जनजाति सांस्कृतिक समागम – आदिवासी के हिंदुकरण का प्रयास 

24 मई 2026 को दिल्ली के लाल किला मैदान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े जनजाति रक्षा मंच ने बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि मनाने के नाम पर ‘जनजाति संस्कृतिक समागम’ का आयोजन किया था। कहने को तो यह सांस्कृतिक कार्यक्रम था पर इसकी वास्तविकता इसके नारों में दिखती है जिसमें कहा गया कि ‘सनातन ही सरना है’, ‘सनातन ही जनजाति है’, ‘जो नहीं महादेव का वह नहीं हमारा’।

साफ है कि यह आदिवासी समाज की हिंदुकरण और उसे हिंदुत्व के राजनीतिक कार्यक्रम में समाहित करने का राजनीतिक प्रयास था। इस कार्यक्रम में ईसाई धर्म ग्रहण करने वाले आदिवासियों को संविधान की धारा 342 व 366 में संशोधन कर जनजाति की सूची से बाहर करने के राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ने का प्रयास किया गया। जो आदिवासियों में विभाजन करने की आरएसएस की कोशिशों को परवान चढ़ाना था।

गौरतलब है कि कार्यक्रम में गृहमंत्री अमित शाह के संबोधन में एक बार भी ‘आदिवासी’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया और कई बार जनजाति समुदाय को ‘वनवासी’ कहकर संबोधित किया गया। स्वभावतः इसका पूरे देश के आदिवासी संगठनों ने विरोध किया। कई संगठनों ने यह भी मांग की है कि सरकार आदिवासी धर्म कोड का कालम जनगणना में दे। ताकि धार्मिक विभाजन का प्रयास ही खत्म हो जाए।

ऐतिहासिक तथ्य यह है कि आदिवासी नायक बिरसा मुंडा के नाम पर यह आयोजन हुआ वह बिरसाइट धर्म व आदिवासियों के अगुआ ही इसलिए बन सके क्योंकि उन्होंने ईसाईयों के बने स्कूल में शिक्षा ली थी और इस शिक्षा ने ही उनके संघर्ष को दिशा दी। झारखंड आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले और झारखंड में आदिवासियों के बीच काम करने वाले वीर भारत तलवार लिखते हैं कि शिक्षित शहरी आदिवासी मध्यवर्ग का विकास 20वीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक से ही दिखाई देने लगा।

इसकी शिक्षा का प्रचार मुख्य रूप से इसाई मिशनरियों ने किया इसलिए इसाई बने आदिवासी ही पहले शिक्षित हुए और झारखंड आंदोलन की शुरुआत में इन्हीं लोगों ने नेतृत्व दिया। उनके अनुसार सबसे पहले 1920 के करीब छोटा नागपुर उन्नत समाज संस्था का गठन किया गया। जिसने 1929 में साइमन कमीशन के सामने आदिवासी स्थानीय स्वायत्त प्रशासन की मांग की।

इसी वर्ग के लोगों ने 1930 के अंत में आदिवासी किसान सभा व आदिवासी महासभा का गठन किया। जिसके आधार पर 1950 में जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में झारखंड पार्टी का गठन हुआ है। जुएल लकड़ा, जुलियास तिग्गा, प्यारा केरकेट्टा आदि तब के शिक्षित मध्य वर्गीय प्रतिनिधि थे।

भारत के संविधान के अनुसार अनुसूचित जनजाति को धर्म के आधार पर नहीं बांटा गया है। क्योंकि आदिवासी श्रेणी धार्मिक आधार पर भारत में मौजूद धर्म से अलग श्रेणी रही है। इसलिए भी इसे हिंदू, मुस्लिम, इसाई, सिख, बौद्ध जैन आदि धार्मिक श्रेणी में नहीं रखा गया।

आदिवासी विद्वान डॉक्टर रामदयाल मुंडा लिखते हैं कि प्रचलित हिंदू, ईसाई या इस्लाम परमेश्वर के ‘घर’ के रूप में मंदिर, गिरजा और मस्जिद की तरह किसी ढांचे के निर्माण की अनावश्यकता और उनकी जगह प्रकृति निर्मित जंगल, पहाड़ और नदियों को ही परमेश्वर के घर के प्रतीक रूप में स्वीकृत आदि धर्म की विशेष पहचान कही जा सकती है। उनके अनुसार आदि धर्म से हमारा तात्पर्य भारतीय आदिवासियों की धार्मिक आस्थाओं के उसे मूल स्वरूप से है।

जिसे प्रकांतर में एनिमिज्म, एनिमिस्टिक रिलिजन, प्रिमिटिभिज्म, प्रिमिटिव रिलिजन, एबोरिजिनल रिलिजन, आदिवासी धर्म, जनजाति धर्म, सारनाइज्म, सरना धर्म, बोंगाइज्म इत्यादि नाम से विहित किया गया है। भारतीय संविधान में आदिवासियों को सांस्कृतिक रूप से विशेष समुदाय माना गया क्योंकि उनकी कोई स्वतंत्र धार्मिक पहचान नहीं है। इसलिए वह आदि धर्म के रूप में सरना धर्म को मान्यता देने की बात करते हैं।

