लखनऊ। मज़दूर संगठनों सोमवार, 18 मई को एक समाचार पत्र के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उस बयान को पूर्णतया ग़ैर ज़िम्मेदाराना बयान करार दिया है जिसमें योगी ने ट्रेड यूनियन को उद्योगों को बंद करने और श्रमिकों को भुखमरी के कगार पर पहुंचाने का ज़िम्मेदार बताया है। मजदूर संगठनों ने इस बयान की कड़ी निंदा की है।
प्रेस को जारी बयान में विभिन्न ट्रेड यूनियनों ने कहा कि दरअसल औद्योगिक शांति को स्थापित करने के लिए पूंजीवाद ने लंबे संघर्षों के बाद ट्रेड यूनियन को गठित करने का अधिकार दिया था। ताकि एक सौहार्दपूर्ण वातावरण में बेहतर उत्पादन हो सके और एक सुरक्षित व समृद्ध श्रमबल भी कार्य कर सके। भारत में भी पहला मजदूरों को अधिकार 1926 में ट्रेड यूनियन के गठन के कानून के जरिए मिला था। संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत भारत में ट्रेड यूनियन बनाना मौलिक अधिकार के रूप में शामिल किया गया है। ऐसे में मुख्यमंत्री का बयान संविधान के विरुद्ध है और लोकतंत्र के लिए अशुभ है।
मजदूर नेताओं ने कहा कि जिस कानपुर का उदाहरण मुख्यमंत्री जी ने अपने वक्तव्य में दिया उसकी भी सच्चाई यह है कि अंबानी के रिलायंस टेक्सटाइल उद्योग को बाजार उपलब्ध कराने के लिए कानपुर की एनटीसी और बीआईसी की मिलों को भारत सरकार ने बंद कर दिया। लोगों को जानकर आश्चर्य होगा कि 12 सालों तक मजदूरों को बिना उत्पादन कराए पूरा वेतन दिया गया।
बाद में अटल बिहारी वाजपेई की भाजपा सरकार ने उन कंपनियों को पूरे तौर पर बंद करने और उनकी जमीनों को रियल स्टेट के कारोबारियों को बेच देने का काम किया। यह सिर्फ कानपुर में ही नहीं हुआ बल्कि पूरे देश में भाजपा सरकार ने इस बंदी को किया। अभी भी भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में सरकारी रिपोर्ट के अनुसार लाखों उद्योग मंदी, नोटबंदी और गलत जीएसटी के कारण बंद हो गए।
मजदूर नेताओं ने कहा कि उद्योग ट्रेड यूनियनों की वजह से बंद नहीं हुए, बल्कि नव उदारवादी आर्थिक नीतियों, निजीकरण के दबाव, निवेश की कमी, बढ़ती लागत और कुप्रबंधन के कारण कमजोर पड़े। ट्रेड यूनियन मजदूरों के अधिकार, सम्मानजनक वेतन और रोजगार सुरक्षा के लिए बनी हैं। कई मामलों में यूनियनों ने ही उद्योगों को बचाने में भूमिका निभाई है क्योंकि सुरक्षित और संतुष्ट मजदूर ही उत्पादन को मजबूत बनाते हैं।
बयान में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में मजदूर आधुनिक प्रकार की बंधुआ प्रथा में काम करने के लिए मजबूर है। सरकार ने कारखाना अधिनियम में संशोधन कर काम के घंटे 12 कर दिए। नए लेबर कोड के जरिए न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा, सामूहिक हित प्राप्त करने के अधिकार छीन लिए गए हैं। पिछले 12 सालों से न्यूनतम मजदूरी तक का वेज रिवीजन प्रदेश सरकार ने नहीं किया। इस गलती को 17 अप्रैल 2026 को जारी अपने नोटिफिकेशन में सरकार ने खुद व स्वीकार किया है।
मुख्यमंत्री ने नोएडा श्रमिक आंदोलन के दौरान घोषणा की थी कि मई माह में उत्तर प्रदेश में न्यूनतम मजदूरी का वेज बोर्ड गठित किया जाएगा। आंगनबाड़ी, आशाओं का मानदेय बढ़ाया जायेगा, आउटसोर्सिंग मजदूरों का वेतन बढ़ेगा। लेकिन आज तक यह सब नहीं हुआ। दरअसल सीएम का ट्रेड यूनियनों को दोष देना असली आर्थिक और नीतिगत विफलताओं से ध्यान हटाने जैसा है। जिस पर उत्तर प्रदेश सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए।
बयान एटक से चंद्रशेखर, सीटू से प्रेमनाथ राय, एचएमएस से अविनाश पांडेय, इंटक से दिलीप श्रीवास्तव, वर्कर्स फ्रंट से दिनकर कपूर, इंजीनियर दुर्गा प्रसाद, समाजवादी मजदूर सभा से धनीराम श्रमिक, निर्माण मजदूर नेता प्रमोद पटेल, नौमीलाल, घरेलू कामगार संघ से नीतू पाल, आंगनबाड़ी यूनियन से बबिता आदि ने जारी किया।
(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)