साहिर लुधियानवी का मुस्तनद ज़िंदगी-नामा

उर्दू शायरी और हिन्दी फ़िल्मी नग़मों को पसंद करनेवाले ऐसे बहुत कम लोग होंगे, जो साहिर लुधियानवी के नाम और काम से वाक़िफ़ न हो। उनका उनसे तआरुफ़ न हो। साहिर की शोहरत सात समंदर पार तक है। उनकी शायरी-ग़ज़लों, नज़्मों और फ़िल्मी नग़मों का जादू सर चढ़कर बोलता है। साहिर को इस दुनिया से गुज़रे एक लम्बा अर्सा हो गया, लेकिन उनकी मक़बूलियत में कोई कमी नहीं आयी। आज भी उनकी शायरी और फ़िल्मी नग़मों पर नये-नये ज़ाविये से रिसर्च हो रही है, तो मुसलसल नई—नई किताबें भी आ रही हैं।

इस साल की शुरुआत में ही साहिर लुधियानवी पर डॉ. रतन लाल महेन्द्रगढ़ी की एक किताब ‘सरक़श फ़क़ीर साहिर लुधियानवी की जीवनयात्रा’ प्रकाशित हुई है, तो पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रिकार राजेश बादल की किताब ‘ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया’ भी इसी सिलसिले की अगली कड़ी है। बहरहाल, ‘सरक़श फ़क़ीर’ साहिर लुधियानवी की जीवनी है, जिसे डॉ. रतन लाल महेन्द्रगढ़ी ने बड़े ही दिलो-जान से लिखा है। किताब पढ़ने पर उनकी रिसर्च, जुनून और मेहनत साफ़ दिखाई देती है।

उन्होंने एक उर्दू शायर की ज़िंदगी और उनके कलाम पर पूरी प्रमाणिकता के साथ काम किया है। यह इस मायने में ‘प्रमाणिक’ जीवनी नहीं है, जो किसी किताब के कवर पेज पर टैग लाइन भर लगा देने से हासिल हो जाती है। डॉ. रतन लाल महेन्द्रगढ़ी ने इसके लिए काफ़ी जतन और जद्दोेजहद की है।

उर्दू लिपि से ना-वाक़िफ़ होने के बावजूद उन्होंने साहिर पर हिन्दी-उर्दू में जो सामग्री मौजूद है, उसका बड़े ही चतुराई से इस्तेमाल कर उनकी शानदार जीवनी बुनी है। ज़िंदगी-नामा भी ऐसा कि साहिर और उनका पूरा दौर ज़िंदा हो गया है। साहिर लुधियानवी के शैदाइयों के लिए वाक़ई यह एक हसीन तोहफ़ा है, जिसे वे अपने पास और अपनी यादों में हमेशा संजो कर रखेंगे।    

साहिर लुधियानवी पर यह कोई पहली किताब नहीं है, जो उनको केन्द्र में रखकर लिखी गई हो। इससे पहले भी ‘मैं साहिर हूँ’ (चंदर वर्मा, सलमान आबिद), ‘साहिर लुधियानवी : शख़्स और शायर’ (नाज़ सिद्दीक़ी), ‘नाकामे-मुहब्बत : साहिर लुधियानवी’ (अज़हर जावेद), ‘नये अदब के मेयार : साहिर लुधियानवी’ (कैफ़ी आज़मी), ‘पल दो पल का शायर हूँ : साहिर लुधियानवी’ (अमरनाथ वर्मा), ‘साहिर लुधियानवी : हयात और शायरी’ (डॉ. सईद जैयोर रहमान), ‘साहिर : यादों के आईने में’ (कृष्ण अदीब), ‘हर पल का शायर’ (सुरेन्द्र देओल), ‘साहिर लुधियानवी के हिन्दी गीत’ (सुनील भट्ट), ‘जाग उठे ख़्वाब कई: साहिर लुधियानवी’ (सम्पादक : मुरली मनोहर प्रसाद सिंह) आदि किताबें आई हैं।

