किसी भी बड़े जननेता की जन्मशती केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं होती, बल्कि उसके विचारों, संघर्षों और अधूरे सवालों से दोबारा संवाद करने का अवसर होती है। चन्द्रशेखर की जन्मशती भी हमें यही अवसर देती है कि हम उन बुनियादी मुद्दों और सवालों पर लौटें, जिन्हें लेकर वह जीवनभर बेचैन रहे।
दुर्भाग्य से जन्मशती वर्ष में चन्द्रशेखर के नाम पर अधिक सक्रियता या प्रयास उनकी वैचारिक विरासत को आगे बढ़ाने के नहीं, बल्कि अपनी-अपनी राजनीतिक और वैचारिक दुकान सजाने के दिखाई देते हैं। परिणामस्वरूप अधिकांश आयोजन गंभीर वैचारिक विमर्श के बजाय स्मृति या श्रद्धांजलि सभाओं, प्रशंसागान और निजी संस्मरणों तक सीमित होकर रह गए हैं।
इस दौरान कोई चन्द्रशेखर के साथ अपनी निकटता का बखान कर रहा है, कोई संस्मरणों के बहाने अपनी ही स्तुति कर रहा है, तो कोई उनके राजनीतिक जीवन और घटनाओं पर बयानबाजी। इनमें बहुत-सी बातें तथ्यपरक हैं, लेकिन कुछ लोग केवल वाहवाही बटोरने के लिए अतिरंजना या झूठ का सहारा लेते हुए भी दिखाई देते हैं। ऐसे लोग बहुत कम हैं जो उनकी राजनीतिक और वैचारिक पक्षधरता पर बात कर रहे हैं।
सवाल यह है कि जिस तरह से चन्द्रशेखर को याद किया जा रहा है, उससे समाज को क्या मिलेगा? क्या इससे उन सवालों या मुद्दों का समाधान निकलेगा, जिनके लिए चन्द्रशेखर जीवनभर संघर्ष करते रहे? चन्द्रशेखर को याद करने और उनके नाम का उपयोग करने में यही मूल अंतर है।
चन्द्रशेखर की 1983 की भारत-यात्रा हो या बाद के वर्षों में नई आर्थिक नीतियों, उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के दुष्परिणामों के विरुद्ध उनका अभियान या ‘यंग इंडियन’ में लिखे उनके संपादकीय, उनके केंद्र में हमेशा आम आदमी ही था। भारत-यात्रा उनके लिए राजनीतिक अभियान नहीं, बल्कि भारत को जानने और भारत से सीखने की यात्रा थी। पीने का स्वच्छ पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, किसान, आर्थिक असमानता, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती, यही उनके संघर्ष के प्रमुख विषय थे।
विडंबना यह है कि तीन-चार दशक बाद भी यही सवाल पहले से अधिक तीखे रूप में आज हमारे सामने मुँह बाए खड़े हैं।
आज हमें पाँच ट्रिलियन डॉलर और 1947 तक तीस ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और विश्वगुरु बनने के सपने दिखाए जा रहे हैं। सरकार एक ओर दावा करती है कि कई करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आ गए लेकिन वहीं दूसरी ओर वह यह कहती है कि 80 करोड़ लोग सरकारी अनाज पर निर्भर हैं। सच्चाई यह है कि करोड़ों नागरिकों की बुनियादी ज़रूरतें अब भी अधूरी हैं।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बड़ी आबादी की पहुँच से बाहर हैं। युवा बेरोज़गारी बढ़ रही है, किसान लागत, कर्ज़ और बाज़ार के दबाव से जूझ रहे हैं, मजदूर पलायन को विवश हैं। सरकारी सर्वेक्षण बताते हैं कि स्वास्थ्य पर होने वाले कुल खर्च का लगभग आधा हिस्सा लोगों को अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है। अनेक राज्यों में जलसंकट भयावह होता जा रहा है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 60 करोड़ भारतीय अत्याधिक जल संकट वाले क्षेत्रों में रहते हैं।
सामाजिक न्याय की राजनीति जाति और धर्म के ध्रुवीकरण में उलझ गई है, जबकि संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता, लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की भावना को लेकर आशंकाएं लगातार गहरी हो रही हैं। विकास के दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच बढ़ती यही खाई चन्द्रशेखर की सबसे बड़ी चिंता थी। इसलिए आज का भारत कई मायनों में 1974 की याद दिलाता है।
फ़र्क सिर्फ इतना है कि तब जन-असंतोष को दिशा देने वाला नैतिक और वैचारिक नेतृत्व मौजूद था, जबकि आज जनता स्वयं प्रतिपक्ष की भूमिका में दिखाई देती है। शायद यही वह खालीपन है, जहाँ जयप्रकाश नारायण के विचार और चन्द्रशेखर की राजनीति सबसे अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं। जन्मशती वर्ष में इन सवालों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
