जीवन की राहें भी अक्सर छोटी-बड़ी सामान्य यात्रा के दौरान मिलने वाले रस्तों जैसी ही होती हैं। कभी शहर की चकाचौंध से गुजरती स्ट्रीट लाइट की रोशनी में चमक रही होतीं तो कभी खेत-खलिहानों और झाड़-झंखड़ के बीच से निकलती पगडंडी का रूप ले लेती हैं जहां रात का अंधेरा तो छोड़िए शाम का धुंधलका भी आगे बढ़ना मुश्किल बना देता है। ऐसे मौकों पर काम आते हैं रोशनी के वे दीये जो हमारे बड़े-बूढ़े, परिजन और दोस्त-मित्र-शुभचिंतक अपने अनुभवों के सार के रूप में हमारे जेहन के अंदर छोड़ गए होते हैं।
ऐसा ही एक दीया मेरे अंदर जावेद भाई छोड़ गए थे, आज से करीब 30 साल पहले। मुंबई शहर के जिस बड़े अखबार को मैंने तब जॉइन ही किया था, उसमें काम करते हुए उन्हें सात साल हो चुके थे। पद उनका सीनियर सब-एडिटर का ही था, लेकिन जिम्मेदारी एडिशन संभालने की। मुझ जैसे जूनियर ही नहीं, जावेद भाई के समकक्ष और सारे सीनियर समेत खुद संपादक जी भी मानते थे कि उनका प्रमोशन काफी पहले होना चाहिए था, लेकिन कुछ कारणों से नहीं हो रहा था।
बाद में प्रमोशन हुआ भी, लेकिन जावेद भाई के मामले में वह एक अलग तरह की त्रासदी ही साबित हुआ।
हुआ यह कि जावेद भाई छुट्टी पर गांव गए हुए थे। इसी बीच उनके प्रमोशन की चिट्ठी आ गई जो संपादक जी की मेज पर रख दी गई। जिस दिन जावेद भाई को दोबारा जॉइन करना था, उससे एक दिन पहले वह ट्रेन से दादर स्टेशन पर उतरे, लेकिन लोकल प्लैटफॉर्म पर आते हुए जाने क्या हुआ कि चक्कर खाकर गिर पड़े। शायद दिल का जोरदार दौरा पड़ा था, अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ गए।
अगले दिन जब अखबार में उनके अचानक निधन की खबर छपी तो उसमें उनका पद चीफ-सब-एडिटर बताया गया था, यानी उनके प्रमोशन का फैसला लागू हो चुका था, लेकिन यह जानकारी वक्त पर उन तक नहीं पहुंच सकी।
बहरहाल, इससे कुछ महीने पहले ही एक बार मैंने उनसे पूछा था कि जावेद भाई कभी मन में यह ख्याल नहीं आता कि इतने अच्छे से जिम्मेदारी निभाने का जो फायदा मिलना चाहिए, वह नहीं मिला आपको? बड़ी सरलता और उतनी ही सादगी से उन्होंने जवाब दिया,
‘जिंदगी में जो भी जिम्मेदारी हम पर आती है उसे हम निभाते चलते हैं और बदले में समय-समय पर हमें कुछ-कुछ मिलता रहता है। लेकिन इन दोनों में हमेशा कोई सीधा संबंध दिख जाए यह जरूरी नहीं होता। इसलिए मैं दोनों को बिल्कुल अलग रखता हूं। जो जिम्मेदारी मैंने स्वीकारी उसे पूरी शिद्दत से निभाता हूं, बाकी जब जो मिलना है, वह मिलता है या नहीं मिलता या देर से मिलता है, यह अलग मसला है।’
जावेद भाई तो चले गए, उनका कहा मेरे साथ रह गया। समय-समय पर जब भी करियर ने कठिन चुनौतियां फेंकी, उनकी कही बात ढाल बनकर सामने आ खड़ी हुई – ‘मेरा काम जिम्मेदारियां निभाना और उन जिम्मेदारियों के जरिए अपने जीवन को अधिक से अधिक अर्थपूर्ण बनाना है। बदले में क्या मिलता है और क्या नहीं वह अलग मसला है।‘
जावेद भाई इस बात को छुपा गए थे, लेकिन जिंदगी ने यह राज खोला कि अलग होने के बाद मसला उतना बड़ा नहीं रह जाता। आपको दिक करने की उसकी क्षमता आधी हो जाती है।
(रेखाचित्र : प्रतीकात्मक। एआई की मदद से)
(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)