बुखार के पहले ही दिन ही मन बेचैन हो गया। यह शनिवार की बात है। इतनी बड़ी-बड़ी खबरें और मेरे लिए अपने छोटे से बेडरूम के बेड पर सुबह से शाम तक लेटे रहने की मजबूरी। इस दरम्यान पुणे से पटना, दिल्ली से जयपुर और कोलकाता से मुंबई, हर जगह खबरें ही खबरें थीं। शनिवार को पुणे में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का छात्रों की गूंज कार्यक्रम के तहत छात्राओं का विशाल हुजूम उमड़ पड़ा।
कार्यक्रम के स्वरूप में सचमुच नवीनता थी। मंच तो बना था लेकिन वह किसी सभा या सम्मेलन के मंच जैसा बिल्कुल नहीं। बिल्कुल अलग किस्म के संवाद का प्लेटफॉर्म सा था।
टीवीपुरम के चैनलों को मैं आमतौर पर सत्ता-पक्ष से आने वाली किसी कथित या वास्तविक ब्रेकिग न्यूज की सूचना मिल जाने के बाद ही खोलता हूं कि उक्त खबर पर आगे क्या चल रहा है! उसके लिए भी अंग्रेजी के सिर्फ दो चैनल देखता हूं! एक चैनल की एक युवा महिला एंकर आज के सियासी मौसम में भी पत्रकार की तरह पेश आती है। उसी चैनल का एक साठ-साला एंकर भी अपने देर शाम के कार्यक्रम में अच्छी बहस कराने की हर संभव कोशिश करता है। संसद-सत्र के दौरान अगर घर पर हूं तो ‘संसद चैनल’ को नियमित तौर पर खोलता हूं।
पुणे वाले कार्यक्रम के लिए मोबाइल पर सोशल मीडिया-यूट्यूब आदि देखने की कोशिश की लेकिन बुखार और शरीर दर्द के चलते पता नहीं क्यों आंखों से पानी गिऱने लगता। फिर बंद कर दिया। टीवी चैनल खोलना तो असह्य हो जाता। बुखार 102 डिग्री फांद रहा था। सोचा डाक्टर साहब की बात मानकर आराम करते हैं। रविवार को अखबारों में पढ लूंगा। अभी जल्दी क्या है, न लेख लिखना है और न वीडियो बनाना है! फिर चिंता किस बात की?
सुबह थोड़ी देर से अखबार आये। बंडल खोलकर मेरी बीवी ने अखबार दिये तो बारी-बारी से देखने लगा। देश के दो सबसे बड़े अंग्रेजी अखबारों में खबर ही नहीं। मुझे लगा, पहले पेज पर नहीं है तो बीच के किसी पेज पर होगी। पर बीच में भी नहीं दिखी। मुझे लगा, शायद तबीयत ठीक नहीं, इसलिए अंदर के पेजों पर इस खबर को ठीक से खोज नहीं पा रहा हूं। नाश्ता करने की तनिक भी इच्छा नहीं थी। यहां तक बड़े कप में चाय पीने वाले मेरे जैसे व्यक्ति के लिए बुखार और बदन-दर्द आदि के चलते छोटे कप की चाय खत्म करने में परेशानी हुई।
चाय के बाद तीनों अखबारों को पेज-देर-पेज बांच गया। पहले ही पेज पर ‘जर्नलिज्म ऑफ करेज’ के टंकित ‘स्लोगन’ या ‘संकल्प’ के साथ प्रकाशित होने वाले एक अंग्रेजी अखबार के पहले पेज पर राहुल गांधी की कुछ छात्राओं के साथ एक छोटी सी फोटो थी। उसके साथ संकेतक लगा था कि खबर पेज-5 पर! उस पेज पर पुणे डेटलाइन से पांच कॉलम में खबर दी गई थी। साथ में चित्र भी था। चूंकि अपनी आदत आज भी अखबार पढ़ने की बनी हुई है इसलिए बेरोजगारी में भी तीन अंग्रेजी अखबार लेता हूं।
कुछ साल पहले तक छह अखबार लेता था और नौकरी के समय तो संख्या इससे काफी ज्यादा रहती थी। उसमें हिंदी अखबार भी होते थे। तब हिंदी अखबारों की ऐसी दुर्दशा नहीं हुई थी। आज भी मैं एक हिंदी अखबार को उसकी वेबसाइट से पढ़ लेता हूं, जो अपेक्षाकृत कम ‘गोदी’ है।
