(भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के प्रतिनिधिमंडल की केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना क्षेत्र के दौरे के बाद एनी राजा, निशा सिद्धू और विनीत तिवारी की रिपोर्ट सार संक्षेप में यहाँ दी जा रही है – संपादक)
विकास का अर्थ यह नहीं है कि आपने कितने हज़ारों-लाखों करोड़ के ढाँचे खड़े किये, जिन्हें देखकर पर्यटक आपकी इंजीनीयरिंग की क्षमताओं पर दाँतों तले उँगली दबायें। विकास का अर्थ यह भी नहीं होता कि आपने मुट्ठी भर लोगों के जीवन स्तर को उठाने के लिए अनेक गुना ज़्यादा लोगों के जीवन को मृत्यु से बदतर बना डाला। विकास के लिए सबसे पहले उन्हें विश्वास में लेना ज़रूरी होता है जिन्हें उस तथाकथित विकास के लिए खामियाजा भुगतना पड़ता है।
विकास के लिए अपने घर, गाँव, खेत, ज़मीन, पेड़, पशु, वातावरण छोड़ने वालों को उससे बेहतर जीवन मिलना चाहिए जिस जीवन को उन्हें छोड़ना पड़ रहा है। भारत सरकार और सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा भी है कि विस्थापित लोगों का पुनर्वास इस प्रकार करना चाहिए कि उनसे जो जीवन छीना गया है, उनके लिए उससे बेहतर जीवन सुनिश्चित किया जा सके।
केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना में बेहतर जीवन तो दूर की बात है, सामान्य मनुष्यों की तरह का जीवन भी उन लोगों को नहीं दिया गया है, जिनसे उनका जंगल, खेत, खलिहान, गाँव, सबकुछ सरकार ने विकास के नाम पर छीन लिया गया। इस परियोजना के कारण जिन आदिवासियों और ग्रामीणों को विस्थापन का आघात झेलना पड़ रहा है, मध्य प्रदेश सरकार ने उसे “सम्मानजनक पुनर्वास” कहा है। हमने जो वस्तुस्थिति वहाँ जाकर देखी है, उससे लगता है कि इसे पुनर्वास नहीं, नर्कवास कहना चाहिए।

पृष्ठभूमि
केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बहने वाली दो नदियों को आपस में जोड़ने की परियोजना है। परियोजना का घोषित उद्देश्य दोनों नदियों के पानी को मिलाकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के सूखे ज़िलों के खेतों को सिंचाई और लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध करवाना है। इसके लिए नदी का पानी बाँध बनाकर मोड़ा जाएगा। बाँध छतरपुर ज़िले में बनेगा। बाँध बनेगा तो डूब आएगी और डूब में गाँव डूबेंगे।
परियोजना छह वर्षों में पूरी होगी और इसकी लागत लगभग 44,000 करोड़ रुपये आएगी।
जब लोगों के घर गाँव डूबेंगे तो लोग उसका विरोध भी करेंगे। केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना के डूब क्षेत्र के लोगों के ऐसे विरोध की बातें समाचार-पत्रों और मीडिया में वर्षों से यदा-कदा दिख जाया करती थीं, लेकिन पिछले लगभग दो-तीन महीनों में वहाँ के विस्थापितों ने अपने साथ होने वाली नाइंसाफ़ी के खिलाफ़ देश भर का ध्यान खींचने के लिए अनेक उपाय अपनाये। अनेक प्रकार से सत्याग्रह और अहिंसक विरोध-प्रदर्शनों के माध्यम से उन्होंने अपने साथ हो रहे अन्याय की तरफ़ देश के लोगों का ध्यान खींचा।
जाँच दल
इन्हीं सब जानकारियों के आधार पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के केन्द्रीय नेतृत्व ने वस्तु-स्थिति का जायजा लेने के लिए अपना एक तीन-सदस्यीय जाँचदल गठित किया। जाँच दल में सीपीआई की राष्ट्रीय सचिव एनी राजा, भारतीय महिला फ़ेडरेशन की राष्ट्रीय महासचिव निशा सिद्धू और प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी शामिल थे।
इस जाँचदल ने 23 और 24 अगस्त 2026 को छतरपुर ज़िले में मौजूद एक पुनर्वास स्थल करोंदिया का दौरा किया, जहाँ डूब क्षेत्र में आने वाले गाँव ढोंढर से विस्थापित ग्रामीण बसाये गए हैं। जाँचदल पुनर्वासित ग्रामीणों के साथ ही ग्रामीणों के अधिकारों के लिए सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं श्री अमित भटनागर, सुश्री दिव्या, श्री हिसाबी आदि से भी मिला।
