6 जून को प्रस्तावित इंडिया गठबंधन की बैठक को केवल विपक्षी दलों की एक नियमित राजनीतिक कवायद के रूप में नहीं देखा जा रहा है। राजनीतिक हलकों में इसे ऐसे मोड़ के रूप में देखा जा रहा है जहां विपक्षी दल, खासकर क्षेत्रीय पार्टियां, भारतीय जनता पार्टी के लगातार बढ़ते राजनीतिक प्रभाव और उसके दीर्घकालिक राजनीतिक एजेंडे पर गंभीर चर्चा कर सकती हैं। माना जा रहा है कि इस बैठक के आयोजन में पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
दिलचस्प बात यह है कि वही ममता बनर्जी हैं, जो लंबे समय तक कांग्रेस से दूरी बनाए रखने की रणनीति पर चलती रही थीं, अब विपक्षी एकता की आवश्यकता पर जोर देती दिखाई दे रही हैं। इसके पीछे केवल राष्ट्रीय राजनीति की मजबूरी नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीतिक परिस्थितियां भी हैं। ममता को लगने लगा है कि अगर इस वक्त इंडिया गठबंधन का सहारा नहीं लिया गया तो टीएमसी का भविष्य और भी कमजोर हो सकता है।
याद रहे बंगाल में हार के बाद टीएमसी के भीतर दरार पैदा होती दिख रही है। कई नेता या तो बीजेपी के साथ जाने को तैयार हैं जबकि बड़ी संख्या में स्थानीय नगर निकाय से जुड़े नेता बीजेपी का दामन पकड़ने में अब कोई निर्लज्जता भी महसूस कर रहे हैं। जिन लोगों पर कदाचार और भ्रष्टाचार के आरोप हैं ,वे बीजेपी के निशाने पर हैं। या तो वे जेल जाएँ या फिर बीजेपी में। ऐसे में सवाल यह है कि क्या ममता को बदलते खतरे का एहसास हो गया है?
पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने पश्चिम बंगाल में अपनी राजनीतिक ताकत को जिस तरह बढ़ाया है, उसने तृणमूल कांग्रेस की चिंताएं बढ़ा दी हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद भाजपा राज्य में मुख्य विपक्षी शक्ति बनी लेकिन इस बार उसने कमाल करते हुए टीएमसी की पूरी राजनीति को ही ध्वस्त कर दिया और सत्ता तक पहुँच गई। हाल के दिनों में तृणमूल के भीतर असंतोष, नेताओं के इस्तीफे और पार्टी के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार मामलों ने भी ममता सरकार पर दबाव बढ़ाया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि ममता बनर्जी को अब यह एहसास हो रहा है कि भाजपा की राजनीति केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उन राज्यों में भी अपनी स्थायी राजनीतिक जमीन बनाना चाहती है जहां मजबूत क्षेत्रीय दल मौजूद हैं। इसी कारण ममता अब कांग्रेस के साथ रिश्तों को पूरी तरह खराब करने के बजाय सहयोग का रास्ता तलाशती दिख रही हैं।
यह विपक्ष का आरोप रहा है कि भाजपा देश की राजनीति को धीरे-धीरे द्विध्रुवीय बनाना चाहती है, जहां मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच रह जाए। इस दावे के समर्थन में विपक्ष कई उदाहरण देता है।
उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी का प्रभाव पहले की तुलना में काफी घट चुका है। समाजवादी पार्टी अभी भी भाजपा के सामने चुनौती बनी हुई है, लेकिन 2024 के बाद ही उसकी राजनीतिक स्थिति पर भी लगातार नजर रखी जा रही है। बिहार में जदयू की ताकत पहले जैसी नहीं रही। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विभाजन ने क्षेत्रीय राजनीति की दिशा बदल दी
हालांकि भाजपा इन आरोपों को खारिज करती है और कहती है कि क्षेत्रीय दलों की कमजोरी उनके अपने राजनीतिक संकट और जनाधार में गिरावट का परिणाम है, न कि किसी सुनियोजित रणनीति का। फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि पिछले एक दशक में राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव पहले की तुलना में कम हुआ है और भाजपा का विस्तार कई राज्यों में तेज हुआ है।
