पीपीपी कहने को प्राइवेट पब्लिक प्रोजेक्ट होता है लेकिन इसका वास्तविक अर्थ है : “यानी तू भी पी मैं भी पीयूं जनता का खून पीयूं!” विगत कई वर्षों से 10 राज्यों में भारत सरकार और राज्य सरकार मिलकर मोबाइल पशु चिकित्सा वैन चला रहे हैं। इस पूरी परियोजना में 60% खर्च केंद्र सरकार का एवं 40% राज्य सरकारों का होता है। इसके पूरे कार्य की मॉनीटरिंग भी स्थाई सरकारी पशु चिकित्सा अधिकारियों द्वारा होती है। लेकिन हर राज्य में यह परियोजना अलग-अलग ढंग से चलती है।
मसलन उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में पशु चिकित्सकों को 56,000 प्रति माह दिया जाता है, जबकि उत्तराखंड में मात्र 42,000 रुपए प्रति माह। इसी प्रकार मध्य प्रदेश में जहां ड्राइवर और कंपाउंडर को 20,000 के करीब मानदेय दिया जाता है। उत्तराखंड में यह केवल 10,000 है।
हां एक बात और जहां मध्य प्रदेश में कंपाउंडर की पोस्ट के लिए 2 साल का डिप्लोमा चाहिए, उत्तराखंड 1962 योजना में मात्र कुछ दिन की ट्रेनिंग पाये हुए पैरावैट से यह काम करवाया जा रहा है।
फिर आगे देखें। तमाम स्टाफ को रखना और निकालना और उनका ट्रांसफर करना प्राइवेट कंपनी के हाथों में होता है। आखिर क्यों?? वेतन चार चार माह में आता है।
ऐसा लगता है कि घर-घर मोबाइल सेवाएं प्रदान करने वाली यह योजना भी आगे हटा ली जाएगी और सब काम हर प्रदेश में तीन माह की ट्रेनिंग पर रखे हुए पेरावैट करेंगे। आज भी मध्य प्रदेश जैसे राज्य में जो केस पशु चिकित्सा वाहन के डॉक्टर द्वारा नहीं किया जाता वह केस पेरावैट को सौंप दिए जाते हैं, जो उन गाय भैंसों कुत्ते बिल्लियों का इलाज करते हैं।
इस सारे अभियान में पशुपालकों के साथ बड़ा अन्याय होता है क्योंकि उन्हें तीन माह की ट्रेनिंग प्राप्त लोगों द्वारा अपने एक लाख मूल्य के पशु का इलाज कराना पड़ता है। यही नहीं जहां मध्य प्रदेश राज्य में एक पशु के ऊपर डेढ़ सौ रुपए फीस ली जाती है और किसी किसान के 10 पशु बीमार होने पर उसे ₹1500 लूट लिए जाते हैं। दवाइयां भी अपर्याप्त और सब स्टैंडर्ड हैं। वहीं पर उत्तर प्रदेश में यह फीस मात्र ₹5 है तो उत्तराखंड में यह राशि बिना किसी मूल्य के है।
बिल्कुल फ्री में दस दिन की ट्रेनिंग प्राप्त आदमी से इलाज या मौत की सुविधा।
उत्तराखंड में पशु चिकित्सकों के शोषण का यह हाल है कि उन्हें शाम को 5:00 बजे आए हुए केस को भी अटेंड करना पड़ता है और 24 घंटे ड्यूटी पर रहना पड़ता है। आज जहां सरकार मोबाइल के माध्यम से स्थापित पशु चिकित्सा अस्पतालों को खत्म करने पर तुली हुई है वह योजना शीघ्र ही जनता के सामने आने वाली है ऐसा प्रतीत होता है। क्योंकि यही सब कुछ तो हम मेडिकल और शिक्षा के क्षेत्र में देख रहे हैं।
भारत के सबसे पिछड़े और गरीब जिले अलीराजपुर, एमपी के किसान को भी चार पशु के बीमार होने पर ₹600 देना और उत्तर प्रदेश के कहीं सक्षम किसान से मात्र ₹5 लेना कहां का न्याय है? आने वाले समय में ऐसा लगता है कि स्थापित पशु चिकित्सा अस्पताल समाप्त कर दिए जाएंगे और उनके बदले पैरावैट को जोमैटो जैसे कार्यकर्ताओं में बदल दिया जाएगा जो कि गांव-गांव जाकर अधो मानक चिकित्सा पशु पालक को प्रदान करेंगे। इसमें चाहे गाय भैंस मरे या बचे। सरकार अपना पल्ला इससे झाड़ लेगी।
मैंने संयुक्त किसान मोर्चे की मीटिंग के दौरान कई बार पशुपालकों का मुद्दा उठाया परंतु हमारे किसान नेताओं का भी इस और ध्यान नहीं है। उदाहरण के तौर पर दूध के न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात लीजिए। एक पशु के बीमार होने पर डॉक्टर आराम से तीन ₹4000 प्रतिदिन के हिसाब से ले लेता है और पूरे इलाज में 20 या ₹30000 खर्च हो जाता है तो ऐसे में आप दूध की लागत किस प्रकार लगाएंगे। न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण कैसे होगा?
(डॉ उमेश चंदोला की टिप्पणी। लेखक भूतपूर्व कर्मचारी खाचरौद, उज्जैन, मध्य प्रदेश; सचल पशु चिकित्सा सेवा, उत्तराखंड हैं।)