कुशमही में घटित 26 जुलाई की हिंसक घटना सामंती मानसिकता का परिणाम है : जेम्स हेरेंज 

सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज ने आरोप लगाया है कि कुशमाही गांव में 26 जुलाई को घटी घटना सामंती मानसिकता का परिणाम है। गाँव में कथित रूप से वन विभाग की शह पर वनभूमि पर पुलिस बल के सामने क्षेत्र के यादवों ने आदिम जनजाति के लोगों पर हमला किया था, जिसमें 72 वर्षीय केश्वर परहिया और 27 वर्षीय बीरेन्द्र कोरवा गम्भीर रूप से घायल हो गए थे। 

जेम्स हेरेंज के अनुसार बुजुर्ग बताते हैं कि आज के 30-32 साल पूर्व तक जमींदार लोग 1 रूपये प्रतिदिन में दिनभर अपने खेतों और घरों में गांव के कोरवा परहिया को कठिन मेहनत करवाते थे। उनकी पुश्तैनी जमीनों पर उन्हीं जातियों ने जबरन कब्ज़ा अथवा महाजनी कर्ज में जमीन दशकों तक बंधिक रख लेते थे। ग्रामीणों ने यह भी बताया कि वनोपज से इन कमजोर जातियों को आर्थिक उपार्जन न हो, इसके लिए गांव के जंगलों के महुआ वृक्षों को बड़े पैमाने पर नष्ट कर दिया गया। ये तो नक्सली आन्दोलन ने गरीबों को आवाज और न्याय देने का काम किया है। जिसके कारण यहां के लोग एक हद तक सर उठा के जीने की हिम्मत कर रहे हैं। यही बात अब यादवों को नागवार गुजर रहा है। वन विभाग के बहाने वे इस इलाके में आदिम जनजातियों के आत्म सम्मान को तहस-नहस कर भय का माहौल कायम करना चाहते हैं। 26 जुलाई की हिंसक घटना इसी विकृत मानसिकता का दुष्परिणाम है।

उल्लेखनीय है कि झारखंड के गढ़वा जिला अंतर्गत मेराल प्रखण्ड के कुशमही गांव निवासी आदिम जनजाति के अमरीका परहिया को गांव के गिरधरिया टांड़ में अगस्त 2011 को 1.86 एकड़ व्यक्तिगत वन पट्टा मिला। इसके बाद से रैयत परिवार उस जमीन पर खेती करता रहा था, जो पिछले साल 2025 तक जारी रहा था। 

इस वर्ष यादव समुदाय के दबंगों द्वारा इस जमीन पर जबरदस्ती ट्रेंच खुदाई एवं पौधारोपण हेतु पिट खुदाई कर दी गई। इस वजह से इस वर्ष खेती नहीं की गई। 

गांव में अमरीका परहिया सहित अन्य 7 रैयतों को कुल 14.16 एकड़ वन भूमि के पट्टे जिला प्रशासन द्वारा निर्गत किये गए हैं। लेकिन जिला प्रशासन द्वारा इतने वर्षों तक जमीन का सीमांकन नहीं कराया गया। वर्त्तमान में गांव के अन्य 30 रैयत हैं, जिन्होंने तमाम साक्ष्यों के साथ दावे प्रस्तुत किए हैं जो अनुमंडल में विचाराधीन हैं।

पुलिस ने इस मामले में ग्राम गोबरदाहा, टोला तिलाईदाग निवासी उदय यादव व शिवनारायण यादव, नन्दू यादव, इनर यादव पर बीएनएस की धारा 126 (2), 115 (2), 118 (2), 109 (1), 351 (3), 3 (5) के प्राथमिकी दर्ज की है। पीड़ित ग्रामीणों का आरोप है कि सभी आरोपी अन्य जाति से होने के बावजूद पुलिस ने पक्षपात रवैया अपनाते हुए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के प्रावधानों के तहत प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई।

गढ़वा समाहरणालय में दिवा रात्रि आन्दोलन की एक प्रमुख मांग यह भी थी कि प्राथमिकी में अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराओं को जोड़ा जाए। ग्रामीण जिला प्रशासन के इन आश्वासनों पर निगहबानी रखे हुए हैं कि आन्दोलन की मांगों पर जो लिखित आश्वासन दिए हैं उनपर समयबद्ध रूप में क्या कार्रवाई करती है?  

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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