ममता बनर्जी के राजनीतिक किले में लग चुकी है सेंध?

पश्चिम बंगाल की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक मुश्किल थी। 28 साल पहले ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर जिस तृणमूल कांग्रेस  की स्थापना की थी, वही पार्टी आज अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजरती नजर आ रही है। पहले 58 विधायकों के अलग गुट बनाने का दावा और अब करीब 20 सांसदों के भाजपा नेतृत्व से मुलाकात की खबरों ने बंगाल की राजनीति में भूचाल ला दिया है।

सोमवार को दिल्ली में केंद्रीय मंत्री और भाजपा के पश्चिम बंगाल प्रभारी भूपेंद्र यादव के आवास पर हुई बैठक ने इन अटकलों को और तेज कर दिया। बैठक में तृणमूल के कई सांसदों की मौजूदगी बताई जा रही है। इनमें काकोली घोष दस्तिदार, शताब्दी रॉय, प्रसून बनर्जी, जगदीश बसुनिया, कालीपद सोरेन, असित मल, शर्मिला सरकार और अन्य सांसदों के नाम सामने आए हैं।

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी बैठक में पहुंचे। यह वही शुभेंदु अधिकारी हैं जो कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाते थे और अब भाजपा के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल हैं। इसी बीच तृणमूल के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रे ने न केवल सांसद पद से इस्तीफा दे दिया बल्कि पार्टी भी छोड़ दी। उनके इस्तीफे ने इस संकट को औपचारिक राजनीतिक विद्रोह का स्वरूप दे दिया है।

तो क्या सचमुच टूट चुकी है तृणमूल?

राजनीतिक रूप से यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। अभी तक उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि तृणमूल कांग्रेस पूरी तरह टूट चुकी है। किसी भी दल के औपचारिक विभाजन के लिए संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाएं होती हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यदि 58 विधायक और लगभग 20 सांसद वास्तव में अलग राजनीतिक रास्ता अपनाते हैं, तो यह तृणमूल के इतिहास की सबसे बड़ी बगावत होगी।

तृणमूल लंबे समय तक ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और करिश्माई नेतृत्व पर टिकी रही। पार्टी में निर्णय लेने की प्रक्रिया काफी हद तक केंद्रीकृत रही है। आलोचक वर्षों से आरोप लगाते रहे हैं कि पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक संवाद सीमित होता गया और नेतृत्व का दायरा सिमटता गया। सुखेंदु शेखर रे ने अपने इस्तीफे में भी इसी प्रकार की शिकायतों का उल्लेख किया है।

उन्होंने कहा कि पार्टी में नेताओं को स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति नहीं थी, राय नहीं ली जाती थी और चुनावी हार के बाद भी आत्ममंथन नहीं हुआ। यह आरोप केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं बल्कि उस असंतोष की अभिव्यक्ति माना जा रहा है जो लंबे समय से संगठन के भीतर मौजूद बताया जाता रहा है।

भाजपा की रणनीति: बंगाल में शिवसेना मॉडल?

राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि क्या बंगाल में वही मॉडल दोहराया जा रहा है जो महाराष्ट्र में शिवसेना और बाद में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी  के साथ देखा गया था। महाराष्ट्र में पहले एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना का बड़ा हिस्सा अलग हुआ। बाद में अजित पवार ने एनसीपी  में विभाजन कराया। दोनों घटनाओं ने विपक्षी राजनीति को झटका दिया और भाजपा को सत्ता समीकरणों में लाभ मिला।

बंगाल में भी विपक्षी दलों का एक बड़ा वर्ग आरोप लगा रहा है कि भाजपा तृणमूल को भीतर से कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा इस आरोप को खारिज करती है और कहती है कि यदि नेता स्वेच्छा से उसके साथ आना चाहते हैं तो इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए।

लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति केवल चुनावी जीत तक सीमित नहीं है। वह उन क्षेत्रीय दलों को भी कमजोर करना चाहती है जो राष्ट्रीय स्तर पर उसके सबसे मुखर विरोधी रहे हैं। ममता बनर्जी लंबे समय से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रमुख आलोचकों में शामिल रही हैं और विपक्षी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं।