किताबों के अलावा ‘बीसवीं सदी’ (सम्पदक : ज़िया उर्र रहमान), ‘अदबसाज़’ (सम्पादक : नुसरत ज़हीर अहमद), ‘फ़न और शख़्सियत’ (सम्पादक : साबिर दत्त), ‘नया पथ’ (सम्पादक : अर्जुमंद आरा, रविकांत), ‘उद्भावना’ (सम्पादक : जानकीप्रसाद शर्मा), ‘अमरावती’ (सम्पादक : वसीम फ़रहत अलीग) आदि मैगज़ीन के साहिर विशेषांक से भी साहिर लुधियानवी को काफ़ी कुछ जाना-समझा जा सकता है।

इतना सब कुछ होने के बावजूद कुछ तिश्नगी—सी रह जाती है, उम्मीद है कि ‘सरक़श फ़क़ीर’ इस प्यास को बुझाने में मददगार साबित होगी। इस किताब में साहिर लुधियानवी की पूरी शख़्सियत, ज़िंदगी, परिवार, दोस्त, उनकी नाकाम मुहब्बत, अदबी और फ़िल्मी कारनामे सभी कुछ तफ़सील से आता है। इसके अलावा कुछ ऐसी जानकारियाँँ, जिनसे बहुत-से पाठक अंजान होंगे।

मिसाल के तौर पर साहिर लुधियानवी को बचपन में आगा हश्र कश्मीरी के ड्रामों में दिलचस्पी थी, तो दीगर होनहार शायरों की तरह वे भी कम उम्र में ही शायरी करने लगे थे। इब्तिदा में उनका कलाम एएच साहिर के नाम से अख़बारों और मैगज़ीन में छपता था। उनकी इब्तिदाई नज़्मों में जहाँ मज़दूरों और किसानों के दुख-दर्द और संघर्ष झलकता था, तो वहीं आज़ादी की जद्दोजहद भी दिखाई देती है।  

इसी दौर की साहिर लुधियानवी की एक नज़्म ‘मुझे सोचने दे’ है। जिसमें उनका अंदाज़-ए-बयान है-‘लहलहाते हुए खेतों पर जवानी का समां/और दहकान के छप्पर में बत्ती न धुआँ/ये सभी क्यों है, यह क्या है, मुझे सोचने दे/कौन इंसान का ख़ुदा है मुुझे सोचने दे।’ वहीं ‘गुरेज़’ नज़्म में वे लिखते हैं-‘वो फिर बिकी किसी मज़दूर की जवां बेटी/वो फिर झुका किसी दर पर ग़ुरूर-ए-बरनाई/वो फिर किसानों के मजमे पे मशीनगनों से/हुक़ूक़-याफ़ता तबके़ ने आग बरसाई।’

साहिर लुधियानवी की नौजवानी का यह वह दौर था, जब सारे मुल्क में आज़ादी के हक़ में आंदोलन चल रहा था। चारों ओर की फ़िज़ा इंक़लाबी नारों से गूँज रही थी, मज़दूर-कामगारों की हड़तालें और किसानों के आंदोलन चल रहे थे। ऐसे हंगामाखे़ज़ माहौल में साहिर कब ख़ामोश बैठ जाने वाले थे।

मज़दूरों और किसानों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने लिखा-‘आज से ऐ मज़दूर, किसानों मेरे गीत तुम्हारे हैं/फ़ाक़ाकश इंसानो मेरे जोग बिहाग तुम्हारे हैं/जब तक तुम भूखे नंगे हो ये नग़मे ख़ामोश न होंगे/मुझको इसका रंज नहीं है लोग मुझे फ़नकार न मानें।’ अपनी नज़्मों, ग़ज़लों में ही नहीं साहिर लुधियानवी के नग़मों में भी उनकी तरक़्क़ीपसंद सोच ज़ाहिर होती थी। साहिर के एक नहीं कई ऐसे गीत हैं, जिनमें उनके तरक़्क़ीपसंद ख़यालात की अक्कासी होती है।

