जंतर मंतर : जांच समिति के गठन पर सवाल, फिर से बनाने की अपील

जंतर मंतर पर छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस बर्बरता और प्रदर्शनकारियों द्वारा हिंसा की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई हाई-पावर जांच समिति को लेकर कुछ याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के सामने यह मामला उठाया और अपनी अर्जी को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की मांग की। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विरोध करते हुए कहा कि यह एक “शरारतपूर्ण अर्जी” थी।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि याचिकाकर्ता समिति के गठन को चुनौती दे रहे थे और उन्होंने कुछ वैकल्पिक नाम सुझाए थे। उन्होंने कहा, “यह शरारतपूर्ण है। मांग समिति को फिर से बनाने और इस या उस मंत्री की जांच करने की है। यह कोई राजनीतिक मंच नहीं है। उन्होंने जजों के नाम दिए हैं।”

इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम जजों के नाम लिए जाने को पसंद नहीं करते।” शंकरनारायणन ने कहा कि उन्होंने इस बारे में कुछ भी जमा नहीं किया है, और भरोसा दिलाया कि अगर अर्जी लिस्ट भी होती है, तो कोई नाम नहीं लिया जाएगा।

एक अन्य समूह के याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश एडवोकेट प्रशांत भूषण ने शंकरनारायणन की अर्जी का समर्थन करते हुए कहा कि यह “याचिकाकर्ताओं की आम चिंता” को दर्शाता है। भूषण ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को समिति को लेकर “संदेह” हैं। मेहता ने इस पर कहा कि कुछ पक्षों को “हर चीज़ को लेकर हमेशा संदेह रहता है”।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कोर्ट ने सबसे अच्छे उपलब्ध लोगों को चुना है। याचिकाकर्ताओं की आशंकाओं को दूर करने की कोशिश करते हुए, उन्होंने कहा कि समिति सभी पक्षों की मदद से सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में काम कर रही है। मुख्य न्यायाधीश ने अर्जी को लिस्ट करने पर सहमति जताते हुए कहा, “जो भी काम करेगा, हमारी देखरेख में करेगा। हमने मामले का निपटारा नहीं किया है। आप सभी समिति की मदद के लिए वहां हैं। उन्हें काम करने दें और देखें।”

18 अगस्त को, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय समिति के गठन का आदेश दिया था। इसके अन्य सदस्यों में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रवि शंकर झा, दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस शलिंदर कौर, सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के रिटायर्ड डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस डॉ. एल.आर. बिश्नोई शामिल हैं।

कोर्ट ने यह आदेश उन याचिकाओं पर दिया है जिनमें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस बल के ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल के आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी। हालांकि समिति को पुलिस और प्रदर्शनकारियों – दोनों पक्षों की ओर से हुई हिंसा के आरोपों की जांच करने के लिए कहा गया है, लेकिन उसे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की ज्यादती और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ यौन उत्पीड़न की शिकायतों को प्राथमिकता देनी होगी।

मुख्य याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने अपनी अर्ज़ी में कहा कि याचिकाकर्ताओं ने सुझाव दिया था कि समिति की अध्यक्षता भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश करें और इसमें एक पूर्व अटॉर्नी जनरल के साथ-साथ एक रिटायर्ड महिला पुलिस महानिदेशक भी शामिल हों। हालाँकि, मौजूदा समिति में ऐसे सदस्य नहीं हैं।

याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि समिति में “जांच कौशल” वाले अधिकारियों और “नागरिक स्वतंत्रता और जनहित के मामलों में बेहतरीन ट्रैक रिकॉर्ड वाले लोगों” की कमी है। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि समिति के कुछ सदस्यों का केंद्रीय कार्यपालिका के सदस्यों (जिनमें केंद्रीय गृह मंत्री भी शामिल हैं) के साथ लंबे समय से संबंध रहा है, और इसलिए, इस बात की “उचित आशंका” है कि स्वतंत्र जांच पक्षपाती हो सकती है।

याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि मुद्दा किसी सदस्य की व्यक्तिगत ईमानदारी से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह ढांचागत (स्ट्रक्चरल) मुद्दा है। याचिकाकर्ता ने कहा, “इस जांच में केंद्रीय कार्यपालिका, गृह मंत्रालय, दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की भूमिका की जांच होनी है। जब आरोपों की जांच में इतने उच्च-स्तरीय अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल करनी हो, तो जांच को कार्यपालिका और संस्थागत प्रभाव तथा किसी भी तरह के संभावित पक्षपात से स्पष्ट और निर्णायक रूप से अलग रखा जाना चाहिए।”

(जनचौक ब्यूरो)

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