‘जर्नलिज्म ऑफ करेज’ लोगो वाले अखबार के रविवारी संस्करण के अंदर के दूसरे ही पेज पर ‘द वर्ल्ड’ शीर्षक पेज पर बहुत सारी विदेशी खबरें मिलीं। वायरल में पड़े मेरे शरीर को थोड़ी राहत मिली। बाहर की खबरों को पढ़ते हुए किसी तरह का तनाव नहीं महसूस हो रहा था। याद नहीं, इससे पहले इतने ध्यान से मैने विदेश की खबरों का पन्ना इतनी देर तक कब पढ़ा था! ‘द वर्ल्ड’ शीर्षक जिस पन्ने को पहले दस-बारह मिनट में खत्म कर लेता था, उसे तकरीबन आधे घंटे पढ़ा।
राष्ट्रीय खबरों के पहले पेज पर ‘वंदे मातरम्’ पर खबर पढ़ने में भला मेरी क्या और क्यों रूचि होती, जिसने ‘आनंद मठ’ को वर्षों पहले पढ़ा था। अब तो हालत ये है कि कोई भी उपन्यास पढना मेरे लिए मुश्किल हो चला है। ‘आनंद मठ’ के लेखक बंकिम बाबू की वैचारिकी के कुछ प्रमुख पहलुओं की देश के शीर्ष लेखकों, खासकर इतिहासकारों ने तीव्र आलोचना की है। इनमें ‘स्वदेशी आंदोलन’ पर गंभीर शोध-लेखन करने वाले विख्यात इतिहासकार प्रो सुमित सरकार प्रमुख हैं।
उन्होंने भी माना कि ‘इसमें ‘राष्ट्रवादी आह्वान’ था तो ‘सांप्रदायिक युद्ध-घोष’ भी था।’ प्रो सरकार के इस वाक्य में ‘आनंद मठ’ की पूरी समीक्षा समायी हुई है। दरअसल, आनंद मठ’ में एक तरफ मुसलमानों के प्रति सांप्रदायिक-विद्वेष है तो दूसरी तरफ ब्रिटिश शासन के प्रति भक्ति-भाव भी है। वैसे भी बंकिम चंद्र अंग्रेजी हुकूमत में एक नौकरशाह थे लेकिन लेखक के रूप में उनकी भाषा कलात्मक और शैली प्रभावी थी। इसी के चलते उनकी विवादास्पद कविता के शुरुआती छंद के दो शब्द-‘वंदे मातरम्’ लोकप्रिय नारा बन गये।
इस वायरल बुखार में बेड पर पड़े-पड़े कई हैरतंगेज खबरों और घटनाक्रमों से भी रू-ब-रू हुआ। इनमें एक है-आरक्षण-विरोध के लिए तरह-तरह के सियासी मंचों का गठन। एक मंच किसी वकील साहब ने बनाया है, एक किसी कथित विद्वान ने बनाया है, एक सत्ता-पोषित किसी गालीबाज ने बनाया है। सबको मालूम है कि ये कौन लोग हैं? इनके सत्ता-पक्ष या समाज के वर्चस्ववादी शक्तियों से क्या रिश्ता है? इसलिए ये ढोंग क्यों? सत्ता-पक्ष अपने इन प्यारे-दुलारे आरक्षण-विरोधियों की मांग फौरन मान लेनी चाहिए!
संघ-भाजपा के नेता पहले से कहते रहे हैं कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए! पहले समीक्षा की तो 2019 में सवर्ण आरक्षण लागू हो गया, जो बुनियादी तौर पर संविधान के विचार से बिल्कुल इतर था। क्या ठिकाना केंद्र को फिर कहीं निर्देश मिले-फिर समीक्षा होनी चाहिए! फिर एक झटके में दलित-आदिवासी-ओबीसी को मिले सारे आरक्षण एक अध्यादेश जारी कर रद्द कर दीजिये! अभी भारत में 49.5% आरक्षण क्रमशः एससी, एसटी, ओबीसी को है। इनमें ओबीसी को 27% आरक्षण 1992 के बाद मिलना शुरु हुआ था।
अद्यतन सरकारी आंकडों के हिसाब से एससी, एसटी और ओबीसी को बीते दसेक साल से आरक्षण के उनके निर्धारित कोटे का किसी वर्ष भी ठीक से पालन नहीं हो रहा है। कभी ‘नॉट फाउंड सूटेबुल’ तो कभी किसी अन्य तिकड़म से उन्हें सेवाओं में घुसने नहीं दिया जा रहा है। देश की 80% से ज्यादा आबादी के लिए निर्धारित 49.5% आरक्षण। शेष 50.5% सीटों पर कौन नियुक्त होता है? इसमें कितने प्रतिशत अन्य वंचित तबकों के लोग मेरिट से लिये जाते हैं? क्या सरकार इसके आंकड़े घोषित करेगी?