जाँचदल ने परियोजना स्थल का भी दौरा किया और परियोजना का निर्माण कर रही कंपनी (नागार्जुन कन्स्ट्रक्शन कंपनी (एनसीसी) के अधिकारियों से भी चर्चा की। साथ ही छतरपुर के ज़िला प्रशासन प्रमुख कलेक्टर श्री मृणाल मीणा से भी मुलाक़ात कर उन्हें पुनर्वास संबंधी अपने पर्यवेक्षणों और अनुशंसाओं से अवगत करवाया।
पर्यवेक्षण
ढोंढर गाँव परियोजना क्षेत्र में मौजूद है। वहाँ के निवासी सैकड़ों ग्रामीणों को पुलिस ने लाठी के दम पर और ज़ोर-ज़बरदस्ती से उजाड़कर वहाँ से क़रीब 25-30 किलोमीटर दूर काबर-करोंदिया गाँव के पास ऐसी ज़मीन पर छोड़ दिया। डामर की सड़क किनारे जिस जगह पुनर्वास स्थल है, वहाँ हमने जो देखा, वह मनुष्यों के रहने लायक परिस्थितियाँ हरगिज नहीं कही जा सकतीं। कुछ प्रमुख बातों का उल्लेख हम यहाँ कर रहे हैं, विस्तृत रिपोर्ट में और भी बातें आएँगी:
1. जिन्हें प्रशासन ने पुनर्वास के लिए पात्र माना है, उसमें ग्रामीणों के मुताबिक़ ढेरों विसंगतियाँ हैं। यहाँ प्रत्येक परिवार को रहने के लिए 20 गुणा 50 वर्गफ़ीट के आकार के प्लॉट मुहैया कराये गए हैं, (जिसका सरकार ने कोई मूल्य नहीं लिया है), जो आमतौर पर उन घरों के आकार की तुलना में बहुत छोटे हैं जहाँ वे पहले ढोंढर में रहा करते थे। सरकार ने पुनर्वास पैकेज के तहत प्रत्येक वयस्क यूनिट को साढ़े बारह लाख रुपये दिए हैं ताकि उस पैसे से वे मकान बनवा सकें।
2. जब जाँचदल इस पुनर्वास स्थल पर पहुँचा तो वहाँ एक पटवारी महोदय सूची में नाम जोड़ने का कार्य कर रहे थे। उनसे बात करने पर उन्होंने बताया कि ज़िला प्रशासन ने अनेक नाम जोड़ने के लिए उपयुक्त पाये हैं जिन्हें घर के प्लॉट आदि नहीं मिले हैं। ऐसे वयस्क व्यक्तियों की संख्या अभी भी 150 से अधिक बतायी जा रही है जिन्हें कागज़ी सुबूतों के अभाव में अभी भी घर की ज़मीन नहीं मिली है।
3. जिस जगह पर इन ग्रामीणों को घर के प्लॉट दिये गए हैं, वह जगह सड़क किनारे है और सड़क की ऊँचाई से 4-5 फ़ीट नीचे हैं। वहाँ बारिश के कारण पूरा तालाब बना हुआ था और घरों के अंदर जाने के लिए लोगों ने भरे पानी के बीच पत्थर डालकर रास्ता बनाया हुआ था। यह दृश्य बसाहट में घुसने के साथ ही देखा जा सकता है।
4. यहाँ अधिकांश परिवार आदिवासी और अन्य पिछड़ा वर्ग के हैं। अधिकांश लोगों के प्लॉट पर काम चल रहा है लेकिन अभी रहने लायक नहीं हुए हैं। लोग घर बनवाते जा रहे हैं और साथ ही बाहर ईंटों को जोड़कर एक कोठरी बनाकर उसी में रह रहे हैं। इसी अस्थायी कोठरी में उनका सामान भी रखा हुआ था जिसमें उनका वर्षभर खाने का अनाज भी रखा हुआ था। बारिश की वजह से वह सारा अनाज गीला हो गया। जाँचदल ने जब दौरा किया तब लोगों का अनाज उन्होंने सूखने के लिए घर के बाहर धूप दिखाने के लिए फैलाया हुआ था लेकिन रोज ही बारिश हो रही थी इसलिए अनाज सूख नहीं पा रहा था और खराब होने की कगार पर पहुँच चुका था।

5. जाँचदल ने पाया कि ग्रामीणों को विस्थापित करने के लिए प्रशासन और पुलिस ने लाठी और ज़बरदस्ती का सहारा लिया किन्तु पुनर्वास स्थल पर लोगों को पटकते हुए यह भी नहीं सोचा कि उनके लिए कम से कम अस्थायी शौचालय, पीने के पानी की व्यवस्था, आवश्यक स्वास्थ्य और चिकित्सा की ज़रूरी सुविधाएँ तथा छोटे बच्चों के लिए स्कूल और आंगनवाड़ी की व्यवस्था की जाए। जाँचदल के दौरा करने पर वहाँ पूरी रिहायश के लिए प्रशासन ने दो हैन्डपम्प लगवाये थे जिन में से एक खराब था। आंगनवाड़ी नहीं थी। स्कूल नहीं था। शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं थी, सड़कें नहीं थीं, जिसे सड़क कहा जा सकता था, वह तालाब बनी हुई थी।