‘कहीं भाषा का का है झगड़ा तो कहीं प्रांत का है/कहीं नस्लों का फ़साद तो कहीं जात का है/तेरे शहर में मोहब्बत का पता क्या ढूँढें/आदमी तक नहीं मिलता है/ख़ुदा क्या ढूँढें तेरे शहर में।’ वहीं वे एक दूसरे गीत में लिखते हैं, ‘तूने जो ढंग निकाले हैं वे बेढंगे हैं/कपड़ा बुनती हैं मिलें फिर भी बदन नंगे हैं/गल्ला छुप जाता है धनवानों के तहखाने में/भूखे फुटपाथों पे सोते हैं तेरे शहरों में।’

किताब में इसके अलावा कई ऐसी नज़्में हैं, जो उनके किसी संग्रह में शामिल नहीं हैं। मसलन ‘महफ़िल-ए-रक्स-ओ-सरोद’, ‘मरघट की सरज़मीन’, ‘लम्हा-ए-ग़नीमत’, ‘शहज़ादे’, ‘आख़िरी बुराई’ आदि। 

साहिर लुधियानवी ‘अदब-ए-लतीफ़’, ‘सवेरा’ और ‘शाहराह’ के सम्पादक भी रहे। लेखक ने किताब में कई जगह साहिर के सम्पादकीय के महत्वपूर्ण उद्धरण दिए हैं, जिनसे उनकी विचारधारा और सोच पता चलती है। किताब में हैदराबाद में आयोजित उर्दू कॉन्फ्रेंस, अहमदाबाद, बनारस, मालेगाँव, लखनऊ, इलाहाबाद, हैदराबाद, लुधियाना, जालंधर आदि कॉन्फ्रेंसों और मुशायरों की गतिविधियों का भी तफ़सील से ज़िक्र किया गया है।

हैदराबाद उर्दू कॉन्फ्रेंस में साहिर लुधियानवी ने अपना जो पर्चा पढ़ा, वह भी किताब में मौजूद है। उर्दू अदब की अपने दौर की बड़ी हस्तियों मजाज़, कैफ़ी आज़मी, कृश्न चंदर, ख़्वाजा अहमद अब्बास से साहिर लुधियानवी के किस तरह के सम्बन्ध थे, यह भी किताब से पता चलता है। किताब में कई ऐसे दिलचस्प क़िस्से दर्ज हैं, जिनमें यह सब हस्तियाँ अपने पूरे आब-ओ-ताब के साथ आती हैं।

‘सवेरा’ के एक अंक में जब साहिर अपने कॉलम ‘जान-पहचान’ में मजाज़ की शराबनोशी का ज़िक्र करते हैं, तो मजाज़ उन्हें एक ग़ुस्से भरा ख़त लिखते हैं। साहिर वह ख़त ज्यों का त्यों ‘सवेरा’ के ही अंक में प्रकाशित कर देते हैं। किताब में यह ख़त पूरा दिया गया है। यही नहीं साहिर का इलाहाबाद से क्या रिश्ता था, यह भी किताब से पता चलता है। 

किताब की इब्तिदा साहिर के वालिद चौधरी फ़ज़ल मोहम्मद के तआरुफ़ से होती है, उसके बाद साहिर का संघर्षमय बचपन, उनकी शुरुआती तालीम, गवर्नमेंट कॉलेज लुधियाना में आला तालीम के दौरान गुज़ारे उनके दिन, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन व किसान और मज़दूर आंदोलन में उनकी सक्रियता के बारे में बताया गया है।

आगे लाहौर के दयाल सिंह कॉलेज में साहिर का दाख़िला, लाहौर का अदबी माहौल, साहिर का अदब की ओर झुकाव और फिर शायरी का आग़ाज़, शायर के तौर पर उनकी बनती पहचान, उनकी पहली किताब ‘तल्खि़याँ’ का प्रकाशन, अदबी मैगज़ीन ‘अदब-ए-लतीफ़’ का सम्पादन, अमृता प्रीतम से उनकी मुलाक़ात और मुहब्बत, आज़ादी से पहले मुम्बई में साहिर के गुज़ारे हुए कुछ दिन, ख़दीजा मस्तूर से उनकी सगाई का टूटना, मुल्क का बँटवारा, फ़िरक़ावाराना दंगों के बाद बम्बई से उनका लाहौर जाना, अदबी मैगज़ीन ‘सवेरा’ का सम्पादन, लाहौर से वापस हिन्दुस्तान लौटना शामिल है।

