सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 14 जुलाई, को एक अहम मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि खुली अदालत में किसी फैसले का मौखिक उच्चारण मात्र से वह अंतिम निर्णय नहीं बन जाता। जब तक संबंधित न्यायाधीश उस फैसले पर हस्ताक्षर नहीं कर देते, तब तक उसमें बदलाव किया जा सकता है और आवश्यकता पड़ने पर मामले को दोबारा सुनवाई के लिए सूचीबद्ध भी किया जा सकता है।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी कर्नाटक के श्री आंजनेय मंदिर के प्रधान पुजारी विद्यादास बाबाजी की याचिका पर सुनवाई के दौरान की।
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने अप्रैल में खुले न्यायालय में फैसला सुनाया था और केस स्टेटस में भी याचिका स्वीकार दिखाई गई थी, लेकिन कई महीने बीत जाने के बावजूद फैसला वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया। उनका तर्क था कि एक बार अदालत फैसला सुना देती है तो वह ‘Functus Officio’ (कार्यमुक्त) हो जाती है और बाद में उसमें बदलाव नहीं कर सकती।
इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि जब तक निर्णय पर न्यायाधीश हस्ताक्षर नहीं कर देते, तब तक वह पूर्ण और अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। यदि फैसला सुनाने के बाद न्यायाधीश को लगता है कि उसमें कोई महत्वपूर्ण कमी रह गई है या कुछ अतिरिक्त सामग्री शामिल करना आवश्यक है, तो वह मामले को दोबारा सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस चरण में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि “इस समय हस्तक्षेप का कोई मामला नहीं बनता। फैसला आने दीजिए।” इसके साथ ही अदालत ने याचिका का निस्तारण कर दिया।
यह मामला कर्नाटक के कोप्पल स्थित श्री आंजनेय मंदिर के प्रबंधन से जुड़ा है, जहां याचिकाकर्ता पुजारी ने हाईकोर्ट में लंबित मामले में फैसला सुनाए जाने के बावजूद उसके अपलोड न होने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने स्पष्ट किया कि किसी निर्णय की वैधानिक अंतिमता उसके मौखिक उच्चारण से नहीं, बल्कि उस पर न्यायाधीश के हस्ताक्षर होने के बाद ही आती है।
(जनचौक ब्यूरो)