6. जाँचदल की महिला साथियों एनी राजा और निशा सिद्धू ने बस्ती में मौजूद गर्भवती महिलाओं के बारे में जानकारी ली तो पता चला कि वहाँ 4-5 महिलाओं को लगभग पूरे वक़्त का प्रसव चल रहा था, जिनके लिए कोई सुविधा नहीं सोची गई थी। अगर रात-बिरात प्रसूति का समय आ जाए तो न बसाहट में दाई मौजूद थी, न दूर-दूर तक कोई ठीक-ठाक स्वास्थ्य सुविधा मौजूद है।
7. जाँचदल को यह भी पता चला कि सत्याग्रह खत्म करवाने के लिए जब पुलिस द्वारा खदेड़े जाने का ग्रामीणों ने विरोध किया था तो पुलिस ने अनेक ग्रामीणों और आंदोलनकारियों पर अनेक आपराधिक प्रकरण दर्ज कर दिए गए।
जाँचदल ने परियोजना स्थल का दौरा किया जिसमें एनसीसी कंपनी के अधिकारियों ने परियोजना संबंधी तकनीक जानकारी दी। उनके मुताबिक़ उनकी ज़िम्मेदारी केन नदी पर बाँध बनाकर नदी का रुख मोड़ना है जिसके लिए उन्हें बाँध बनाना और दो टनल बनानी हैं। आगे केन नदी के पानी को क़रीब 200 किमी विदिशा के क़रीब ले जाकर नहर के ज़रिये एक अन्य बड़ी नदी बेतवा के साथ मिलाया जाएगा और नहरें कौन, कब और कैसे बनाएगा, इसकी जानकारी उन्हें नहीं थी।
उन्होंने बताया कि इस परियोजना से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की हज़ारों एकड़ ज़मीन को सिंचाई मिलेगी और लाखों लोगों को पेयजल मिलेगा। परियोजना क्षेत्र में दौरा करने गए जाँचदल ने देखा कि पूरा इलाक़ा सागौन का गहन वन है जो पूरी तरह डूब जाने वाला है।
जब क्षेत्र के आंदोलनकारी अमित भटनागर से इस परियोजना के प्रभावों के बारे में बात की तो उन्होंने बताया कि इस परियोजना से क़रीब 46 लाख पेड़ डूब जाएँगे, क़रीब सौ शेरों की रिहायश वाला टाइगर रिजर्व कोर एरिया डूब जाएगा और आगे घड़ियालों का अभयारण्य भी इससे प्रभावित होगा। सबसे बड़ी बात यह कि नदी जोड़ परियोजना में अपेक्षाकृत नीचाई पर बह रही और बेतवा से छोटी नदी केन नदी के पानी को ऊपर उठाकर बेतवा में मिलाया जाना कैसे उचित कहा जा सकता है।
यदि यह योजना वाकई लोगों के हित में है, तो छतरपुर और पन्ना ज़िलों के प्रभावित 21 गाँवों के ग्रामीणों को बेहतर जीवन और नियमानुसार पुनर्वास क्यों नहीं किया जा रहा है? क्यों ग्रामीणों को लालच और भय दिखाया जा रहा है?
जाँचदल ने यह भी देखा कि काम के अभाव में पुनर्वास स्थलों पर मौजूद पुरुष ग्रामीणों को नशे की चीजें पहुँचायी जा रही हैं। वहाँ कुछ लोग दिन-दहाड़े शराब पिये पाये गए। पूछने पर पता चला कि नशे के सौदागर पुलिस की मिलीभगत से लोगों को अवैध शराब पहुँचा रहे हैं। यह भी पता चला कि लगातार आंदोलन और अनियमितताओं तथा ग्रामीणों पर ज़्यादती के चलते मध्य प्रदेश सरकार ने छतरपुर कलेक्टर को बदल दिया है और चंद रोज़ पहले ही नये कलेक्टर श्री मृणाल मीणा को छतरपुर पदस्थ किया गया है।

अनुशंसाएँ
अगले दिन 24 अगस्त 2026 की सुबह जाँचदल के सदस्यों ने श्री मृणाल मीणा से मुलाक़ात की और अपने देखे गए अनुभवों को साझा किया। जाँचदल ने कहा कि पुनर्वास स्थल पर अविलंब एम्बुलेंस, अस्थायी शौचालय, मेडिकल टीम, आंगनवाड़ी, स्कूल और उनके भीगे हुए अनाज के बदले उन्हें अच्छा अनाज आदि की सुविधाओं को तुरंत शुरू किया जाए तथा इसके लिए लालफ़ीताशाही के अवरोधों को आड़े न आने दिया जाए।
जाँचदल ने माँग की कि ग्रामीणों और आंदोलनकारियों पर लगाये गए मुकदमे तुरंत हटाये जाएँ और तुरंत ही रोज़गार गारंटी योजना के तहत इन विस्थापित ग्रामीणों को उपयोगी रोज़गार उपलब्ध किया जाए। कलेक्टर महोदय ने इस बातों पर तत्काल अमल की आश्वस्ति दी। जाँचदल जल्द ही अपनी विस्तृत रिपोर्ट जारी करेगा और पुनः क्षेत्र का दौरा करके प्रशासन और शासन के दावों की तसदीक करेगा।