तमिलनाडु में जोसेफ विजय ने 10 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उनकी सरकार बने अभी महज बीस दिन हुए हैं। इसलिए इतने कम दिनों में सरकार के कामकाज का मूल्यांकन या उनके राजनीतिक भविष्य के बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं की जानी चाहिए। लेकिन शुरुआती संकेत बहुत अच्छे नहीं हैं।
चुनावी नतीजे से पूरे देश को चकित करने वाले जोसेफ विजय ने जब कुछ शुरुआती मुश्किलों के बाद अपनी सरकार बनाई तो राज्य में उनका जबर्दस्त अभिनंदन हुआ। दो वर्ष के अपने राजनीतिक अभियान के बल पर अभिनेता से नेता बने विजय ने डीएमके जैसे ताकतवर दल को पीछे छोड़ते हुए अपनी पार्टी-टीवीके की अगुवाई में सरकार बनाई। टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर जरूर उभरी पर उसे पूर्ण बहुमत नहीं मिला।
इसलिए टीवीके को कांग्रेस, सीपीआई-सीपीएम, वीसीके और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग जैसे दलों के समर्थन से अपनी सरकार बनानी पड़ी। कांग्रेस ने दो मंत्रियों के साथ कैबिनेट में हिस्सेदारी भी की।
सरकार का हिस्सा होने के नाते कांग्रेस ने अभी तक जोसेफ विजय या उनके शासन पर कोई नकारात्मक टिप्पणी नहीं की है लेकिन वामपंथी पार्टियों और वीसीके जैसे टीवीके के सहयोगी दलों ने महज 20 दिनों के अंदर सरकार की आलोचना शुरू कर दी है। आलोचना का स्वर अभी बहुत तीखा नहीं है पर वह सार्वजनिक मंचों से सुना जा रहा है।
मुख्यमंत्री विजय के लिए निश्चय ही यह गंभीर चिंता की बात है। हालांकि वह चिंतित नहीं दिखते। शायद सहयोगी दलों की आलोचना से उन्हें किसी तरह के खतरे की आशंका नहीं है। क्या इसलिए कि उन्होंने ऐसी किसी स्थिति से निपटने का वैकल्पिक इंतजाम कर रखा है? तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक से विधायकों के टूटने और जोसेफ विजय की पार्टी की तरफ आकर्षित होने का सिलसिला जारी है। क्या ये ‘हार्स-ट्रेडिंग’ नहीं है?
चुनावी राजनीति में बिल्कुल नया होने के चलते ज्यादा लोग समझ रहे थे कि विजय और उनकी पार्टी, तिकड़म, तोड़फोड़ और विधायकों को पटाने जैसी अनैतिक धंधेबाजी में नहीं उतरेगी। पर टीवीके किसी पुरानी-धुरंधर चुनावी पार्टी की तरह वह सब कुछ कर और करा रही है जिसकी उम्मीद उससे नहीं थी। पिछले दिनों वीसीके के एक विधायक को भी मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया जबकि शुरू में वीसीके ने कहा था कि वह भी वामपंथी पार्टियों की तरह सरकार में शामिल नहीं होगी।
उसका समर्थन बाहर से होगा ताकि विजय की सरकार की स्थिरता बनी रहे और तमिलनाडु में राष्ट्रपति-शासन लगाने की केंद्र की योजना पूरी न हो सके। डीएमके ने भी अपने पूर्व गठबंधन सहयोगियों-वामपंथी पार्टियों और वीसीके आदि के जोसेफे विजय के गठबंधन में जाने पर आपत्ति नहीं जताई। लेकिन अब जब विजय डीएमके के इन गठबंधन सहयोगियों को मंत्री बनाकर सरकार में शामिल कर रहे हैं, डीएमके में पूर्व सहयोगी दलों के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है।
डीएमके नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री ए राजा के तीखे बयान को इसी रूप में देखा गया। लेकिन डीएमके चीफ एम के स्टालिन ने अपने पार्टी नेताओं को इस मामले में वीसीके या इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सदस्यों पर छींटाकसी न करने की हिदायत दी। पर द्रमुक समर्थकों में वीसीके और मुस्लिम लीग के नेताओं को लेकर काफी नाराजगी बताई जा रही है।
इस विवाद में कहीं न कहीं जोसेफ विजय की साफ-सुथरी शख्सियत वाली छवि भी प्रभावित हो रही है। पहले अन्नाद्रमुक के कुछ सदस्य उनकी पार्टी की तरफ मुखातिब हुए थे और अब वीसीके-मुस्लिम लीग को सरकार में शामिल करने का फैसला कर लिया गया। बाहर से समर्थन करने वालों में अब सिर्फ वामपंथी ही बचे है।
जोसेफ विजय की सबसे ज्यादा आलोचना दो ऐसे खास मुद्दों को लेकर हो रही है, जो तमिल-स्वाभिमान और उच्च शिक्षा क्षेत्र में राज्य के अधिकार की संवैधानिक मंजूरी से जुडे हुए हैं। पिछले दिनों विजय सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री एम विश्वनाथन ने बयान दिया कि कोई जरूरी नहीं कि राज्य के विश्वविद्यालयों के चांसलर मुख्यमंत्री ही हों!
