पटना। 30 अगस्त को पटना के आईएम हाल में सामाजिक न्याय आंदोलन ( बिहार) के बैनर तले मंडल कमीशन की सिफारिशें: सामाजिक न्याय का संघर्ष एवं चुनौतियां विषय संपन्न हुई। आधार वक्तव्य देते हुए सामाजिक न्याय आंदोलन ( बिहार) के संयोजक रिंकू यादव ने कहा कि मंडल कमीशन की सिफारिशें एक ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। आज भी यदि हम सामाजिक न्याय कोई एजेंडा बनाना चाहते हैं, मंडल की सिफारिशें उसकी एक बुनियादी आधार होंगी। मंडल जाति उन्मूलन और संवैधानिक-लोकतांत्रिक भारत के निर्माण का एक बुनियादी आधार देता है। आरक्षण, शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के साथ भारत में संरचनात्मक बदलाव की सिफारिश करता है। वह अविलंब क्रांतिकारी भूमि सुधार की पुरजोर सिफारिश करता है। मंडल पिछड़ों की दस्तकार जातियों, शिल्पकार जातियों और अन्य मेहनकशों की उन्नति-प्रगति का रास्ता खोलता है। जिस मंडल कमीशन की सिफारिशों को सामाजिक न्याय की पार्टियों का घोषणा-पत्र बनना चाहिए था, वह क्यों उनका घोषणा-पत्र नहीं बना।
हिंदी पट्टी की सामाजिक न्याय की राजनीतिक पार्टियां मंडल की दृष्टि और एजेंडा से बहुत दूर हैं। आज अपरकास्ट के बढ़ते वर्चस्व के खिलाफ के साथ पूंजी के केंद्रीकरण और कार्पोरेट कब्जे के खिलाफ लड़ना होगा। हमें उत्पीड़ित जातियों को जातियों में बांटकर नहीं, बल्कि उन्हें एक वर्ग के रूप में संगठित करना होगा। जगदेव प्रसाद, रामस्वरुप और त्रिवणी संघ मेहनकश वर्ग, अर्जक वर्ग की बात करता है। मंडल कमीशन की रिपोर्ट एक पूरा पैकेज था। आरक्षण और भूमि सुधार के सवाल पर एक साथ लड़ना होगा। भूमि सुधार और हर स्तर पर हिस्सेदारी का सवाल एक साथ उठाना होगा। हमें टुकड़े-टुकड़े में नहीं, समग्र पैकेज को एक साथ एजेंडा बनाना होगा।
मुख्य वक्ता प्रोफेसर सतीश देशपांडे ने कहा कि आज हमारे समाने चुनौतियों की फेहरिश्त है। पहली चुनौती यह है कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट को आधी सदी बीत चुकी है। आज के हालात बहुत बदल गए हैं। इस बदले हालात में हमें विचार करना है। पहली बात यह है कि इन चार-पांच दशकों में पिछड़ों में संपन्न वर्ग पैदा हुआ है। उसके अन्य पिछड़े वर्गों के बीच के संबंधों को कैसे देखें?