फिर, दिल्ली में गुज़ारे उनके कुछ दिन, अदबी मैगज़ीन ‘शाहराह’ का सम्पादन, दिल्ली से बम्बई जाना, फ़िल्मी दुनिया में स्थापित होने के लिए उनका संघर्ष, मुल्क भर में मुशायरों में शिरकत, गीतकार के तौर पर उनकी कामयाबी का सफ़र, सुपरहिट गीतों की लेखन प्रक्रिया, गीतकार के तौर पर उनकी बढ़ती शोहरत, फ़िल्म निर्माता और संगीतकारों से उनके सम्बन्ध, अपनी माँ सरदार बेगम और ममेरी बहनों सरवर शफ़ी और अनवर सुल्ताना से उनका जज़्बाती लगाव, अहमद राही, हमीद अख़्तर, कृष्ण अदीब, इब्राहिम जलीस, प्रकाश पंडित, जांनिसार अख़्तर, भारत भूषण, बीआर चोपड़ा, रामकृष्ण अश्क, देवेन्द्र सत्यार्थी, अमरनाथ वर्मा, साबिर दत्त, क़तील शिफ़ाई, अजायब चित्रकार आदि दोस्तों से साहिर लुधियानवी की दोस्ती और उनकी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों का इस दिलचस्प ढंग से वर्णन है कि एक फ़िल्म-सी आँखों के सामने दौड़ती नज़र आती है।

पाठक किताब के अंत तक उससे बंधे रहते हैं। यही एक अच्छी जीवनी की पहचान भी होती है।  

लेखक डॉ. रतन लाल महेन्द्रगढ़ी ने साहिर से जुड़ी सभी बातों का बड़े ही प्रमाणिक स्त्रोतों से ब्यौरा दिया है। जो लोग उर्दू अदब से वाक़िफ़ हैं और जिन्होंने हमीद अख़्तर की किताब ‘आशनाइयाँ क्या-क्या’, क़तील शिफ़ाई-‘घुँघरू टूट गए’, गोपाल मित्तल-‘लाहौर का जो ज़िक्र किया’, इब्राहिम जलीस-‘दो मुल्क एक कहानी’, अमृता प्रीतम-‘रसीदी टिकट’, शोरिश कश्मीरी-‘चेहरे’, सत्यपाल आनंद-‘कथा चार जन्मों की’, कृष्ण अदीब-‘साहिर: यादों के आईने में’, शौकत कैफ़ी-यादों की रहगुज़र’ यह सब किताबें पढ़ी हैं, वे समझ जाएंगे कि किताब में वर्णित हिस्से कहाँ-कहाँ से उठाए गए हैं।

ख़ास तौर पर किताब में लाहौर की जो मंज़र-कशी है, वह गोपाल मित्तल की किताब ‘लाहौर का जो ज़िक्र किया’ से हू-ब-हू ली गई है। अलबत्ता सभी जगह इन किताबों का हवाला भी दिया गया है। लेकिन लेखक अगर और रचनात्मकता व कल्पनाशीलता का सहारा लेता, तो किताब और भी बेहतर शक्ल इख़्तियार करती। अच्छी बात यह है कि किताब में साहिर की मशहूर ग़ज़लें-नज़्में और नग़मों का ज़िक्र होने के साथ-साथ वे पूरे के पूरे दिए गए हैं।

साहिर के कलाम और उनके नग़मों को पसंद करनेवाले पाठकों के लिए एक ही किताब में यह अच्छा पैकेज है। साहिर का ज़िंदगी-नामा के साथ-साथ उनकी मक़बूल ग़ज़लें-नज़्में और नग़मों का कलेक्शन उन्हें ख़ूब पसंद आएगा। यही नहीं इस किताब के सहारे वे साहिर पर केन्द्रित दीगर किताबों और मैगज़ीन के ख़ास शुमारों तक पहुँच सकते हैं। एक लिहाज़ से देखें, तो किताब ‘सरक़श फ़क़ीर साहिर लुधियानवी की जीवनयात्रा’ साहिर पर संदर्भ ग्रंथ है, जो शोधार्थियों के बेहद काम की है। 

