सुबह उठा। पहली खबर जो सोशल मीडिया पर देखने को मिली, वह पटना से थी। कक्षा एक में पढ़ने वाले 6 साल के बच्चे का मीडिया पर बयान आ रहा था। जब बच्चों से पूछा गया कि तुम प्रोटेस्ट में क्यों आए हो, तो वह तपाक से बोला कि पेपर लीक और भ्रष्टाचार के खिलाफ। अनपढ़ मुख्यमंत्री हैं। बात करते हुए शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की मांग कर बैठा। कल पटना में प्रोटेस्ट के दौरान बच्चों के फूटे हुए सिर का जिक्र करते हुए वह एसपी से सवाल पूछता है, माथा फोड़ने का अधिकार आपको किसने दिया। एक सवाल कि किस कक्षा में पढ़ते हो। बच्चा बेलौस जवाब देता है, कक्षा वन में। प्रोटेस्ट स्थल पर एक ऐसी तस्वीर दिखाई देती है, जिसमें वह एक दर्जन पुलिसकर्मियों से घिरा हुआ आगे बढ़ रहा है। कैप्शन है—पटना के प्रोटेस्ट में 6 साल के बच्चे की गिरफ्तारी।
मैं चकित हूं। देश में कौन-सी आंधी चल रही है? अभी जून में हमने जेन-जी के बारे में सुना, जब सीजेपी का उदय हुआ और 6 जून को दिल्ली में पहली प्रोटेस्ट सभा हुई। उसके बाद 20 जुलाई को दिल्ली में संसद मार्च के दौरान छात्रों और छात्राओं के ऊपर जुल्म, दमन और प्रतिरोध का नया इतिहास लिखा गया। घबराई और डरी सरकार ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले लिया। तब तक पेपर लीक के साथ शिक्षा की दुर्व्यवस्था, बढ़ती फीस, शिक्षा का निजीकरण, महंगी होती शिक्षा, बंद होते विद्यालय, शिक्षकों की कमी, विद्यालयों में सामान्य सुविधाओं जैसे स्वच्छ पानी, भवन, शौचालय, आने-जाने के रास्ते के सवाल के साथ शिक्षा की गुणवत्ता के क्षरण का एजेंडा इस तरह से जन विमर्श में नहीं था। लेकिन जंतर-मंतर पर हुए दमन के बाद आग भड़क उठी।
जैसे वर्षों से बीमार चल रहे किसी मनुष्य की बीमारी अचानक उभर आए। वैसे ही जंतर-मंतर पर धरना और भूख हड़ताल शुरू होने के बाद 12 वर्षों से दबा आक्रोश और संकट उजागर हो गया। परिणाम हुआ कि अगस्त शुरू होते-होते देश के अनेक राज्यों के अलग-अलग शहरों से लेकर सुदूर ग्रामीण अंचलों में अल्फा जनरेशन सड़क पर आ गई। जिसकी अगुवाई 9 साल से 15 साल की बच्चियां कर रही हैं। कुछ ही दिनों में मोदी के 12 साल के राज की नाकामी का संदेश देश में कितने दूर और कितनी गहराई तक पहुंच गया, आकलन करना अभी संभव नहीं है।
हमने देखा है कि जेन-जी के बाद शिक्षा और जीवन बचाने की लड़ाई का झंडा अल्फा जनरेशन के हाथ में पहुंच गया है। पाटली पुत्र के हृदय स्थल से जेन-बीटा पीढ़ी भी प्रोटेस्ट के मंच पर आ गई। इस पीढ़ी का आगाज इतना शानदार और धमाकेदार है कि सत्ता के पांव कांपने लगें। स्वागत है बीटा-जेन। आपके रंगमंच पर आगमन का। आश्चर्य यह है कि आप उस समय भारत के राजनीतिक-सामाजिक मंच पर अवतरित हुए हैं, जिसके एक दिन पहले नीति आयोग की डरावनी रिपोर्ट आयी थी। रिपोर्ट के अनुसार, “भारत के 8 करोड़ 70 लाख युवा जो 17 से 28 आयु वर्ग के हैं, रोजगार की उम्मीद खो चुके हैं।
उनमें जिंदगी जीने की जिजीविषा ही नहीं बची है। जो स्किल्ड है, पढ़े-लिखे हैं। निराश हो रोजगार की तलाश छोड़ चुके हैं।” रिपोर्ट में उन्हें ‘नीट’ नाम से संबोधित किया गया है। भारत की डेमोग्राफिक डिविडेंड की सबसे ऊर्जावान, गतिशील और आसमान से तारे तोड़ लाने वाली पीढ़ी की इस हताशा के लिए कौन जिम्मेदार है। अभी इस पर बहस शुरू ही होने वाली थी कि बीटा पीढ़ी के 6 साल के बच्चे आदित्य राज ने सड़क पर उतरकर मनुष्य की अजेयता का जयघोष कर दिया।