संसद के अंकगणित पर असर

यदि तृणमूल के सांसदों का बड़ा समूह भाजपा या एनडीए के साथ आता है, तो इसका सीधा असर संसद के शक्ति संतुलन पर पड़ेगा। लोकसभा में तृणमूल के 28 सांसद हैं। यदि इनमें से 20 सांसद अलग रुख अपनाते हैं, तो विपक्ष की संख्या और प्रभाव दोनों कमजोर होंगे। भाजपा और एनडीए के लिए यह अतिरिक्त राजनीतिक ताकत होगी। सरकार को महत्वपूर्ण विधेयकों के लिए अधिक समर्थन मिल सकता है और विपक्षी एकता को भी झटका लगेगा।

राज्यसभा में भी तृणमूल के 13 सदस्य हैं। सुखेंदु शेखर रे के इस्तीफे के बाद वहां संख्या और कम हुई है। यदि राज्यसभा में भी टूट बढ़ती है तो भाजपा को ऊपरी सदन में अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में सुविधा मिल सकती है। हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि केवल संख्या बढ़ जाने से राजनीतिक लाभ स्थायी नहीं हो जाता। संसद के अंकगणित और जनता के जनादेश में अंतर होता है।

क्या भाजपा को केवल फायदा ही होगा?

इतिहास बताता है कि बड़े पैमाने पर दल-बदल हमेशा एकतरफा लाभ नहीं देता।2021 के विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल के कई बड़े नेता भाजपा में गए थे। लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद उनमें से अनेक वापस तृणमूल में लौट आए। इससे भाजपा संगठन के भीतर असंतोष भी पैदा हुआ था। पुराने कार्यकर्ताओं को लगा कि बाहरी नेताओं को अधिक महत्व दिया जा रहा है।

यदि एक साथ बड़ी संख्या में तृणमूल सांसद भाजपा में आते हैं, तो भाजपा को भी इसी प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। पार्टी को अपने पुराने कैडर और नए नेताओं के बीच संतुलन बनाना होगा।

बागियों का भविष्य क्या होगा?

राजनीतिक इतिहास बताता है कि दल-बदल करने वाले सभी नेताओं का भविष्य समान नहीं होता। कुछ नेताओं को नए दल में महत्वपूर्ण पद मिल जाते हैं, कुछ मंत्री बन जाते हैं और कुछ समय के साथ हाशिए पर चले जाते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनके पास अपना जनाधार कितना है और नए दल को उनकी कितनी जरूरत है। काकोली घोष, शताब्दी रॉय, प्रसून बनर्जी या अन्य सांसदों के सामने भी यही चुनौती होगी।

यदि वे भाजपा में शामिल होते हैं तो उन्हें अपने पुराने समर्थकों को यह समझाना होगा कि उनका फैसला वैचारिक था या राजनीतिक अवसरवाद का परिणाम। जनता अक्सर दल-बदल को संदेह की नजर से देखती है। इसलिए भाजपा में प्रवेश किसी नेता के लिए राजनीतिक सुरक्षा की गारंटी नहीं है।

इंडिया गठबंधन पर असर

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में शामिल हुए हैं। विपक्ष पहले से ही नेतृत्व, रणनीति और राज्यों में सहयोग को लेकर चुनौतियों का सामना कर रहा है।यदि तृणमूल कमजोर होती है तो इंडिया गठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन बदल सकता है। कांग्रेस की भूमिका बढ़ सकती है, लेकिन विपक्ष की समग्र ताकत घटने का खतरा भी रहेगा।

बड़ा सवाल तो यह है कि क्या यह कहानी  केवल बंगाल तक ही सिमित है ?सच यह है कि बंगाल का संकट केवल तृणमूल की कहानी नहीं है। यह भारतीय राजनीति के उस नए दौर की कहानी भी है जिसमें राष्ट्रीय दल और क्षेत्रीय दल आमने-सामने हैं।भाजपा लगातार अपने संगठन का विस्तार कर रही है और क्षेत्रीय दलों के प्रभाव वाले राज्यों में राजनीतिक जगह बना रही है। दूसरी ओर, क्षेत्रीय दल अपनी पहचान, संगठन और नेतृत्व को बचाने की चुनौती से जूझ रहे हैं।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक संघर्ष का नया अध्याय शुरू हो चुका है। ममता बनर्जी के सामने अपनी पार्टी को एकजुट रखने की चुनौती है, जबकि भाजपा के सामने इस अवसर को स्थायी राजनीतिक लाभ में बदलने की परीक्षा। लेकिन अंतिम फैसला न दिल्ली की बैठकों में होगा, न विधायकों और सांसदों के समूहों में—उसका फैसला बंगाल की जनता अगली बार मतपेटी के सामने खड़े होकर करेगी। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी है।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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