क्या दो जून की रोटी भी मुश्किल होने वाली है?

जी हां साथियों हमारे पीएम साहिब ने जिस तरह से आने वाली आपदा के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी है उससे तो ऐसे आसार नज़र आ रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में खासतौर से कृषि संसाधनों पर डाका डालने की भी तैयारी पूरी हो चुकी है।आका ने अपने गुलाम को आमंत्रित किया है। जिसने हमसे रुस और ईरान से आने वाला सस्ता खनिज तेल छीना है। चाबहार पोर्ट से हटने बाध्य किया। ऑपरेशन सिंदूर में मिलने वाली विजय श्री पर विराम लगाया है।

अब वह सीना तानकर गुलाम साहिब जी से वही ट्रेड डील करने जा रहा है जिससे हमारी आत्मनिर्भर कृषि और उसके सहयोगी संस्थान भी आका के आदेश से चलने वाले हैं। जियो की तरह शुरुआत लगभग कम कीमत का प्रलोभन देकर यहां के तमाम संस्थाओं को कब्जाए जाने के बाद जियो जैसा हाल हो जाएगा।जियो के फिर भी विकल्प थे किन्तु कृषि के हाथ से जाने के बाद फिर क्या बचेगा।यही वे बातें हैं जिनसे पीएम हमें डरा रहे हैं।

सोचिए खाद्यान्न मामले में आत्मनिर्भर देश के लिए जो साथ साथ दुनिया के उन देशों के लिए आज अनाज करता है वह कल उसके हाथ में नहीं रहने वाला। पीएम की जाने क्या मजबूरियां हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले एक लोकतांत्रिक देश का क्या हाल बना के रख दिया है।अब तो ये भी सत्य उजागर होता जा रहा है कि देश में नोटबंदी, और देश में लंबे समय से निवासरत लोगों को बाहर निकाले जाने का काम भी आका के इशारे पर एक दूसरे की समझ से हुआ है।

दो जून की रोटी से आशय दो वक्त के भोजन का है। बुंदेलखंड में मूलतः भोजन का मूलाधार रोटी है इसलिए संभवतः यह कहावत कही गई होगी। आज रोटी का सवाल पूरी दुनिया खासकर उन देशों में जहां गेहूं का बड़े पैमाने पर आयात होता रहा है खड़ा है। निर्यातक देश रुस, यूक्रेन और भारत के हालात खराब है।अल्लामा इक़बाल कहते हैं

जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी

उस ख़ेत के हर ख़ोशा-ए-गुन्दम को जला दो  

हजारों साल पहले पश्चिमी एशिया के देशों में गेहूं की खेती होने के सबूत मिले हैं. इसके अलावा तुर्की, ईराक और मिस्र में भी खुदाई के दौरान गेहूं के दाने मिल चुके हैं, जो तकरीबन 6 हजार साल पुराने बताए जाते हैं।यही गेहूं आज दुनिया में सबसे ज्यादा खाने वाला अनाज है। एक अनुमान के मुताबिक, दुनियाभर में हर साल 6020 लाख टन से ज्यादा गेहूं की खपत होती है

 गेहूं की सबसे ज्यादा खपत चीन में होती है. उसके बाद भारत का नंबर आता है।

इस वर्ष भारत में गेहूं का स्टॉक कम होने से गेहूं और आटे की कीमत बेतहाशा बढ़ने लगी थी। ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में देखने को मिल रहा है। इसकी एक वजह रूस-यूक्रेन जंग को भी माना जा रहा है।क्योंकि रूस और यूक्रेन में जंग की वजह से गेहूं की सप्लाई पर असर पड़ा है।इधर भारत में इस बार गेहूं की सरकारी खरीद बहुत कम की गई।इसी से निर्यात और राशन की व्यवस्था चलती है।

इसीलिए उत्तर प्रदेश सरकार ने राशन के लिए सख्त नियमों की घोषणा की है यह देर सबेर देश भर में लागू हो सकती है । सरकारी खरीद कम होने की वजह अडानी को खरीदारी की छूट देकर उसके गोदाम भरना है। जिससे आपदा में फायदा लिया जा सके।

वैसे भी अन्नदाता ने अनाज उत्पादन में रिकार्ड बनाया है किन्तु उन्हें कभी वाजिब दाम नहीं मिला।उनके अनाज के दम पर राशनिंग से वोट हासिल किए जाते रहे हैं। लेकिन अब आगत में सब बदलने वाला है।वजह यह है कि 2024 के आमचुनाव में जब राशन और लाड़ली बहिनों ने धोखा दिया तो भाजपा के चक्षु खुल गए हैं। उसने अब षड्यंत्रों के जरिए जीतना सीख लिया है इसलिए प्रलोभनों का तिलिस्म खत्म होना ही है। फिर जब कृषि पर ट्रेड डील करना ही है तो सब फ़िज़ूल है। चीखो, चिल्लाओ, अदालत जाओ। तुम, कुछ हासिल होने वाला नहीं है गुलामी का दौर है। 

मजबूर हैं साहिब जी। बुरे फंसे हैं यारी में। उनका क्या है झोला उठाएंगे चल देंगे। हाल बेहाल तो मजलूमों का होगा जिसे मेहनत के बावजूद दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होगी।

रोटी की यह लड़ाई बड़ी लड़ाई है जिसे हम सबको मिलकर लड़नी होगी।वरना गुलाम बनकर जीना सीख लेना चाहिए।वे गर्मी में बुजुर्ग व्यक्तियों के लिए पानी पिलाने और ख्याल रखने की बात करते हैं लेकिन ट्रेड डील पर कुछ नहीं कह पा रहे हैं जो हमारी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की कड़ी कृषि को समाप्त करने होने जा रही है।

रोटी पानी का साथ जीवन का साथ है दोनों पर खतरे बढ़े हैं। बेशक आपदा आने का संकेत मिल चुका है।वह कभी भी आ सकती है। ईरान इज़राइल युद्ध आपदा से निपट लिया जाएगा पर रोटी का क्या होगा ये सवाल जनता को पूछना ही होगा।

अभी से बहस मुबाहिसों का दौर चल रहा है। बहुत कठिन है डगर पनघट की।याद आता हैं दुष्यंत कुमार जी का एक शेर –

भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ 

आजकल दिल्ली में है जेरे-बहस ये मुद्आ!

(सुसंस्कृति परिहार एक्टिविस्ट और टिप्पणीकार हैं।)

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