25 तारीख को पटना में छात्रों, युवाओं का बीपीएससी के खिलाफ विरोध मार्च था, जिसमें छात्रों के ऊपर लाठियां चलीं। सर फूटे और गिरफ्तारियां हुईं। इस प्रोटेस्ट में अचानक 6 वर्षीय आदित्य राज चर्चा में तब आया, जब उसे पुलिस पकड़कर ले जा रही थी। जिस तरह से वह बेखौफ होकर पुलिस के झुंड के बीच चल रहा था, उससे नए भारत के शौर्य, साहस और सामर्थ्य का संकेत मिल रहा था, जिसे भारत के हिंदुत्व की प्रतिगामी सोच वाले भोंपू पिछले 12 वर्ष से लॉलीपॉप देकर बरगला रहे थे। अनशनकारी छात्रों के बीच आदित्य द्वारा बेबाकी से पूछे जाने वाले सवालों का जवाब दिए जाने से लोग हैरान थे।
जब उससे पूछा गया कि तुम किस क्लास में पढ़ते हो, तो आदित्य ने बोला, वन क्लास है। आश्चर्य! फिर पूछा गया कि तुम्हें अभी परीक्षा लीक के खिलाफ चल रहे आंदोलन में आने की क्या जरूरत थी। तो उसने कहा कि हमारी भी परीक्षाएं लीक हो सकती हैं। एक अपढ़ मुख्यमंत्री के रहते हुए ऐसा निश्चय ही होगा। इसके साथ शिक्षा मंत्री व मुख्यमंत्री के त्यागपत्र की मांग कर बैठा। उसके गुस्ताखी की सजा तत्काल दी गयी और कोतवाली में 5 घंटे बैठाए रखा गया। राजा नंगा है। लोकजीवन की दंतकथा याद आ गई।
आज एक यूट्यूबर मनीष कश्यप आदित्य राज के घर गए। मनीष ने बच्चे से पूछा कि तुम्हारे पिता क्या करते हैं, तो उसने बेझिझक बताया कि वे दिहाड़ी मजदूर हैं और मां घरों में झाड़ू-पोछा करती हैं। न किसी तरह की हिचक, न कोई हीन भावना। गजब का आत्मविश्वास। मनीष की यूट्यूब से ही पता चला कि आदित्य को 2 बजे पुलिस ले गई और शाम 7 बजे तक थाना कोतवाली में रखा गया। लड़के ने ही बताया कि उसके मां और पिता को पुलिस ने मारा है। मां के चेहरे पर चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे। गुनाह यह था कि उनका 6 साल का बेटा प्रोटेस्ट में भाग लेने क्यों गया। क्रूरता की नई मिसाल। माता-पिता के चेहरे से तनाव झलक रहा था।
लेकिन 5 घंटे पुलिस कस्टडी में रहने के बाद भी बच्चे के चेहरे पर भय के लक्षण नहीं थे। वह क्या पढ़ता है, पूछने पर उसने तत्काल संविधान की प्रति दिखा दी। एक और आश्चर्य। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के संविधान का हवाला देने लगा। इसके अलावा उसके पास भगवत गीता की प्रति भी है, जिन्हें पढ़कर आदित्य ने सुनाई। 6 साल के आंदोलनकारी बच्चे का परिवार 9 फीट लंबे, 7 फीट चौड़े एक छोटे-से कमरे में रहता है। एक दिहाड़ी मजदूर परिवार में भीमराव अंबेडकर का संविधान, भगवत गीता और शिक्षित होने का सपना लिए एक नन्हा बालक पल रहा है।
शिक्षा और ज्ञान विरोधी पाखंडी, धूर्तों, धरती पर जहां कहीं भी हो, सावधान हो जाओ! जेन-अल्फा और जेन-बीटा पीढ़ी आ रही है।
देख रहे हो हिंदू राष्ट्रवादियों! पिछले बारह वर्षों में तुम्हारे द्वारा भय, अत्याचार, जुल्म, नफरत, पाखंड के इतने बड़े व्यापार के बावजूद पाटलिपुत्र की आंखों में लोकतंत्र और ज्ञान का सपना किस शिद्दत से पल रहा है। अगर तुम्हें इस सपने से डर लगता है और इसे ठोस आकार लेने के पहले ही कुचलना चाहते हो, तो समय रहते तुम्हें इसके अंजाम को समझ लेना चाहिए।