किताब में साहिर लुधियानवी के साथ-साथ अमृता प्रीतम, देवेन्द्र सत्यार्थी, हमीद अख़्तर, प्रकाश पंडित, अनवर सुल्ताना, निगार सुल्ताना का ज़िक्र भी तफ़सील से आता है। आज सियासत ने जिस तरह से मुल्क के दो बड़े समुदाय हिन्दू-मुस्लिम के बीच अलगाव और अविश्वास की खाई बढ़ा दी है, उसमें यह बात जानकर हैरानी और दिल को सुकून मिलता है कि 1947 बँटवारे के दौरान इंसानियत और भाईचारा बिल्कुल ख़त्म नहीं हो गया था। कुछ लोग थे, जो ऐसे माहौल में भी इंसानियत की बड़ी मिसाल पेश कर रहे थे।

किताब में ज़िक्र है कि साम्प्रदायिक दंगों के दौरान जहाँ साहिर लुधियानवी की माँ और नानी को उनके दोस्त पेंटर बावरी ने बचाया, तो वहीं साहिर की हिफ़ाज़त के लिए देवेन्द्र सत्यार्थी, रामप्रकाश अश्क और एक जगह अभिनेत्री अचला सचदेव आगे आईं। यही नहीं जब साहिर की माँ और नानी लाहौर में दंगों के बीच फंस गईं, तो प्रकाश पंडित उन्हें लाहौर से दिल्ली लेकर आए। साहिर भी अपने दोस्तों का यह एहसान कभी नहीं भूले और जब भी दोस्तों पर कभी कोई मुसीबत आई, तो आगे बढ़कर उनकी मदद की।

किताब में इस बात का भी ज़िक्र है कि जब रामप्रकाश अश्क और प्रकाश पंडित गंभीर बीमारी से ग्रसित हुए, तो साहिर ने उनका इलाज कराया। किताब में एक बात और दिल को छू जाती है, बम्बई में शोहरत की बुलंदियों पर पहुँच जाने के बाद भी साहिर लुधियानवी अपने शहर लुधियाना और पुराने दोस्तों को नहीं भूले थे। लुधियाना से उनकी मुहब्बत आख़िर तक बनी रही। यहाँ तक कि उन्हें जग्गा भिखारी भी याद रहा।  

यह तो थीं किताब ‘सरक़श फ़क़ीर साहिर लुधियानवी की जीवनयात्रा’ की तमामतर ख़ूबियाँ, लेकिन अब अगर इसकी ख़ामियाँ और कमियों की बात करें, तो पूरी किताब की भाषा में एकरूपता नहीं है। कहीं अरबी-फ़ारसीयुक्त हिन्दी का इस्तेमाल है, तो कहीं संस्कृतनिष्ट हिन्दी का प्रयोग है, जो कि बेहद चुभता है। मिसाल के तौर पर ‘एक बार साहिर ने कैफ़ी आज़मी के काव्य पर एक समीक्षा पढ़ी….काव्य के मानदंडों पर कवि सिद्ध नहीं होते।’ (पेज-108)।

इसके अलावा मामा के बजाय मामू, बुआ की जगह फूफ़ी और अवयस्क की जगह नाबालिग, मार्गदर्शन-रहनुमाई जैसे लफ़्ज़ आ जाते, तो किताब की भाषा में और प्रवाह आ जाता। यही नहीं कहीं-कहीं वाक्य भी ठीक से नहीं बन पाए हैं। इसकी बड़ी वजह उर्दू ज़बान पर लेखक की दस्तरस न होना है। मसलन ‘….नुमायाँ किया जाने लगा।’ (पेज-108), ‘जो भी व्यक्ति नमाज़ कर रहा हो, उसे साफ़ चादर दे दी जाए।’ (पेज-258)।