1965 में बनी लोकुर कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार जनजाति वह है जो आदिम/पारंपरिक जीवन शैली, विशिष्ट संस्कृति,भौगोलिक अलगाव, मुख्यधारा से सीमित संपर्क, सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन की पहचान रखता है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2(2) स्पष्ट रूप से कहती है कि यह अधिनियम अनुसूचित जनजातियों पर तब तक लागू नहीं होगा, जब तक कि केंद्र सरकार अधिसूचना द्वारा ऐसा घोषित न करे।

यह प्रावधान स्वयं यह स्थापित करता है कि आदिवासी समुदायों को स्वाभाविक रूप से हिंदू धर्म या हिंदू विधि के अंतर्गत नहीं माना गया है। मधु किश्वर केस में सुप्रीम कोर्ट ने भी यह माना है कि आदिवासी कोई ‘हिंदू उप समूह’ नहीं बल्कि एक स्वतंत्र समुदाय है, जिसकी अपनी परंपराएं और कानूनी पहचान है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म व आस्था को मानने की पूरी स्वतंत्रता देता है।

बावजूद इसके आरएसएस का पूरा जोर आदिवासियों की विशिष्ट सभ्यता, संस्कृति, भाषा, बोली, लिपि, रीति रिवाज, परम्पराएं आदि को खत्म कर उनके हिंदुकरण पर है। यही कारण है कि आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी जनजाति समुदाय को ‘आदिवासी’ नहीं ‘वनवासी’ अर्थात ‘जंगली’ कहती है। डॉ रामदयाल मुंडा के शब्दों में हिंदू में आदिवासी समाज को समाहित करने की गुप्त योजना का परिणाम आदिवासी विहीन क्षेत्र और आदिवासी विहीनता है।

दरअसल यही आरएसएस का मूल मकसद है आज जिन इलाकों में आदिवासी रहते हैं और जो खनिजों से प्राकृतिक संपदा से भरपूर है वहां के जल, जंगल, जमीन, पहाड़, पानी, नदी आदि सब कुछ अडानी-अंबानी जैसे चंद कॉर्पोरेट घरानों के हवाले कर दिया गया है। हाल ही में मध्य प्रदेश के सरगुजा में हंसदेव का सबसे बड़ा जंगल अडानी के लिए काटा जा रहा है और वहां के आदिवासियों को बेदखल किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट तक ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। ऐसे ही अंडमान निकोबार में अडानी को दी गई 72 हजार करोड़ की ग्रेट निकोबार टाउनशिप के नाम पर वहां के नेग्रिटो मूल की जनजातियों ग्रेट अंडमानी, ओंगे, जारवा और सेंटिनली है, के अस्तित्व पर ही खतरा पैदा हो गया है। ऐसी हालत में अपनी अस्मिता व अस्तित्व की रक्षा के लिए आंदोलनरत आदिवासियों के विरुद्ध मोदी सरकार ने युद्ध छेड़ दिया है। नक्सल सफाए के नाम पर सैकड़ो फर्जी एनकाउंटर किए गए, पुलिस द्वारा भयानक यातनाएं, आदिवासी महिलाओं के साथ सामुहिक बलात्कार, फर्जी मुकदमे आम बात बन गई है। 

यहां तक कि आदिवासियों के हितों के लिए बने कानून को समाप्त करने में भी मोदी सरकार लगी हुई है। नए वन अधिनियम से पेसा कानून व वनाधिकार कानून में ग्राम सभाओं को मिली शक्तियों को छीन लिया गया है। यह याद रखना होगा कि आदिवासियों की विशेष पहचान छीन कर और उनके हिंदू करण की प्रक्रिया के बाद संविधान की पांचवी या छठी अनुसूची में जो अनुसूचित जनजाति को विशेष अधिकार प्राप्त है उसे भी समाप्त कर दिया जाएगा।

सरकार आदिवासी समाज की जनगणना में आदि धर्म का कॉलम देने की लोकप्रिय मांग को भी सुनने को तैयार नहीं है। जबकि 2020 में ही झारखंड विधानसभा में सरना धर्म कोड को शामिल करने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेज दिया गया है। आदिवासियों की यह मांग है कि 1961 के पूर्व की तरह जनगणना में आदिवासी धर्म का कालम दे दिया जाए जिससे कि उनके बीच में धार्मिक आधार पर विभाजन करने की सारी कोशिशें को लगाम लग सके।

इसी तरह बहुतेरे आदिवासी समुदाय देश में है जिन्हें आज तक आदिवासी का दर्जा नहीं मिला जिसमें प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश का कोल आदिवासी समुदाय है। सब मिला जुलाकर कहा जाए तो आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी की आदिवासी समाज के हिंदूकरण की करने और हिंदुत्व के राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल करने यह कोशिश और कुछ नहीं देशी- विदेशी कॉर्पोरेट के हाथों आदिवासी इलाकों को सौंपने के वृहद एजेंडे का ही भाग है। जिसे पूरे देश का आदिवासी समुदाय समझ रहा है और इसका प्रतिवाद कर रहा है। 

(दिनकर कपूर आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के प्रदेश महासचिव हैं।) 

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