अभी तक सीजेपी के प्रोटेस्ट के बारे में कहा जा रहा था कि यह मिडिल क्लास या उसके ऊपर के परिवारों के मोहभंग के कारण पैदा हुए असंतोष का विस्फोट है। आंदोलन का आधार डिजिटल दुनिया से जुड़े हुए समाज तक ही फैला है। लेकिन पटना तक आते-आते आंदोलन का वर्ग आधार और चरित्र बदल गया है। उदारीकरण के द्वारा लुटेरी पूंजी के मालिकों ने 21वीं सदी की पहली चौथाई तक जिस तरह की आर्थिक नीतियों पर अमल किया है, उससे करोड़ों दिहाड़ी मजदूरों की फौज तैयार हुई और सुरक्षित रोजगार और व्यवस्थित जिंदगी के सपने का विनाश हुआ।
उससे मध्यवर्गीय समाज से लेकर संगठित-असंगठित मजदूरों तक जिस स्तर की हताशा-निराशा का विस्तार हुआ है, उससे बहुत बड़े वर्ग में असुरक्षा बोध को जन्म दिया है। एलपीजी के 35 वर्षों में असंगठित कामगारों का विस्तार हुआ, जिसमें कॉरपोरेट जगत के ह्वाइट कॉलर कर्मचारियों से लेकर आउटसोर्सिंग से रोजगार की दुनिया में आए दिहाड़ी मजदूर, झाड़ू-पोछा लगाने वाले घरेलू कामगार (महिला-पुरुष), ठेले-खोमचे के साथ जिंदगी की जंग लड़ रहे करोड़ों छोटे कारोबारी आते हैं। यही आंदोलन के सहभागी हैं।
चूंकि उन्हें शिक्षा की ताकत का भान है। वे जानते हैं कि आज की दुनिया में सर्वाइव करने की पूर्व शर्त है शिक्षित और स्किल्ड होना। बदलती तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना। इसलिए संघ, भाजपा और उसके प्रचार तंत्र द्वारा आरोपित मिथ्या चेतना के दायरे से बाहर निकल रहा समाज ने शिक्षा और तकनीक की ताकत को समझ लिया है, जिससे तुम ही नहीं, दुनिया के लुटेरे शासक डरते हैं कि लोग पढ़ने-लिखने और उससे जन्म लेने वाली लोकतांत्रिक चेतना के साथ अपने को जोड़ न लें। हजारों प्रयास करके तर्क और ज्ञान की परंपरा को नष्ट कर देना हिंदुत्व की दूरगामी परियोजना का अभिन्न अंग रहा है।
यह सिर्फ एक खबर नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में 94 हजार विद्यालय बंद कर दिए गए हैं। यह वर्तमान शासकों की छिपी परियोजना का स्थायी तत्व है, जिसके साथ वह समाज को गाय, गोबर, मूत्र, मूर्तिपूजा से लेकर तीन महीने तक चलने वाली जयंती की श्रृंखलाओं और कांवड़ यात्राओं में उलझाए रखना चाहते हैं। परिणाम शिक्षा को व्यापार बना दिया गया और ‘उसे पे एंड यूज’ के बाजारवादी सिद्धांत से जोड़ दिया गया है। विश्वविद्यालयों, कॉलेजों में प्रतिबद्ध और अयोग्य लोगों की भर्ती करने के साथ आम आदमी की पहुंच से इन संस्थाओं को दूर किया जा रहा है।
लेकिन विकास की इस मंजिल पर आकर एक पेंच फंस गया है। लोग ज्ञान, विज्ञान, शिक्षा, लोकतंत्र, बराबरी का स्वाद पिछले 80 वर्षों में चख चुके हैं। इसलिए शिक्षित होना 145 करोड़ भारतीयों की इच्छा-आकांक्षा का सर्वोच्च लक्ष्य है। पाटलिपुत्र के 6 साल के बच्चे आदित्य ने इस जलते यथार्थ का ऐलान करके शासकों को डरा दिया है।
जेन-जी आंदोलन का प्रभाव कितना गहरा और व्यापक है। इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि जब तक हमारे जैसे लोग चीनी की महंगाई का असर महसूस करते, तब तक ग्रामीण स्त्रियां मोदी को संबोधित करते हुए अपनी भाषा में गीत गाने लगीं और पीएम से सवाल पूछने लगी हैं—“75 रुपए की चीनी और 75 रुपए का पौवा। बतावा मोदी चाचा, चाय पीं हमनी की पीं पौवा।” कब तक सवालों का जवाब देने से सत्ताधारी भागते रहेंगे?
