चिंता इनकी, और उनकी

‘देखो, जिंदगी में जैसे कठिन दौर का आना तय है, वैसे ही उसका जाना भी निश्चित है। ये दौर चले ही जाते हैं, हम इनका सामना गरिमा, साहस और धैर्य बनाए रखते हुए करें तब भी और रोते-पीटते, गिड़गिड़ाते हुए करें तब भी। सवाल यह है कि यह कठिन दौर हमारी और आसपास के अन्य लोगों की स्मृति में किस रूप में दर्ज होता है।’

उन वरिष्ठ मित्र के शब्दों में उनका लंबा अनुभव ही नहीं, उस अनुभव से उपजी सीख भी झलक रही थी, ‘मुश्किल हालात में सबसे ज्यादा जरूरत होती है अपने अंदर की ताकत बनाए रखने की। ताकत तो हमारे अंदर होती है, लेकिन उसका कोटा सीमित रहता है। इसलिए चुनौती यह सुनिश्चित करने की होती है कि हम अलग-अलग स्रोतों से लगातार ताकत लेते रहें और उन लोगों से संपर्क कम से कम रखें जो ताकत देने के बजाय हमें और कमजोर करते हों।’

उनकी लड़ाई दिल्ली के मीडिया जगत में खासी चर्चित रही है। हिंदी की एक जानी-मानी समाचार एजेंसी को एक धनपशु के हाथों जाने से रोकने के लिए उनने कुछ भी उठा नहीं रखा। नतीजा, हालांकि यह हुआ कि खुद उन्हें ही उस एजेंसी से बाहर होना पड़ा और एजेंसी का भी आखिरकार वही हुआ जो होना था। लेकिन ऐसी लड़ाइयां अपने नतीजों से नहीं, लड़ने वाले के जज्बे से जानी जाती हैं। स्वाभाविक ही, उनकी वह लड़ाई आज भी एक मिसाल के रूप में याद की जाती है। लेकिन, अभी यह बात साफ नहीं हो पा रही थी कि उनका, असल में मतलब क्या है।

शायद उन्हें भी अंदाजा था इसका। उदाहरण देकर अपनी बात साफ करते हुए बोले, ‘मेरे सामने जब यह स्पष्ट हो गया कि दुश्मन कितना ताकतवर है और मेरे संसाधन कितने कम, तो मैंने कुछ भरोसेमंद मित्रों से सलाह-मशवरा करने की सोची। पहले जिस मित्र के पास पहुंचा, वे एक जाने-माने ट्रेड युनियनिस्ट थे। उन्हें मेरी परिस्थिति की पूरी जानकारी थी। उन्होंने कहा, आपने खुद को जिन हालात में फंसा लिया है, आप पूरी तरह अकेले पड़ जाएंगे। उसके बाद जिस दोस्त के घर गया, वह नामी विद्वान प्रफेसर और चर्चित स्तंभ लेखक रहे हैं। उन्होंने मेरे एक सहकर्मी का नाम लेते हुए कहा कि मुझे आप दोनों की बहुत चिंता है।’

हम्म…

‘मैं वापस लौट आया और उस पूरे दौर में उन दोनों से दोबारा कभी बात नहीं की।’

‘तो क्या कठिन हालात में फंसे मित्र को आगाह करना या उसकी चिंता करना गलत है?’

‘नहीं, खुद को कठिन लड़ाई के लिए तैयार कर रहे व्यक्ति के मनोबल की चिंता न करना गलत है। उससे ज्यादा गलत है ऐसे मित्रों को बर्दाश्त करना, जो लड़ाई की अहमियत समझते हुए भी आपके मनोबल से ज्यादा आपकी चिंता करें।‘

(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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