पहली तिमाही में जीडीपी की 7.8% वृद्धि पर सुभाष गर्ग और प्रो. अरुण कुमार ने उठाया सवाल

भारत की अर्थव्यवस्था की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि के आंकड़े पर पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और प्रोफेसर अरुण गर्ग ने सवाल उठाये हैं।

सुभाष गर्ग ने सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के पुराने आंकड़ों में संशोधन को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि वित्त वर्ष 2025-26 के लिए पहले जीडीपी करीब ₹86.05 लाख करोड़ बताई गई थी, लेकिन नई श्रृंखला में उसी तिमाही का आंकड़ा घटकर लगभग ₹80 लाख करोड़ रह गया है। यानी करीब ₹6 लाख करोड़ से ज्यादा का अंतर। इसके साथ ही पिछले साल की पहली तिमाही की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर, जिसे पहले 7.8 प्रतिशत बताया गया था, नई श्रृंखला में संशोधित होकर 6.9 प्रतिशत हो गई है।

मीडिया से बातचीत में गर्ग ने पुराने और नए आंकड़ों की तुलना करते हुए करीब 2.6 प्रतिशत की वृद्धि का हिसाब सामने रखा है। उनका तर्क है कि अगर पिछले साल के पुराने नाममात्र जीडीपी आंकड़े और इस साल के मौजूदा आंकड़े को देखा जाए तो 7.8 प्रतिशत की चमकदार वृद्धि की तस्वीर काफी अलग दिखाई देती है।

गर्ग का मूल सवाल है कि पिछले साल के आंकड़ों में इतना बड़ा संशोधन क्यों हुआ और इसका मौजूदा वृद्धि दर पर क्या असर पड़ा।

दूसरी और, प्रोफेसर अरुण कुमार ने सत्य हिन्दी पर द डेली शो में वरिष्ठ पत्रकार डॉ मुकेश कुमार के साथ बातचीत में जीडीपी की गणना के तरीके पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि देखना होगा कि जीडीपी की गणना किस तरीके से की जा रही है और क्या यह तरीका भारत की वास्तविक आर्थिक गतिविधियों को पर्याप्त रूप से पकड़ पा रहा है?

प्रोफेसर के मुताबिक पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि का आंकड़ा उस समय आया है जब अर्थव्यवस्था को कई तरह के झटकों का सामना करना पड़ा। पश्चिम एशिया संकट के कारण तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई, कई उद्योगों को कच्चे माल और ऊर्जा की समस्या हुई तथा होटल, रेस्तरां और दूसरे कारोबारों पर भी असर पड़ा। उनके अनुसार इन परिस्थितियों में खासकर असंगठित क्षेत्र और छोटे कारोबारों पर पड़े दबाव को आधिकारिक जीडीपी आंकड़ों में पर्याप्त रूप से पकड़ पाना मुश्किल है।

अरुण कुमार का कहना है है कि जब अर्थव्यवस्था को अचानक कोई बड़ा झटका लगता है, तो संगठित क्षेत्र के संकेतकों के आधार पर असंगठित क्षेत्र की गतिविधियों का अनुमान लगाना वास्तविक नुकसान को कम करके दिखा सकता है।

अरुण कुमार ने विशेष रूप से बेंचमार्क-इंडिकेटर-मेथोडोलॉजी पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस व्यवस्था में पिछले वित्त वर्ष के विस्तृत अनुमान को विभिन्न उपलब्ध संकेतकों के आधार पर आगे की तिमाहियों के लिए अनुमानित किया जाता है। समस्या तब पैदा हो सकती है जब अर्थव्यवस्था में अचानक कोई बड़ा बदलाव आ जाए और पिछले साल के संकेतक मौजूदा परिस्थितियों को प्रतिबिंबित न करें।

उनका कहना है कि संगठित क्षेत्र से मिलने वाले आंकड़ों को असंगठित क्षेत्र के लिए संकेतक के रूप में इस्तेमाल करने की अपनी सीमाएं हैं। नोटबंदी, जीएसटी, एनबीएफसी संकट और कोरोना महामारी जैसे उदाहरणों का हवाला देते हुए अरुण कुमार लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि आर्थिक झटकों का असर असंगठित क्षेत्र पर कहीं ज्यादा और तेजी से पड़ता है। यदि जीडीपी की गणना में इस अंतर को पर्याप्त रूप से नहीं पकड़ा जाता तो आधिकारिक आंकड़े अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति से बेहतर तस्वीर पेश कर सकते हैं।

अरुण कुमार पूछते हैं कि अगर अर्थव्यवस्था में निवेश वास्तव में इतनी तेजी से बढ़ रहा है तो क्षमता उपयोग, निजी निवेश और रोजगार के दूसरे संकेतक उतनी ही मजबूत तस्वीर क्यों नहीं दिखाते?

उनका जोर इस बात पर है कि जीडीपी  वृद्धि का मूल्यांकन केवल उत्पादन के आंकड़े से नहीं किया जाना चाहिए। यह भी देखना होगा कि इस वृद्धि से कितने रोजगार पैदा हो रहे हैं, मजदूरी कितनी बढ़ रही है और आम लोगों की आय तथा खपत में वास्तविक सुधार कितना हुआ है।

रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी सवाल उठाया है कि अगर अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है तो पर्याप्त संख्या में अच्छी गुणवत्ता वाली नौकरियां क्यों नहीं पैदा हो रही हैं और निजी निवेश में अपेक्षित तेजी क्यों नहीं दिखाई देती।

(जनचौक ब्यूरो)

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