कहीं पक्ष में तो कहीं खिलाफ

रिश्ता या तो प्यार-मोहब्बत और भरोसे पर टिका होता है या फिर डर, आशंका और लालच पर। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रिश्ता बाप-बेटे का है या सगे भाइयों का या पति-पत्नी और प्रेमी-प्रेमिका का। दुनिया के सारे रिश्ते इन दोनों श्रेणियों की जद में आ जाते हैं।

दिलचस्प है कि दोनों तरह के रिश्ते सफल या असफल होते देखे जा सकते हैं। एक पक्ष वफादारी की मूरत हो और फिर भी उसके हिस्से साथी की बेवफाई आ जाए, ऐसी कई मिसालें हम सबके इर्दगिर्द भी मिल जाती हैं। दूसरी ओर परिवार में आतंक का पर्याय माने जाने वाल पिता भी रिटायरमेंट के बाद धीरे-धीरे लाचार दिखने लगते हैं और एक समय उनके सामने आवाज तक ऊंची करने की हिम्मत न रखने वाले बच्चे उन्हें बात-बात पर झिड़कियां सुनाते नजर आने लगते हैं।

बहरहाल, चाहे घर और परिवार के अंदर की बात हो या दफ्तर की या देश-समाज के अलग-अलग हिस्सों की, हायरार्की वाले रिश्तों या लेन-देन से जुड़े मामलों में सयाने वही होते हैं जो जज्बात का हवाला चाहे जितना भी दें, उन पर भरोसा ज्यादा नहीं करते। सालों पुरानी दोस्ती का वास्ता देने के बाद भी सूद पर पैसे देने वाला लाला आपकी बात पर भरोसा नहीं करता। वह गारंटी के तौर पर आपसे घर-जमीन के कागजात या कीमती गहने रखवाने के बाद ही कर्ज की रकम आपके हवाले करता है।

ऐसे ही, चाहे परिवार के अंदर हों या बाहर तानाशाही प्रवृत्ति वाले व्यक्ति कभी आपको कन्विंस करने के चक्कर में नहीं पड़ते। एक तो उनके पास इतना वक्त नहीं होता कि वे आपका दिल जीतने में अपनी ऊर्जा लगाएं। दूसरी बात यह कि आप अपने अंदर की आवाज सुनकर उसके मुताबिक आचरण करें, यह रिस्क वे नहीं ले सकते।

उनका अंतरात्मा जैसी चीज पर खास यकीन नहीं होता। उन्हें पता नहीं होता कि आपकी अंतरात्मा आपको कब क्या आदेश दे देगी। उन्हें इससे मतलब भी नहीं होता कि आप अपनी अंतरात्मा को कैसे समझाते हैं। वे बस आपके व्यवहार को नियंत्रित करना चाहते हैं। और इसके लिए आपको मजबूरियों के जाल में जकड़ देना उनके लिए न केवल अधिक आसान बल्कि ज्यादा भरोसेमंद भी होता है।

डर और लालच को ऐसे लोग बहुत अच्छे से पहचानते हैं। इन दोनों कारकों के हाथों इस्तेमाल होने की भी इन्हें आदत होती है और इनका इस्तेमाल करना भी इन्हें आता है। इनके बरक्स तर्क और सिद्धांत का सवाल उठाने वाले इन्हें संदिग्ध नजर आते हैं क्योंकि इनकी अपनी स्वतंत्र गति होती है।

तर्क औऱ सिद्धांत को किसी व्यक्ति की सत्ता या ताकत नियंत्रित नहीं करती। इन्हें पराजित सिर्फ ज्यादा ठोस तर्क ही कर सकता है, और यह जवाबी तर्क किसी सत्ता से नहीं उपजता। विचार ही ऐसे तर्कों की जननी होता है जिस पर किसी तानाशाह का वश नहीं होता।

लाजिमी है कि चाहे परिवार की सत्ता हो या देश की, तानाशाही प्रवृत्ति हमेशा सहज संवाद, तर्क और तथ्यों की स्वतंत्र पड़ताल के खिलाफ खड़ी दिखती है। ताकत के इस्तेमाल के जरिए लोगों को सोचने-समझने की सहज प्रक्रिया से दूर रखना उसे हमेशा ज्यादा सुविधानजक लगता है। लब्बो लुआब यह कि लोकतंत्र बचाने की लड़ाई सिर्फ सरकार के स्तर पर नहीं चल रही होती, हम खुद भी इस लड़ाई में कहीं उसके पक्ष में खड़े होते हैं तो कहीं खिलाफ।

(रेखाचित्र प्रतीकात्मक : एआई की मदद से)

(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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