एक ऐसा पत्रकार जिसने अन्याय, भेदभाव, दमन, शोषण के खिलाफ खूब लिखा। लिखा ही नहीं वरन जहां कहीं भी, जिस मंच से भी मौका मिला, उसने आम आदमी, हाशिए पर पड़े लोगों की परेशानी उनके संघर्ष को रखने की कोशिश की।
पिछले 16 जुलाई 2022 को ऐसी ही एक पर्यावरणीय रिपोर्टिंग को दुनिया के सामने लाने के बाद उस कहानी के पीड़ितों की खातिर प्रयासरत था, खासकर पीड़ितों में एक 9 साल की छोटी सी बच्ची के चेहरे के ट्यूमर के इलाज हेतू। क्योंकि वह ट्यूमर इतना ज्यादा बड़ा था कि मात्र एक साल के भीतर ही बच्ची के मुंह-नाक,आंख सबको बुरी तरह से प्रभावित कर दिया था, बच्ची का सांस लेना तक मुश्किल हो रहा था।
इस बच्ची से वह इस कदर खुद को जुड़ा महसूस कर रहा था कि वह दिन भर काफी व्यस्त व थका रहा था। इस बात से बिल्कुल ही अंजान कि उसकी इस मुस्तैदी सत्ता को खटक रही है। और यह कोई नई बात भी नहीं है। जब वह (पत्रकार) निश्चिंत हो गया कि अब बच्ची के इलाज का प्रबंध पक्के तौर पर हो जाएगा, तब उसे लगा कि आज की रात वह कई दिनों की भागम-भाग के बाद निश्चिंत होकर सोऐगा।
अगली सुबह रविवार की थी, तो पत्नी और बेटे को भी स्कूल नहीं जाना है, मतलब निश्चिंतता ही निश्चिंतता। और ठीक इसी वक्त उसके घर के बाहर की जा रही थी, उसके लिए घेराबंदी। वास्तविकता यही है कि इतनी बड़ी घेराबंदी की जरूरत तो थी ही नहीं पर जब आपको खतरनाक दिखाना हो, साबित करना हो, आसपास को डराना हो, तो इसकी जरूरत तो होगी ही।
देर रात जगने के बाद, कई बार करवटें बदलने पर जाकर नींद आ पायी। पर अगली सुबह 5 बजे ही घर के दरवाजे पर दस्तक दी जाने लगी। दरवाजा खोलने पर सामने जिला पुलिस करीब 10 गाड़ियों और एक बड़ी फोर्स के साथ सामने खड़ी है।
वह सुबह 17 जुलाई 2022 की थी, आज की सुबह 17 जुलाई 2026 की है, पिछले चार सालों से झारखंड का यह पत्रकार रूपेश कुमार सिंह जिन्होंने अपने काम को ईमानदारी से किया, सलाखों के पीछे कैद है। उनका इकलौता बच्चा जो उसकी गिरफ्तारी के वक्त अपने पांचवा साल पूरा करने वाला था, आज नौ साल का होने जा रहा है। इस दौरान वह अपने पापा से कभी जी भर बात तक न कर पाया है।
वह भी उस वक्त के इंतजार में आस लगाए बैठा है, जब वह अपने स्कूल के अच्छे-बुरे अनुभव पापा से शेयर कर सकें, पूछ सके उनसे भी क्या वह भी यह सब महसूस करते थे। मगर सच्चाई यही है कि वह एक ऐसे पिता का बेटा है जो सच बोलने और सच के साथ खड़े होने की सजा भुगत रहा है।
पर यह भी उतना ही सच है कि न्याय व सच के साथ खड़े रहने वाला इंसान कैद में भी इसके लिए संघर्षरत है।
जेल के अंदर भी अनियमितता व भ्रष्टाचार के खिलाफ भी इनकी लड़ाई जारी है। इन चार सालों में इन्हें झारखंड बिहार के चार जेलों में छः बार जेल ट्रांसफर किया गया है। परोक्ष रूप से कारण रहा है, जेल भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलना, भूख हड़ताल करना आदि।
इन चार सालों में इन्होंने जेल के अंदर व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर अलग-अलग जेल में रहते हुए राष्ट्रपति,न्यायालय, संबंधित जिलाधिकारी, मुख्यमंत्री, गृहमंत्रालय, जेल आईजी, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राजकीय मानवाधिकार आयोग को लिखा है। जिसको लेकर कई बार जेल के अंदर की व्यवस्था में थोड़ा-बहुत सुधार भी हुआ है। बीते 24 जून को आदर्श केन्द्रीयकारा, बेऊर पटना (बिहार) के जेल के प्रशासन और संचालन में भारी गड़बड़ी मिलने के बाद सरकार ने जेल अधीक्षक नीरज झा समेत कई अफसरों को सस्पेंड कर दिया।
