नौ सौ मूसे खाइ बिलाई हज को चली…!

ये, ये ही बात एकदम गलत है। मुहावरा है तो क्या हुआ, सिर्फ हमें ही क्यों सारी दुनिया को पता है कि नौ सौ मूसे खाइ…वाले मुहावरे का प्रयोग किस के लिए किया जा रहा है। भागवत जी की अमेरिका यात्रा के लिए, और किस के लिए! लेकिन, भागवत जी को बिलाई कहना क्या सही है? माना कि भागवत जी के मूंछ है। और कुछ लोगों को उनकी मूंछ में बिल्ली की मूंछ की छवि भी दिखाई दे सकती है। पर सिर्फ मूंछ की वजह से किसी को क्या बिल्ली या बिल्ला कहा जा सकता है?

ऐसे मूंछ तो शेर की भी होती है, फिर शेर ही क्यों नहीं कहें? शेर वैसे भी हमारा राष्ट्रीय पशु भी है। और तो और मोदी जी के ‘‘मेक इन इंडिया’’ का निशान भी शेर ही तो है; यह दूसरी बात है कि ‘‘मेक इन इंडिया’’ वाला शेर बेचारा कब का थक कर बैठ गया है। वैसे भी दिल्ली में भागवत जी का प्रोटोकॉल चाहे कितना ऊपर और उनकी सुरक्षा का दर्जा चाहे कितना ही ऊंचा हो, मोदी जी के बराबर तो नहीं ही हो जाएगा।

और जब ‘‘शेर पालने’’ वाली उपमा मोदी जी के लिए सुरक्षित है, तो भागवत जी को भी शेर कहना क्या एक प्रकार से मोदी जी की टेरिटरी में अतिक्रमण ही नहीं हो जाएगा? हम कहते हैं कि मनुष्यों के  लिए पशुओं की उपमा देनी ही क्यों? बिल्ली, कुत्ता या शेर, किसी भी जानवर का नाम लेना ही क्यों? वैसे भी सिर्फ इसलिए कि भागवत जी विदेश यात्रा पर गए हैं और हमारे पास सिर्फ बिल्ली की विदेश यात्रा का मुहावरा है, भागवत जी की अमेरिका यात्रा को ‘बिलाई हज को चली’ कहना चाहिए क्या?

और जब भागवत जी की बात हो रही है, तो उसमें हज की बात कहां से आ गयी। और वह भी अमेरिका के लिए! ऐसी बात तो ‘‘दिमागी नक्सलों’’ के खुराफाती दिमाग में ही आ सकती है कि अमरीका, भागवत जी के लिए हज है। भागवत जी वहां जा रहे हैं और खुशी-खुशी जा रहे हैं, पर वह उनका हज क्यों होगा? राम मंदिर क्यों नहीं होगा? माना कि भागवत जी बीच-बीच में ऐसी बातें भी करते हैं कि भारत में रहने वाले सब हिंदू हैं–कोई मोहम्मदी हिंदू, कोई क्रिस्टी हिंदू, कोई गुरुग्रंथी हिंदू; पर सब एक हैं।

हैं, भागवत जी की नजर में सब बराबर ही हैं; मगर खुद को हिंदू मान लेने के बाद। वर्ना तो हिंदुई-हिंदुओं के अलावा बाकी सब डेमोग्राफी में असंतुलन का ही कारण हैं। घुसपैठिए हैं, घुसपैठिए, जिन्हें चुन-चुनकर बाहर निकालने में मोदी जी-शाह जी की जोड़ी लगी हुई है। कहने का अर्थ यह कि भागवत जी अगर अमेरिका जाकर धन्य महसूस करने जा रहे हैं, तो यह बिलाई के या किसी के भी हज जाने का मामला तो किसी भी तरह से नहीं हो सकता है।

चढ़ावा चोरी का शोर मचने के बाद, राम मंदिर जाने मामला कहने में संकोच हो तो चाहे और सामान्यीकरण कर के बिलाई के तीर्थ जाने की तुक तो फिर भी बैठाई जा सकती है, पर अमेरिका जाने की हज को जाने से तुक किसी भी तरह से नहीं मिलती है।

हां! ये दिमागी नक्सल तो हमेशा से ही अमरीका के खिलाफ रहे हैं। जब तक भारत में अंग्रेज़ों का राज था, तब तक ये अंग्रेज़ों के खिलाफ थे। अंग्रेज़ वापस चले गए तब से इन्हें लगता है कि अमरीकी उनकी जगह आने की कोशिश में हैं और ये अमेरिकियों के खिलाफ हो गए हैं। खुश होकर तो मोदी जी का बार-बार अमेरिका जाना भी इन्हें हजम नहीं होता है, फिर भागवत जी का जाना हजम होने का तो सवाल ही नहीं उठता है।