आज देश पहले से कहीं अधिक चन्द्रशेखर जैसे नेता की ज़रूरत महसूस कर रहा है। वे अपने पूरे सार्वजनिक जीवन में शाश्वत असंतुष्ट राजनेता रहे। उनका असंतोष किसी व्यक्ति या पद के प्रति नहीं, बल्कि अन्याय, असमानता और सत्ता के अहंकार के प्रति था। उनके लिए असहमति लोकतंत्र की आत्मा थी। इसलिए यह कहना कि ‘चन्द्रशेखर होना बागी होना है’ या ‘यह दौर बगावत का है’, केवल नारे नहीं हैं। लोकतंत्र में असंतोष ही परिवर्तन का पहला कदम होता है।
चन्द्रशेखर भारतीय संसदीय राजनीति में अघोषित विपक्ष के नेता थे। सत्ता पक्ष में रहे तो भी सत्ता से सवाल पूछते रहे और विपक्ष में रहे तो भी। केवल विरोध के लिए विरोध नहीं किया। जनता का पक्ष ही उनकी राजनीति का स्थायी केंद्र था। जन्मशती वर्ष के आयोजनों का मूल्यांकन भी इसी कसौटी पर होना चाहिए।
जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति, डॉ. राममनोहर लोहिया के अभियान और स्वयं चन्द्रशेखर की भारत-यात्रा इसका प्रमाण हैं कि ऐसी यात्राएं और कार्यक्रम जनता से संवाद का सबसे प्रभावी माध्यम होते हैं। हाल के किसान आंदोलन और अब सोनम वांगचुक के आमरण अनशन ने भी दिखाया है कि यदि मुद्दा वास्तविक हो, तो जनता आज भी लोकतांत्रिक संघर्ष के लिए तैयार है। बशर्ते उसको नेतृत्व में ईमानदारी दिखे।
लेकिन दुख की बात है कि जनता की इस ऊर्जा या असंतोष को हम व्यापक राजनीतिक/वैचारिक विकल्प में नहीं बदल पा रहे हैं।
दरअसल, समस्या आंतरिक एकता की है। विभिन्न समाजवादी धड़ों के बीच वैचारिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन व्यक्तिगत अहं, क्षेत्रीय स्वार्थ और सत्ता की छोटी-छोटी कुर्सियों के चक्कर ने उन्हें कमजोर किया है। जब समाजवादियों का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के साथ समझौता कर लेता है या अपनी वैचारिक पहचान खोकर अन्य दलों में विलय कर जाता है, तो जनता में विश्वास उठना स्वाभाविक है। परिणाम यह कि विकल्प की बात करने वाले स्वयं विकल्पहीन दिखाई देने लगते हैं।
बगावत का मतलब अराजकता नहीं है। यह व्यवस्था को बदलने की लोकतांत्रिक और जनपक्षधर कोशिश है। आज जब लोकतंत्र क्षरण का शिकार हो रहा है, तब असंतोष को सकारात्मक ऊर्जा में बदलना ज़रूरी हो जाता है। जो लोग चन्द्रशेखर की परंपरा में विश्वास रखते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि इतिहास कभी भी दल बदलुओं या सत्ता के चाटुकार समझौतावादियों को नहीं, बल्कि उन बागियों को याद करता है जो जनता के दर्द को अपना दर्द समझ कर जनता के साथ खड़े होते हैं।
यहाँ बड़ा सवाल एक बार फिर यही है कि, चन्द्रशेखर को कैसे याद किया जाए? क्यों याद किया जाए? क्या उन्हें केवल श्रद्धांजलि सभाओं, स्मृति व्याख्यानों और माल्यार्पण तक सीमित कर दिया जाए, या उनके विचारों को जनजीवन और जनआंदोलनों का हिस्सा बनाया जाए?
यदि जन्मशती वर्ष का कोई वास्तविक अर्थ है, तो वह यही है कि चन्द्रशेखर कार्यक्रमों, अभियानों और जनसंवाद के माध्यम से फिर से जनता के बीच उतरा जाए। राज्यों, जिलों और ब्लॉक स्तर तक समाजवाद, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और जनसरोकारों और नागरिकों की बुनियादी ज़रूरतों के सवालों को लेकर लोगों को जोड़ने का प्रयास हो। चन्द्रशेखर को याद करने का सबसे सार्थक तरीका यही होगा कि उनके अधूरे सवालों को फिर से राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया जाए। मकसद यही कि देश की राजनीति एक बार फिर नकली मुद्दों से हटकर जनता के असली मुद्दों और सवालों की ओर लौटे।
चन्द्रशेखर की जन्मशती हमें यह दुर्लभ अवसर दिया है। सवाल यह नहीं है कि हमने उन्हें कितनी बार याद किया। सवाल यह है कि हमने उन्हें कैसे याद किया। यदि जन्मशती वर्ष केवल श्रद्धांजलि, माल्यार्पण, स्मृति-भाषणों, संस्मरणों और औपचारिक आयोजनों तक सीमित रह गया, तो यह केवल चन्द्रशेखर की विरासत के साथ अन्याय नहीं होगा, बल्कि उस लोकतांत्रिक चेतना के साथ भी होगा, जिसके लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित किया।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और एक दशक तक पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर की पत्रिका यंग इंडियन के प्रभारी रहे हैं )