इस गडबड़ी और अनियमितता की शिकायत को रूपेश ने भी 15 जनवरी 2026 को पटना जिलाधिकारी को एक विस्तृत पत्र में लिखा था, जिसमें जेल प्रशासन के 12 गंभीर मुद्दों का जिक्र था। यह पत्र न केवल रूपेश की व्यक्तिगत पीड़ा का दस्तावेज थी, बल्कि बेऊर जेल के हजारों बंदियों की साझा आवाज थी। रूपेश को जब 09 अप्रैल 2026 को पुनः भागलपुर के शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीयकारा भेजा गया, तो यहां फिर से कुव्यवस्था फैली हुई थी।
रूपेश ने इसको लेकर अप्रैल 2026 को बिहार के मुख्यमंत्री के नाम एक पत्र लिखा था। जिसमें जेल के अंदर संचालित कैंटीन, बंदियों की हकमारी, जर्जर हो चुकी इमारतों की मरम्मत को नजरअंदाज करने, तथा अन्य जरूरी सुविधा व चीजों को लेकर जिसे जेल मैन्युअल के अनुरूप न करके मनमानेपन से किया जा रहा था, शामिल था। उनके इस पत्र का असर भी पड़ा जेल को नोटिस भी भेजा गया। वर्तमान में थोड़ा-बहुत सुधार होने की बात आई है।
हमें पता है कि जहां पूरी व्यवस्था ही सड़ी है, जहां पत्रकार, स्टूडेंट, शिक्षक, वकील अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े व्यक्ति मतलब अन्याय के खिलाफ खड़ा इंसान को इसलिए जेल में बंद कर दिया जाता है कि वह सच का साथ देता है, तो पूरी सुधार की उम्मीद ही बेमानी है।
इनके सहबंदी के रूप में बंद कुछ लोग जो जेल से बाहर आ चुके हैं, वे लोग बताते हैं कि रूपेश जेल के भीतर भी जेल प्रशासन से सुधार की कोशिश के साथ साथ अपने आस-पास के बंदियों को भी गाली-गलौज देने से बचने, नशा मुक्ति की दिशा में सही पहल करने के लिए भी प्रयासरत रहते हैं।
इन चार सालों में इनका स्वास्थ्य भी बुरी तरह प्रभावित होता रहा है, अभी 02 जुलाई 2026 के खून जांच में इनका ट्राइग्लिसराइड्स का लेवल 435 आया है, (जबकि नार्मल रेंज 150 से नीचे होना चाहिए)। इससे पहले भी 2025 में अगस्त माह में इसी जेल में खून जांच में ट्राइग्लिसराइड्स 519 तथा वीएल डीएल कोलेस्ट्रॉल 125 था। इसके साथ-साथ वह एन्जायटी, कमर दर्द, साइनस जैसी अन्य समस्या से भी ग्रस्त हो गए हैं।
इसके बावजूद भी अपनी सकारात्मकता को साथ लिए रूपेश ने अभी 25 जून 2026 को यूजीसी-नेट की परीक्षा दी है, साथ ही साल 2024 में रूपेश ने जेल में रहते हुए ही इतिहास से एमए पूरा किया है, ‘इग्नू’ में “पत्रकारिता एवं जनसंचार” में भी इनरोल्ड हैं, जेल की नजरअंदाजगी की वजह से अभी यह पूरा नहीं हो पाया है। इससे पूर्व इन्होंने वर्ष 2012 में भागलपुर के तिलका मांझी विश्वविद्यालय से ‘गांधी के विचार’ से भी एमए किया है।
वर्तमान में रूपेश भागलपुर के शहीद जुब्बा केंद्रीयकारा में विचाराधीन बंदी के तौर पर बंद हैं और इन्होंने एनआईए कोर्ट, पटना को ‘हायर एजुकेशन’ को लेकर एक आवेदन पिछले 07 जुलाई 2026 को लिखा है। जिसमें उन्होंने एमए पॉलिटिकल साइंस में एडमिशन की इच्छा जताई है, और इग्नू में एडमिशन दिलाने तथा आगे की पढ़ाई के लिए उचित पहल के लिए कहा है। अभी बीते 15 जुलाई को जेल से फोन करके इनके पुराने सर्टिफिकेट मांगे गए हैं, किसी नए कोर्स में दाखिले के लिए।
जेल के चार साल तीन विषय की पढ़ाई के साथ। जेल के अंदर पढ़ाई लिखाई के लिए भी बहुत संघर्ष करना पढ़ता है तब जाकर आपके हाथों तक कलम-काॅपी और किताब पहुंचते हैं।
रूपेश अपने अब तक के जेल जीवन में कुल 150 किताबें पढ़ चुके हैं। उन्हें कई अन्य किताबें पढ़ने का शौक है पर हम उन्हें उतनी किताबें उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं। उम्मीद खुद एक जिंदा शब्द है और हमें उम्मीद है रूपेश जल्द बाहर आयेंगे आयेंगे और अपनी पसंद की किताबें बिना किसी रोकटोक बिना किसी मुश्किल के पढ़ सकेंगे।
(इप्सा शताक्षी की फेसबुक वॉल से)