अमेरिका में संघ का चेहरा बेनकाब!

पिछले कुछ दिनों से अमेरिका में संघ प्रमुख मोहन भागवत की यात्रा का जिस तरह विरोध हुआ वह आश्चर्य जनक है क्योंकि अमेरिका में 2014 के बाद संघ की गतिविधियां काफ़ी तेज़ हुई थीं।

हालांकि अमरीका से संघ का पुराना याराना है। इतिहास बताता है कि कांग्रेस शासन जिसकी विचारधारा सोवियत यूनियन से मेल खाती रही तथा वह भारत का अभिन्न मित्र रहा। अमेरिका ने बांग्लादेश निर्माण के दौर में जब अपना जहाजी बेड़ा भेजकर भारत को धमकाने का काम किया था तब सोवियत रुस ने अपनी घातक पनडुब्बियों से हमारी रक्षा कर मैत्रीपूर्ण संबंध को निभाया था। तब से अमेरिका ने कांग्रेस के विरुद्ध संघ को छुप-छुप कर तरह तरह के सहयोग की बुनियाद खड़ी की थी।

2014 में उसे सफलता मिली जिससे मोदी जी जैसे प्रधानमंत्री उन्हें मिला। जिसे सरेन्डर प्रधानमंत्री  कहा जाता है। वे अपने आका से पूछे बिना कोई काम नहीं करते। अमेरिका चाहता है मोदीजी जैसे आज्ञाकारी पीएम बने रहें ताकि उससे भारत पर सम्प्रभुता बनी रहे।

इतने मधुर और विश्वसनीय सम्बंधों के बीच अचानक अमेरिका में संघ की फज़ीहत आखिरकार क्यों हो रही है यह जानना महत्वपूर्ण है। विदित हो, पिछले दिनों अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने मोहन भागवत के दौरे पर चिंता जताई थी और अमेरिकी सरकार से आरएसएस सदस्यों व भारतीय अधिकारियों के खिलाफ लक्षित प्रतिबंध लगाने तथा वीजा रद्द करने की मांग की थी।

दूसरी तरफ न्यूयॉर्क के नेताओं और अमेरिकी सांसदों जैसे रशीदा तलेब और जिम मैकगोर्न ने आरएसएस की हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा पर सवाल उठाए और कहा कि ऐसा संगठन अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव और हिंसा को बढ़ावा देता है, इसलिए उनकी विचारधारा का अमेरिकी समुदायों में स्वागत नहीं है। 

न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में दिए गए अपने भाषण में भागवत ने भारतीय प्रवासियों को सलाह दी थी कि उन्हें अपनी ‘जन्मभूमि’ (भारत) से पहले अपनी ‘कर्मभूमि’ अमेरिका, जहां वे रहते और काम करते हैं के प्रति निष्ठावान होना चाहिए। इस बयान पर भारत और अमेरिका दोनों जगहों पर तीखी बहस छिड़ गई कि यह दोहरी निष्ठा और पहचान का संकट पैदा करता है।

वहीं मानवाधिकार समूहों और आलोचकों का आरोप है कि आरएसएस की बहुसंख्यकवादी विचारधारा भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति असहिष्णुता को बढ़ावा देती है, जिसके कारण उनके विदेशी दौरों और आयोजनों का विरोध किया गया।

सच्चाई यह है कि अमेरिकी अवाम अब तक संघ को एक बड़े भारतीय सांस्कृतिक संगठन के रुप में मान्यता देती रही है अब वे तमाम सद्भावनाएं संघ नीत भाजपा सरकार के कार्यकलापों में सामने आ गई हैं। क्योंकि अमेरिका देश में कई प्रजातियों ही नहीं सभी धर्म समुदायों के लोग हैं जिनमें श्वेत श्याम वर्ण में भी कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। डोनाल्ड ट्रम्प ने इसमें कटुता फैलाने का प्रयास किया तो उनकी संसद और चर्च ने उन पर सख़्त नाराज़गी जताई और खुलकर विरोध किया।ऐसे देश में संघ प्रमुख का विरोध स्वाभाविक था।

सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह रही कि न्यूयॉर्क के ऐतिहासिक रिवरसाइड चर्च की वरिष्ठ मंत्री एड्रियन थॉर्न ने कहा है कि 29 अगस्त को मोहन भागवत के साथ मंच पर जाना उनकी “भयानक गलती” थी। उनकी मौजूदगी से यह गलत संदेश गया कि वे या उनका चर्च भागवत, आरएसएस और उसकी हिंदू वर्चस्ववादी विचारधारा का समर्थन करते हैं। उन्होंने साफ कहा है कि वे ऐसा बिल्कुल नहीं करतीं।

एड्रियन को करीब छह हफ्तों में 10 ईमेल भेजे गए। उन्हें बार-बार बताया गया कि यह “एक विश्व : एक मनवाता” नाम का अंतरधार्मिक कार्यक्रम है, जिसका मकसद शांति, मानव गरिमा और धार्मिक सद्भाव है। लेकिन आयोजकों ने उनसे यह नहीं बताया कि मैडिसन स्क्वायर गार्डन के कार्यक्रम के केंद्र में मोहन भागवत होंगे। आरएसएस का नाम नहीं बताया गया।एड्रियन का कहना है कि अगर उन्हें असलियत पता होती तो वे इस कार्यक्रम में कभी शामिल नहीं होतीं।

इस तरह छलपूर्वक किए आयोजन से संघ की छवि और धूमिल हुई है। एक विश्व और मानवता की बात करने वालों की कलई खुल गई है। संघ का दोहरा चरित उजागर हुआ है किन्तु इसके साथ ही तमाम भारतीयों की अपनी संस्कृति को भी क्षति हुई है। इससे बुरा और क्या हो सकता है भारत की आन बान और शान हमारा ध्वज तिरंगा पैरों से रौंदा गया। इस अपमान के जिम्मेदार संघ प्रमुख हैं, यह कहना शायद ग़लत नहीं होगा?

(सुसंस्कृति परिहार एक्टिविस्ट और टिप्पणीकार हैं)

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