कई जगह कुछ लफ़्ज़ वर्तनी के स्तर पर ग़लत लिखे गए हैं। मसलन लज़्ज़त-लिज्जत, मुफ़लिसी-मफ़लिसी, मुअज़्ज़ज-मौजिज़, तस्दीक़-तस्कीद, मुम्ताज मुफ़्ती-मुम्ताज़ मुफ्ति, जज़्बात-जज़्बातों, ईशर-ईश्वर, बोरीबंदर-पोरीबंदर, मूरत-मूर्त, बालकेश्वर रोड-बलकेश्वर रोड, आशनाई क्या क्या-आशना क्या क्या, मालेगाँव-मालीगाँव, लाला रुख़-लाल रुख़ वगैरह। एक जगह अहमद नदीम क़ासमी के बजाए नदीम अहमद क़ासमी (पेज-81) लिखा है, तो एक जगह बम्बई के मदनपुरा इलाके़ की जगह का नाम ‘मुताला घर’ लिखा है, जो असल में ‘अवामी इदारा’ है। इसके अलावा नुक़्ते भी सभी जगह मौजूद नहीं हैं।

किताब में एक बात और अख़रती है-जहाँ शरद दत्त, कश्मीरी लाल जाकिर, अली अहमद फ़ातमी का ज़िक्र आया है, वहाँ भी उनके नाम के साथ सम्मानजनक सहायक क्रिया का इस्तेमाल होना चाहिए था। उनके नाम के साथ ‘….आया था।’, ‘….गया था।’, ‘…मिला था।’ चुभता है। लेखक ने जीवनी का अंत ज़ोहरा जमाल की नज़्म से किया है, लेकिन नज़्म के साथ ज़ोहरा जमाल के बारे में जिन बातों का ज़िक्र है, वह सब गै़र-ज़रूरी था।

किताब साहिर लुधियानवी पर है, तो ज़ाहिर है कि उन्हें ही केन्द्र में होना चाहिए। कुल मिलाकर किताब का अंत और भी बेहतर हो सकता था। उम्मीद है कि किताब में जो ख़ामियाँ और ग़लतियों की ओर इशारा किया गया है, उन्हें अगले एडिशन में दुरुस्त कर लिया जाएगा। 

किताब का आखि़री अध्याय ‘श्रद्धांजलि’ है, जिसमें साहिर लुधियानवी के दोस्तों ने उन्हें अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी है। लेकिन इसमें साहिर के दौर के कई बड़े नाम शामिल नहीं हैं। लेखक अगर कोशिश करता, तो उनके विचार भी कहीं न कहीं मिल ही जाते। इसके लिए उन्हें उस दौर के अख़बार और मैगज़ीन खंगालने पड़ते। ज़ाहिर है कि यहाँ लेखक ने कोताही बरती है। किताब के अंत में कठिन अरबी-फ़ारसी शब्दों के अर्थ के अलावा उन संदर्भ का भी पूरा ब्यौरा है, जहाँ से जीवनी लेखन में मदद ली गई है।

संदर्भ ग्रंथ सूची के अंतर्गत उन हिन्दी-उर्दू-अंग्रेज़ी किताबों, मैगज़ीन, अख़बारों के नाम हैं, जिनसे किताब के लिए सामग्री जुटाई गई है। साहिर लुधियानवी ने जिन फ़िल्मों को अपने नग़मों से सजाया, किताब में उसकी पूरी लिस्ट भी है। ‘न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन’ से प्रकाशित इस किताब का कवर पेज, काग़ज़ से लेकर छपाई भी दिलकश और दिल-आवेज़ है।

बहरहाल, हर दिल अज़ीज़ साहिर लुधियानवी को बतौर एक इंसान, शायर, एडिटर और नग़मा-निगार अच्छी तरह से जानने-समझने के लिए ‘सरक़श फ़क़ीर साहिर लुधियानवी की जीवनयात्रा’ एक अहम किताब है, और इसे ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। डॉ. रतन लाल महेन्द्रगढ़ी ने इसे लिखकर वाक़ई एक बड़ा काम किया है।  

किताब : सरक़श फ़क़ीर साहिर लुधियानवी की जीवनयात्रा (जीवनी)

लेखक: डॉ. रतन लाल महेंद्रगढ़ी

प्रकाशक: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली

मूल्य: 699 रुपए

पेज: 400

(समीक्षक ज़ाहिद ख़ान प्रगतिशील साहित्य और गंभीर सिनेमा पर लेखन करते रहते हैं।)

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