अगली चुनौती अजगर बनकर खड़ी हिंदुत्व की राजनीति है। यह सिर्फ किसी पार्टी तक सीमित नहीं। इसे सर्वसामान्य और सहज स्वीकृति बना दिया गया है। जिन्हें सिरफिरे कहते थे, वे लोग मुख्य धारा में आ गए हैं। सीना तानकर खड़े हैं। हिंदुत्व की राजनीति में कुछ प्रदेशों में पिछड़े वर्ग के लोग शामिल हो गए हैं। चौथी चुनौती यह है कि यदि सामाजिक न्याय एक समुद्र है, तो आरक्षण उसका एक बूंद है। कैसे उस बूंद की रक्षा करते हुए सामाजिक न्याय के समुद्र को सामने लाएं।
सबसे बड़ी चुनौती हमारे सामने यहां यह है कि हर चीज को जाति ने लील लिया है। यह हमारे सामने स्थायी ग्रहण बन गया है। यहां हर चीज जाति से छन कर आता है। यहां ब्रिटिश साम्राज्यवाद, पूंजीवाद, नव-उदारवाद सबकुछ जाति से छनकर आया है। हिंदू धर्म से जाति नहीं, बल्कि जाति से ही हिंदू धर्म आया है। जाति ही बुनियाद है, अब उसके खिलाफ संघर्ष नहीं दिख रहा है। जाति के विनाश का सवाल जाति के सुधार का सवाल या जाति के सशक्तीकरण का सवाल बन गया है। आज कोई जाति के उन्मूलन की बात नहीं कर रहा है। हम सब कुछ अपनी जाति के दायरे में सोच रहे हैं। अब कोई जाति प्रथा को खत्म करने की बात नहीं कर रहा है। जाति के उन्मूलन के बिना हम जाति आधारित वर्चस्व एवं अन्यायों को खत्म नहीं कर सकते।इस समय जो होने जा रहा है, वह जाति जनगणना के नाम पर फरेब सा है।
अली अनवर अंसारी ने कहा कि मंडल कमीशन इतना ऐतिहासिक है कि भारत के आजादी के बाद के इतिहास को मंडल पूर्व और मंडल बाद के रूप में बांटकर देखा जाता है। मंडल कमीशन मुस्लिम समाज के बड़े हिस्से को अपने में समाहित करता है, क्योंकि इस समाज में भी पिछड़ा और दलित हैं। बड़ी संख्या में दलित भी मुसलमान और ईसाई भी हैं। मंडल कमीशन की एक सिफारिश जाति जनगणना भी है। फौैरी कार्यभार यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर सही अर्थों में जाति जनगणना हो। नरेंद्र मोदी सरकार ने जाति जनगणना को तो दबाव में तो मान लिया, लेकिन अब इसका तरीका ऐसा अपनाया कि इसका कोई मतलब ही न रह जाए। यह किसी काम की जाति जनगणना न रह जाए।
दलित इंटरलेक्चुल फोरम के मुख्य संयोजक डॉ. अलख निरंजन ने कहा कि आधुनिक भारत का मुख्य संघर्ष ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों के बीच संसाधनों पर कब्जे का रहा है। अंग्रेजों के पहले भारत में आने वाले बाहरी शासक-विजेताओं को ब्राह्मणवाद ने अपने भीतर समाहित कर लिया था। यहां तक कि उन्हें वर्ण-जाति के खांचे में बांट दिया। उन्होंने कहा कि जो आरक्षण का विरोधी है, वह संविधान एवं लोकतंत्र का विरोधी है।
फारवर्ड प्रेस के मैनेजिंग एडिटर अनिल वर्गीज ने मिथकों की व्याख्या करते हुए बताया कि कैसे हमें सांस्कृतिक तौर पर उच्च जातियों के वर्चस्व को स्वीकार करने की मानसिकता में डाल दिया गया है। दक्षिण भारत में वर्ण-जाति वर्चस्व को बहुत पहले नारायण गुरू जैसे लोगों ने चुनौती दिया था। उन्हें सफलता भी मिली। जबकि हिंदी पट्टी में यह वर्ण-जाति विरोधी सांस्कृतिक आंदोलन उतना सफल नहीं हुआ। जब बहुजन समाज शासन-सत्ता में आते हैं, न्यायपूर्ण एजेंडा लागू करते हैं। संवेदनशील तरीके से सबके हितों को देखते हैं। उत्तर भारत में हर बहुजन क्रांति के बाद एक प्रतिक्रांति हुई। हम यहां बहुजन सांस्कृतिक आंदोलन की जड़ें नहीं जमा पाए। हमें यह विचार करना चाहिए कि क्यों दक्षिण भारत हिंदी पट्टी से इतना आगे निकल चुका है। कैसे हमारे बहुजन आंदोलन का प्रतिरोध जड़ पकड़ सके, इस पर विचार करना चाहिए?