मुझे 2013 का नवंबर-दिसंबर याद आ रहा है। नरेंद्र मोदी भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री के कैंडिडेट घोषित हो चुके थे। इस घोषणा का कितना दूरगामी प्रभाव पड़ने जा रहा है, इसका आकलन नवंबर तक मेरे पास नहीं था। सोचने, महसूस करने और निष्कर्ष निकालने का एक घिसा-पिटा पैमाना दिमाग में काम करता रहा है। जबकि गांव में भाजपा के चुनाव चिन्ह वाले गमछे, झंडे और झोले पहुंचने लगे थे। एक दिन की बात है। मैं अपने गांव में एक करीबी के घर पर बैठा था। तब तक क्या देख रहा हूं कि 15-20 बच्चे एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखे हुए रेल की छुक-छुक की आवाज के साथ नारा लगाते आगे बढ़ रहे हैं।
घर-घर मोदी, हर-हर मोदी, मोदी लाओ देश बचाओ जैसे नारे बच्चों के खेल का हिस्सा बन चुका था। इनकी उम्र 6-7 साल से लेकर 12-13 साल की रही होगी। जिन्हें आज अल्फा जेनरेशन कहा जा रहा है। जिनकी जाति और सामाजिक आधार अलग-अलग था। भूमिहार बहुल गांव में भूमिहारों के बच्चों के साथ ब्राह्मण, बनिया, अति पिछड़ी जातियों के नाई, गौड़ (कहार) और बांस का काम करने वाली अधिकार जाति के बच्चे थे। वहां बैठे मित्र ने व्यंग्य में कहा कि देखिए बच्चे क्या कर रहे हैं?
मैं जिनके यहां बैठा था, वे भाजपा के गांव स्तर के कार्यकर्ता हैं। जुलूस को देखकर एक-दूसरे के साथ हंसी-मजाक का माहौल बन गया। मैं अवाक था। एक जड़ और परंपरागत समाज में निचले स्तर तक पहुंच गई भाजपा की लहर के वेग को अभी तक मैं क्यों नहीं देख पाया था। नरेंद्र मोदी बनारस से संसद के उम्मीदवार होंगे—यह खबर पूर्वांचल में नीचे तक पहुंच गई थी। इसके क्या राजनीतिक प्रभाव होने जा रहे हैं, धीरे-धीरे समझ में आने लगा। अडानी का चार्टर प्लान तैयार था। पहली बार हाईटेक चुनाव देखा गया। कृत्रिम लाल किले से मोदी का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समानांतर भाषण का सम्मोहन जनता के सिर पर चढ़कर बोल रहा था। चुनाव से पहले ही कॉरपोरेट पूंजी और हिंदुत्व के गठजोड़ ने ठोस आकार ग्रहण कर लिया। अब सिर्फ वोट के दिन का इंतजार था।
चुनाव के दौरान मेरे एक मित्र ने मुझसे पूछा कि भाजपा को क्या डेढ़ सौ सीट मिल जाएगी। मैंने कहा कि ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है। सूई कहां जाकर रुकेगी, मैं कह नहीं सकता। उन्होंने कहा दो सौ। मैंने कहा ग्राफ और ऊपर जा रहा है। क्या 250 सीट मिल सकती है? मैंने कहा सूई कहां जाकर रुकेगी, अभी तय नहीं है। लेकिन वह ऊपर की तरफ भाग रही है। उन्होंने कहा तब तो भाजपा सरकार बना लेगी। मैंने कहा संकेत तो यही दिखाई दे रहे हैं।
आज वह पीढ़ी जो उस समय खेल खेल रही थी, अब 20 की आयु वर्ग से ऊपर पहुंच चुकी है। उन बच्चों को मैं नीति आयोग द्वारा वर्णित 8 करोड़ 70 लाख की सूची में पा रहा हूं। अधिकांश हताश हैं। कुछ मुंबई, नोएडा, दिल्ली, गुड़गांव, लुधियाना या सूरत की यात्राएं करके घर लौट चुके हैं। कुछ भाग्यशाली थे, जो रोजगार के लिए खाड़ी के देशों में पहुंच गए हैं। बाकियों की आंखें अच्छे दिन का इंतजार करते हुए पथरा गई हैं। अब यह पीढ़ी 2013-14 के कॉरपोरेट प्रायोजित तूफानी अभियान के नॉस्टेल्जिया से बाहर आ गई है और जेन-जी की आंधी का हिस्सा बन रही है।
देखना है कि यह आंधी, जिसका झंडा पटना के दिहाड़ी मजदूर के 6 वर्षीय बेटे आदित्य से लेकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की शोध छात्रा, मिलिट्री ऑफिसर की बेटी नेहा बोरा और जेएनयू की ज्वाइंट सेक्रेटरी तथा मध्य प्रदेश के पिछड़े जिले से आने वाली निम्न आय वर्ग की दानिश अली ने अपने हाथ में ले रखा है, वह पिछले 13 वर्षों से क्रूरतापूर्वक लोकतंत्र के विध्वंस पर फासीवाद की जो दीवार खड़ी की गई है, उसके कितने खंभों को उखाड़ पाती है। इसी पर आधुनिक विकसित लोकतांत्रिक भारतीय गणराज्य का भविष्य निर्भर करेगा।
(जयप्रकाश नारायण वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।)