठ गया है। भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ निजी उपभोग ( करीब 50 प्रतिशत से अधिक) या जिसे मांग कहते हैं, बढ़ने की नाम नहीं ले रही है।
कुछ लोगों के जेब में खूब पैसा है, लेकिन बहुलांश की जेब खाली है या मध्यवर्ग के जिन लोगों के पास, जो थोड़ा पैसा है, उसे भावी असुरक्षा को ध्यान में रखकर भविष्य के लिए लोग रखे हुए हैं। एक छोटा से भारत में सेगमेंट है, जो मालामाल है, वहीं बड़े पैमाने पर खरीददारी कर रहा है। इसका एक बड़ा प्रमाण यह है कि बड़ी और मंहगी कारें खूब बिक रही हैं, लेकिन छोटी कारों और कम बजट की कारों के खरीदार खत्म हो रहे हैं या कम हो रहे है।
रुपए का लागतार गिरना भारती की अर्थव्यवस्था की बुनियादी कमजोरियों का मूर्त प्रतीक है। विकसित देश का ख्वाब एक जुमला है। हकीकत यह है कि हम अपने सर्वाइवल के संकट से जूझ रहे हैं।