अजीत कुशवाहा ने कहा कि हमें मंडल कमीशन सिफारिशें लागू करने के लिए राजनतिक सत्ता की जरूरत है। भूमि सुधार मंडल की एक महत्वपूर्ण सिफारिश है। बिहार की नीतीश सरकार ने अपने जाति आधारित सर्वे ( जाति जनगणना) में भूमि के मालिकाने का सर्वे नहीं किया। इसके बाद बिहार की जाति जनगणना ( जाति आधारित सर्वे) बहुत सारे ऐसे सच उजागर किया है, उस पर गहन विचार-विमर्श एवं विश्लेषण की जरूरत है।
श्रवण निराला ने कहा कि आखिर क्योें बिहार में मंडल कमीशन की सिफारिश की अनुकूल जमीन नहीं मिली? जब तक जमीन का सवाल हल नहीं होगा, तब तक वंचित तबकों के बुनियादी हालात नहीं बदलेगी। यदि रातों-रात बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो सकता है, तो जमीन क्यों नहीं दी जा सकती है?
संगोष्ठी के शुरूआत में सामाजिक न्याय आंदोलन ( बिहार) सचिव सुबोध यादव ने इस संगोष्ठी की प्रस्तावना रखते हुए कहा कि हम यह संगोष्ठी के जरिये ऐसे दौर में सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं, जब वंचित तबकों के आरक्षण पर सवाल उठाया जा रहा है और उसकी समीक्षा करने की बात वर्चस्वशाली ताकतों द्वारा हो रही है।
ऐसे समय मंडल कमीशन की सिफारिशों पर बात करना जरूरी हो गया है। मंडल कमीशन सिर्फ आरक्षण तक सीमित नहीं था। मंडल ने देश के उत्पादन संबंधों में निर्णायक परिवर्तन की सिफारिश की थी। कमीशन ने क्रांतिकारी भूमि सुधार का प्रस्ताव दिया था।
चंद्रभूषण सिंह यादव ने कहा कि हमें घरों में संविधान और मंडल कमीशन की रिपोर्ट एवं सिफारिशें तो नहीं मिलेंगी, गीता, पुराण और रामचरित मानस तो मिलेगा। जो किताबें हमें गुलाम बनाती हैं, उसे पढ़ते हैं, लेकिन संविधान और मंडल कमीशन की रिपोर्ट नहीं पढ़ते। जो हमारी मुक्ति का दस्तावेज है। बी. पी. मंडल ने हजारों पिछड़ी जातियों के मुक्ति का रास्ता मुहैया कराया। हिंदी, मुसलमान, सिख, ईसाई और अन्य सभी जातियों के पिछड़े वर्गों के लोगों के लिए मंडल 40 सिफारिशें कीं। सिर्फ उनकी एक सिफारिश ( 27 प्रतिशत नौकरियों में आरक्षण) लागू करने पर पर वर्चस्वशारली वर्ग सड़कों पर उतर आया। आज हमारे समाज के नेता ही हमारे खिलाफ खड़े हो रहे हैं। हमारे समाने अवसर और चुनौतियां दोनों हैं। न्यायालय भी वर्चस्वशालियों के पक्ष में खड़ा होकर आर्थिक आधार पर आरक्षण को संवैधानिक ठहरा देता है, जबकि संविधान में इसका कोई प्रावधान ही नहीं है। आज मंडल कमीशन की 40 सिफारिशों के लागू कराने के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने की जररूत है।
संबोधित करने वाले दूसरे नामों में दुर्गेश कुमार,इंजीनियर हरिशचंद्र मंडल,विश्वा यादव,इंजीनियर नागेंद्र,सूरज यादव,राकेश कुमार,देवशंकर आर्या आदि शामिल हैं।
विकास यादव ने संचालन किया तथा रामानंद पासवान ने धन्यवाद ज्ञापन किया और स्वागत किया-अभिषेक आनंद ने।
(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित।)