फिर 2019 के संसदीय चुनाव से ऐन पहले 10% सवर्ण आरक्षण किया जा चुका है, जो धड़ल्ले से भरा जा रहा है। यानी भारत की कुल 15.5% अनुमानित सवर्ण आबादी(उच्चवर्णीय) के लिए इस वक्त तकरीबन 60.5% सीटें ‘सीधे-सीधे आरक्षित’ हो गई हैं।
भारत में सु्ु्प्रीम कोर्ट से हाईकोर्ट, भारतीय प्रशासनिक सेवा से विदेश सेवा, मीडिया से कारपोरेट, राष्ट्रीय सम्पदा में हिस्सेदारी और मंत्रिमंडल से विभिन्न सदनों के सदस्यों और उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि के आंकडे सार्वजनिक स्पेस में हैं। पर दलित-आदिवासी-ओबीसी आरक्षण के विरूद्ध हुड़दंग मचाने वालों को सार्वजनिक स्थलों पर आने के लिए क्यों प्रेरित किया जा रहा है?
यूजीसी रेगुलेशन विवाद में पोल-पट्टी खुल गई थी कि उस वक्त सड़कों पर दलित-ओबीसी के खिलाफ कौन हंगामा मचाने लगे थे? उनके पीछे कौन थे? और फिर उस रेगुलेशन का क्या हुआ? यह सब इतिहास में दर्ज हो रहा है। दुनिया की बात छोडिये, भारतीय समाज से भी समझा जा सकता है कि इतिहास का चक्र थमता नहीं है! सबकुछ जानने के बावजूद वे सबकुछ अपने पास रखना चाहते हैं ये कहकर कि वे अपनी योग्यता से आते हैं!
इस देश के राजकाज के हर प्रमुख निकाय पर (दक्षिण के कुछेक राज्यों को छोड़कर) सन् 1947 से आज तक सवर्ण समुदाय से आये लोगों का ही संपूर्ण आधिपत्य है। दक्षिण में भी प्रशासनिक समीकरण बदलने की पुरजोर कोशिश जारी है।
इतने सारे ‘योग्य लोगों’ द्वारा संचालित राजसत्ता के बावजूद भारत दुनिया के देशों के विकास-सूचकांक में आज भी इतना फिसड्डी क्यों बना हुआ है? फिलहाल, विकास का सबसे प्रतिनिधि आंक़़ड़ा देख लेंः इसे संयुक्त राष्ट संघ का यूएनडीपी जारी करता है-इस समय भारत 193 देशों की सूची में 130 वें स्थान पर है। बाकी आंकड़े भी इसी तरह के हैं।
लेकिन हां, जो लोग जंतर-मंतर के जेएनजी प्रोटेस्ट और राहुल गांधी को मिलते समर्थन से परेशान होकर आरक्षण-विरोध और असहमत लोगों को उत्पीडित करने का नया हथकंड़ा तलाश रहे हैं, उन्हें सबसे पहले अपना ‘मनचाहा एजेंडा’ पूरा करने की पहल तुरंत करनी चाहिए! अगर आप सब में सहमति बन जाये तो ‘100 फीसदी आरक्षण सिर्फ सवर्ण समुदाय’ का कर लीजिये!
मनुस्मृति को ‘राष्ट्रीय पवित्र ग्रंथ’ घोषित कर दीजिये! विरोध करने वाले सभी नागरिकों का वोटिंग अधिकार छीनकर जेल में डाल दीजिये! भारत सचमुच विश्वगुरू बन जायेगा!
वायरल बुखार की बहुत तकलीफ में आज यह टिप्पणी लिख रहा हूं। स्वस्थ होने पर शायद इससे ज्यादा बेहतर और शोधपूर्ण लिखना संभव होगा। लेकिन खराब सेहत के बावजूद आज लिखना जरूरी लगा।
(उर्मिलेश प्रिंट और टीवी मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं और यूट्यूब चैनल UrmileshOfficial भी चलाते हैं।)