सेलिब्रिटीज को स्क्रिप्ट पहुंच चुकी है

सचिन तेंदुलकर, सलमान खान एक के बाद एक सेलिब्रिटीज के “हमारे प्यारे छात्र…” मार्का बयान आ रहे हैं जिसका मतलब है कि स्क्रिप्ट पहुंच चुकी है। इन बयानों का लब्बोलुआब यही है कि छात्रों के हित सबसे ऊपर हैं, उनकी समस्याएं जेनुइन हैं लेकिन उन्हें सरकार और सिस्टम में भरोसा रखना चाहिए।

अब, नीट पेपर लीक पर आंदोलन कोई कल से शुरू नहीं हुआ, दो ढाई महीने से चल रहा है। इस दौरान 20 से अधिक छात्रों की आत्महत्या के बावजूद, संसद चलो मार्च के दिन पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्रवाई के बाद भी इन सेलिब्रिटीज का मुंह नहीं खुला। जब सरकार ने बात हाथ से निकलती देख अपना सुर बदला, उसके बाद से ही सेलिब्रिटीज भी नींद से जागे हैं।

इससे पूर्व नसीरुद्दीन शाह के शानदार वक्तव्य और शबाना आजमी जैसे कुछ कलाकारों के छात्रों के आंदोलन में शिरकत करने की भी इस ठहरे पानी के तालाब में पत्थर फेंककर हलचल मचाने में भूमिका है।

सोशल मीडिया में अमिताभ बच्चन का एक पुराना ट्वीट भी छाया हुआ था, जो यह दिखाता था कि 2014 के बाद कैसे इन महान लोगों का मुंह बंद हो गया है और तभी खुलता है जब सरकार का संकेत हो और सरकार से स्क्रिप्ट मिल जाए।

यहां तक कि सरकार के पक्ष में मुखर रहने वाले अनुपम खेर जैसे लोगों का भी छात्र प्रेम नसीरुद्दीन शाह के बयान के बाद ही उमड़ा।

हालांकि, पुलिस की बर्बर कार्रवाई पर बोलने के लिए अब भी यह सेलिब्रिटीज तैयार नहीं हैं। कंगना रनौत, जो अब सांसद बन चुकी हैं ने तो इस आशय का बयान दिया कि छात्र संसद पर हमला करने वाले थे और यह तो पुलिस और सुरक्षा बल थे जिन्होंने इन सबको ढाल बनकर बचाया।

सवाल बनता है कि ऐसी धूर्तता कहां से आती है? वैसे कंगना की बात अलग है, वह स्क्रिप्ट में विश्वास नहीं करतीं और इसलिए कई बार बयान बदल लेती हैं या माफी मांग लेती हैं लेकिन अधिकांश सेलिब्रिटीज बिना स्क्रिप्ट के एक शब्द नहीं बोलते।

यह ठीक वैसा ही है जैसे गोदी मीडिया है, जिनके डिबेट के विषयों, लाइन से लेकर ट्वीट की स्क्रिप्ट एक जैसी होती है और सरकार से मुहैया कराई गई होती है। इसीलिए तो जेन ज़ी के इस आंदोलन में सबसे बुरी गत गोदी मीडिया की बनी है। संपादकों, एंकरों के कारनामों का खामियाजा फील्ड के पत्रकारों को भुगतना पड़ रहा है। 

दरअसल, मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो चुका है और बॉलीवुड या खेल जगत के सेलिब्रिटीज भी क्योंकि नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले 12 वर्षों में यही एक काम किया है कि हर क्षेत्र में लालच और/या भय दिखाकर रीढ़ छीन ली है। नतीजतन, जो विश्वसनीयता थी, खत्म हो चुकी है। इसका जीवंत उदाहरण हाल में एक और एक्टर राजकुमार राव की ‘स्वीकारोक्ति’ के रूप में सामने आया।

छात्रों के समर्थन में बयान देने पर सोशल मीडिया में लोगों ने उनका ध्यान ‘मोदी है तो मुमकिन है’ गाने में उनकी मौजूदगी पर दिलाया तो राव ने टिप्पणी की कि वह कभी अपना ज़मीर नहीं बेच सकते और एक गीत में दिखने से यह तय नहीं किया जा सकता कि वह क्या हैं? यहाँ तक तो ठीक था लेकिन इसके बाद उन्होंने जैसे पूरी स्कीम बता दी यह कहकर कि आप नहीं समझ सकते कि हमें किन दबावों का सामना करना पड़ता है। हालांकि उन्होंने यह टिप्पणी हटा दी लेकिन अंग्रेज़ी में जैसा कहते हैं -बिल्ली थैले से बाहर निकल चुकी थी!

हर क्षेत्र में सेलेब्रिटीज़, जिनके बोलने का कुछ असर हो सकता है, सरकार उन्हें चुप कराने या अपनी पसंद का बुलवाने का इंतज़ाम कर चुकी है, यहाँ अपवादों की बात नहीं हो रही।

इसलिए, लोग अब जानने और समझने लगे हैं कि कौन, कब, क्या और कितना बोलेगा और गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं समझते क्योंकि स्क्रिप्ट कितनी भी अच्छी हो, स्क्रिप्ट ही होती है और एक्टर कितना भी अच्छा हो, एक्टर ही होता है।

(चित्र एआई की मदद से)

(लेखक जनचौक से मुंबई से जुड़े हुए हैं।)

Leave a Reply