तभी तो अमेरिका में मैडिसन स्क्वायर गार्डन में मोदी जी ने जब हाउडी मोदी किया था, तब कम से कम इन ‘‘दिमागी नक्सलों’’ ने मजा किरकिरा करने के लिए विरोध प्रदर्शन नहीं किया था। पर अब भागवत जी आ रहे हैं, तो विरोध कर रहे हैं। ममदानी से कहलवा रहे हैं कि न्यूयॉर्क भागवत जी के आने से खुश नहीं है। और दिखा रहे हैं कि ‘‘दिमागी नक्सल’’ वहां भी हैं। मोदी जी जब भी ट्रंप से मिलने जाएंगे, तो उन्हें ‘‘दिमागी नक्सलों’’ से निपटने के गुर जरूर बताएंगे।

चुनावी नक्सलियों से निपटने के गुर तो ट्रम्प जी ने ज्ञानेश कुमार से पहले ही सीख लिए हैं, जैसा उन्होंने खुद एलान कर के सारी दुनिया को बताया था। बचे दिमागी नक्सल, उनसे निपटने के गुर मोदी जी सिखा देेंगे।

खैर! बिलाई और हज की बात की तो फिर भी कुछ तुक मानी जा सकती है। पर ये नौ सौ मूसे खाइ…का तो यहां कोई मतलब बनता ही नहीं है। कहां एक शुद्ध शाकाहारी मराठी ब्राह्मण और कहां सिर्फ मांसाहार की नहीं बल्कि मुसहरों वाले मांसाहार की बात; कोई तुक ही नहीं बनती है।

और अगर मूसे खाकर हज के लिए जाने से, भागवत जी का कुनबा जो कुछ देश में करता है आया है और भागवत जी अमेरिका, कनाडा वगैरह में जो उपदेश देने जा रहे हैं, उनमें छत्तीस का आंकड़ा होने से लिया जाए, तब भी जब मूसे खाने का ही कोई प्रमाण नहीं है, फिर नौ सौ की  गिनती पर कौन विश्वास कर सकता है? वैसे भी अगर गोरक्षकों से लेकर तरह-तरह के हिंदू धर्म के रक्षकों तक की, तरह-तरह की लिंचिंगों को जोड़ भी लिया जाए तब भी, खुद मोदी विरोधियों की गिनती में भी मरने वालों का आंकड़ा दो-तीन सौ तक भी मुश्किल से पहुंचेगा।

हां! अगर इसमें 2002 के गुजरात, 1993 की मुंबई, 1992 के अयोध्या, आदि आदि को भी जोड़ा जा रहा हो, तो बात दूसरी है। पर तब न भारत में मोदी जी का राज था और न आरएसएस में भागवत का। चूहे कोई और बिलाई खाए और गिनती भागवत के हिसाब में आए,यह तो इंसाफ की बात नहीं हुई। साफ है कि नौ सौ चूहे वाली बात बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कही जा रही है, पश्चिम वालों को डराने के लिए।  

फिर मोदी जी-शाह जी की अगुआई में भागवत का कुनबा जो कुछ कर रहा है और भागवत अमरीका वगैरह में जो उपदेश देने जा रहे हैं, उसमें वैसा विरोध भी नहीं है, जैसा चूहे खाने के बाद बिल्ली के हज में जाने मेें नजर आता है। माना कि भागवत का कुनबा अल्पसंख्यकों की लिंचिंग-विंचिंग भी करता है, मनुस्मृति को संविधान की जगह बैठाने की मांग भी कर लेता है, पर वही कुनबा उठते-बैठते धर्म-धर्म, संस्कृति-संस्कृति, परंपरा-परंपरा का जाप भी तो करता है।

वह तो गोडसे और गांधी, दोनों की एक साथ पूजा भी कर लेता है। जब वे एक साथ दोनों भारत में करते आए हैं, तो दोनों अमरीका वगैरह में भी कर ही लेंगे, प्रॉब्लम क्या है। भागवत जी मंच से सब की एकता, सब की समानता का उपदेश देंगे; विवेकानंद के शिकागो संबोधन की नकल पेश करेंगे और उनके चेले भारत में लिंचिंग-विंचिंग को और तेज करने के इंतजाम करते रहेंगे; बेचारे वहां लिंचिंग की प्रैक्टिस जो नहीं कर सकते हैं। निज्जर और पन्नू वाले मामले, अब तक गले में हड्डी बनकर अटके जो हुए हैं।  

(राजेंद्र शर्मा का व्यंग्य)   

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