इंडिया गठबंधन की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास कांग्रेस है। कई क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस को प्रतिद्वंद्वी मानते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ लड़ाई में वही कांग्रेस सबसे बड़ा मंच भी उपलब्ध कराती है। ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव और कई अन्य नेताओं ने अलग-अलग समय पर कांग्रेस की आलोचना की है। इसके बावजूद जब राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की बात आती है तो कांग्रेस को पूरी तरह नजरअंदाज करना संभव नहीं दिखता।
कारण साफ है। कांग्रेस आज भले सत्ता से दूर हो, लेकिन उसका संगठन, कार्यकर्ता नेटवर्क और राजनीतिक उपस्थिति देश के लगभग हर राज्य और हजारों गांवों तक फैली हुई है। भाजपा के लिए कांग्रेस को पूरी तरह समाप्त कर देना आसान नहीं है। यही वजह है कि क्षेत्रीय दलों के सामने एक नई राजनीतिक दुविधा खड़ी हो गई है—वे अकेले भाजपा का मुकाबला करें या कांग्रेस के साथ व्यापक मोर्चा बनाएं।
6 जून की बैठक में बिहार की राजनीति भी चर्चा का विषय बन सकती है। अभी जदयू की जो स्थिति है उस पर भी इंडिया बगथबन्धन की नजरें लगी हुई है। कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार को कमजोर करने में उन्हीं की पार्टी के कुछ नेताओं का हाथ रहा है जो बीजेपी के लिए फील्डिंग करते हैं। हालांकि नीतीश कुमार राजनीति के इस खेल को समझ रहे हैं और संभव है कि वक्त आने पर नीतीश कभी भी कोई बड़ा धमाका करें। इंडिया गठबंधन को उम्मीद है कि भविष्य में नीतीश कुमार भी कोई बड़ा दाव खेलेंगे और ममता बनर्जी इसमें बड़ी भूमिका निभा सकती है।
दक्षिण भारत को लेकर भी विपक्ष के भीतर चर्चाएं तेज हैं। भाजपा अभी तक दक्षिण में वैसी सफलता हासिल नहीं कर पाई है जैसी उत्तर और पश्चिम भारत में, लेकिन वह लगातार अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल में मजबूत क्षेत्रीय या वैचारिक दल मौजूद हैं। विपक्षी दलों का मानना है कि भविष्य में भाजपा का सबसे बड़ा विस्तार अभियान इन्हीं राज्यों पर केंद्रित हो सकता है।
6 जून की बैठक का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही होगा कि क्या बी बैठक में कोई बड़ा निर्णय लिया जा सकता है? यह इसलिए भी जरुरी है कि बीजेपी ने भी इंडिया गठबंधन की बैठक को देखते हुए आगामी दस जून को एनडीए की बैठक का ऐलान कर दिया है। जाहिर है बीजेपी को भी लग रहा है कि अगर इंडिया गठबंधन की मजबूती बढ़ी तो सरकार पर असर पड़ सकता है।
पिछले दो वर्षों में इंडिया गठबंधन कई उतार-चढ़ाव से गुजरा है। सीट बंटवारे, नेतृत्व और क्षेत्रीय हितों को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं। ऐसे में केवल भाजपा विरोध पर्याप्त नहीं होगा। यदि बैठक में क्षेत्रीय दल इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता और अस्तित्व दोनों दांव पर हैं, तो कांग्रेस के साथ उनका संबंध अधिक व्यावहारिक और रणनीतिक हो सकता है। वहीं यदि पुराने अविश्वास कायम रहते हैं, तो विपक्षी एकता का सपना फिर अधूरा रह सकता है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 6 जून की बैठक केवल चुनावी तालमेल की चर्चा नहीं होगी। यह उस बड़े सवाल पर भी मंथन हो सकता है कि क्या भारत की राजनीति बहुदलीय और संघीय चरित्र बनाए रखेगी, या धीरे-धीरे दो राष्ट्रीय ध्रुवों—भाजपा और कांग्रेस—के बीच सिमटती जाएगी। इसी प्रश्न का उत्तर आने वाले वर्षों की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।