संसद चलो मार्च : पत्रकारों पर भी पड़ी पुलिसिया मार

दिल्ली। सोमवार, 20 जुलाई को छात्रों के संसद चलो मार्च के दौरान पुलिसिया दमन के शिकारों में पत्रकार भी शामिल हैं।

इनमें आउटलुक पत्रिका के एक पत्रकार, जिनकी पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है, पर ऐसे हथियार से गोली चलाई गई जो पैलेट बंदूक जैसे है। पत्रकार को लगी चोटें भी वैसी ही हैं जैसी पैलेट लगने पर होती हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, उन पर तब गोली चलाई गई जब वे जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए युवाओं के विरोध प्रदर्शन की कवरेज कर रहे थे। पत्रकार के ऐन समय पर मुड़ जाने पर गोली उनके बैगपैक पर लगी और उनके हाथ में गंभीर चोटें आई हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘घटना के बाद तैयार किए गए मेडिकल रिकॉर्ड में उनके हाथ पर कई छोटे-छोटे छेद जैसे घाव मिले हैं।आउटलुक द्वारा देखी गई तस्वीरों में कई ऐसी चोटें दिखाई देती हैं जो पैलेट लगने से होने वाले घावों जैसी दिखाई दे रही हैं।’

पत्रिका ने चोटों की तस्वीरें और मेडिकल रिपोर्ट भी साझा की हैं। यह घटना राजीव चौक के पास पालिका बाजार के निकट हुई थी।

उधर, एक और पत्रकार बारामासा के राहुल कोटियाल पर भी लाठी पड़ी है और एक वीडियो में देखा जा सकता है कि पुलिस उनके पैरों पर लाठी मार रही है। कोटियाल ने मंगलवार को अपनी एक फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि मुद्दा अब ये रह ही नहीं गया है कि प्रोटेस्ट को थामने के नाम पर जो बल प्रयोग हुआ, उसमें किसी पत्रकार को क्यों पीटा गया? ‘क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक बल प्रयोग करना’ – ये अब महज़ एक किताबी जुमला बन कर रह गया है।

उन्होंने लिखा है कि आज की हकीकत ये है कि प्रतिरोध के हर स्वर को कुचल देने के लिए अब जो पुलिसिया बर्बरता होती है, उसकी चपेट में हजारों मासूम और निर्दोष लोग आ रहे हैं। कल दिल्ली में न जाने कितने मासूम बच्चों को पुलिस ने ऐसे ही बेरहमी से पीटा है। उनमें अधिकांश बच्चे ऐसे थे जिन्हें अपनी आंखों पर विश्वास तक नहीं हो रहा था। वे अवाक थे कि ये अंकल हमें ऐसे क्यों मार रहे हैं। इस बेरहमी से कोई भी पुलिस वाला किसी भी बच्चे या निर्दोष को कैसे मार सकता है। उनमें से अधिकांश ने पुलिस की ये बर्बरता पहली बार देखी थी… 

उन्होंने लिखा है, “मुझ पर पड़ी लाठियां मुद्दा नहीं है और ना ही मैं उसे पत्रकारिता पर हमला मानता हूँ। पत्रकारिता पर असली हमला तो वो है कि सरकार ने तमाम मीडिया घरानों और पत्रकारों की रीढ़ ही गिरवी रखवा ली है… कल दिल्ली में कुछ उपद्रवियों की आड़ लेकर पुलिस ने हजारों निर्दोष बच्चों को जिस तरह से पीटा, ये ही अब ‘न्यू- नार्मल’ है।”

 कोटियाल ने लिखा है “इस बर्बरता की कमान जिन लोगों के हाथ में है, उनसे बस इतना कहना है कि अपने पहाड़ में नेगी दा का एक गीत खूब प्रचलित है जिसके बोल हैं ‘सदनी नि रैणी रे झोंतू तेरी जिमदरी….’ किसी गढ़वाली से पूछ लीजिएगा इसका भावार्थ क्या है…” (भावार्थ : यह बोझ/जिम्मेदारी हमेशा तेरे सिर पर नहीं रहेगी)

(फोटो आउटलुक से साभार)

(जनचौक ब्यूरो)

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