दरअसल, इस मुद्दे पर तमिलनाडु विधानसभा ने पिछली सरकार के दौरान एक प्रस्ताव प्रचंड सहमति से पारित कर चुकी है कि राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के चांसलर निर्वाचित मुख्यमंत्री होंगे, मनोनीत राज्यपाल नहीं। मजे की बात कि इस सवाल पर पिछली सरकार ने केंद्र से जमकर संवैधानिक संघर्ष किया। उसे सुप्रीम कोर्ट से भी संरक्षण मिला। ऐसी स्थिति में अगर टीवीके सरकार राज्य के हक को नजरंदाज कर चांसलर बनने का मौका राज्यपाल को सौंपने का फैसला करती है तो पूरे सूबे में इसका असर पड़ना लाजिमी है।
मदुरै में दिये शिक्षामंत्री के बयान पर सिर्फ डीएमके ही नहीं, सरकार में शामिल वीसीके ने भी कड़ा प्रतिवाद किया। यही नहीं, भाजपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने वाली अन्नाद्रमुक और पीएमके ने भी टीवीके सरकार के रूख की आलोचना की। वीसीके ने विजय से पूछाः क्या मंत्री का बयान सरकार का आधिकारिक बयान है? मुख्यमंत्री को स्पष्टीकरण देना चाहिए।
लेकिन मुख्यमंत्री खामोश रहे। दिलचस्प बात कि उक्त बयान देने वाले उच्च शिक्षामंत्री विश्वनाथन कांग्रेस कोटे से कैबिनेट में लिये गये हैं। वह मुख्यमंत्री की लाइन से अलग जाकर बयान कैसे दे सकते हैं? राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री विजय राज्य के अपने संवैधानिक अधिकारों और अपेक्षित स्वायत्तता जैसे सवालों को लेकर राज्य की पूर्व डीएमके सरकार की तरह केंद्र से उलझना नहीं चाहते।
समझा जाता है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने पहले दिल्ली दौरे में प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह आदि से मिलने के बाद उनका रूख केंद्र के प्रति और लचीला हुआ है। पीएमके चीफ अम्बुमनि रामदास ने कहा कि राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयक और सु्प्रीम कोर्ट से यह अधिकार मिला है कि चांसलर के पद पर राज्य का मुख्यमंत्री ही रहेगा। फिर टीवीके सरकार पीछे क्यों हट रही है?
विवाद का एक और बड़ा मुद्दा है-तमिलनाडु का आधिकारिक राज्य-गीत। बताते हैं कि मुख्यमंत्री विजय ने अपने दिल्ली दौरे में इस बारे में प्रधानमंत्री मोदी से निवेदन किया था कि तमिल राज्यगीत, वंदे मातरम और राष्ट्रगान के गाये जाने के क्रम के बारे में वे शासकीय स्पषटीकरण जारी करा दें। तमिलनाडु में पहली बार जोसेफ विजय के शपथ-ग्रहण समारोह में तमिल राज्यगीत को आखिर में गाया गया था। इस पर राज्य में काफी रोष था।
इस बारे में तमिलनाडु के ज्यादातर दलों ने मुख्यमंत्री विजय की अनुभवहीनता और राजनीतिक प्रतिबद्धता में कमी की आलोचना की। इनका कहना था कि इस मुद्दे को राज्यस्तर पर स्वयं तय करना चाहिए न कि प्रधानमंत्री के लिए छोड़ना चाहिए। इसके अलावा भी कई मुद्दों पर जोसेफ विजय के कामकाज की शैली राज्य की द्रविड़-वैचारिकी वाली पार्टियों-द्रमुक, अन्नाद्रमुक, वीसीके या पीएमके आदि से मेल नहीं खाती।
सिर्फ एम के स्टालिन ही नहीं, सुश्री जयललिता भी ऐसे मुद्दों पर केंद्र के सामने किसी तरह की राजनीतिक कमजोरी नहीं दिखाती थीं, जैसी टीवीके संस्थापक और मुख्यमंत्री विजय शुरुआत से ही दिखाने लगे हैं। सूबे के राजनीतिक हलकों में उठते ये सवाल क्या सुपरहिट अभिनेता से कामयाब राजनेता बने जोेसेफ विजय की स्टार-चमक को धुंधला नहीं करेंगे?
(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं।)