सुधीर विद्यार्थी देश के उन गिनती के लेखक-साहित्यकारों में शामिल हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों के योगदान को देशवासियों के सामने लाने के महत्वपूर्ण काम में समर्पित कर दिया है। उन्होंने एक मिशन के तहत यह काम किया है। सुधीर विद्यार्थी के काम की अगर फेहरिस्त देखें, तो यह काफ़ी लंबी है।
उनकी कुछ अहम किताबें हैं-‘अशफ़ाक़ उल्ला और उनका युग’, ‘भगतसिंह की सुनें’, ‘अग्निपुंज’, ‘क्रांतिकारी आंदोलन: एक पुनर्पाठ’, ‘काला पानी का ऐतिहासिक दस्तावेज़’, ‘क्रांति की विरासत’, ‘शहादतनामा’, ‘रामप्रसाद बिस्मिल’, ‘बटुकेश्वर दत्त : एक ज़िंदगीनामा’ और ‘बिदाय दे मा’। उन्होंने चार दर्जन से ज़्यादा किताबें और पुस्तिकाओं का लेखन किया है।
शहरों पर लिखे उनके कुछ रिपोर्ताज, संस्मरण, डायरी आदि को छोड़ दें, तो सारी किताबें क्रांतिकारियों की ज़िंदगी और उनके आज़ादी में योगदान को प्रमाणिकता के साथ रेखांकित करती हैं। इनके ज़रिए हम क्रांतिकारी आंदोलन को समझ सकते हैं। कहने को यह किताबें ऐतिहासिक लेखन के अनुशासन में नहीं लिखी गई हैं, न ही इनमें ढेर सारे संदर्भों का हवाला है, बावजूद इसके इनकी प्रमाणिकता से कोई इंकार नहीं कर सकता।
सुधीर विद्यार्थी जो भी किताब लिखते हैं, उस सब्जेक्ट या शख़्सियत पर जुनून की हद तक शोध करते हैं। उन स्थानों का दौरा, दस्तावेज़ों की खोजबीन और संबंधित व्यक्तियों से मिलते हैं, तब जा कर कोई किताब आकार लेती है। चूंकि वे एक साहित्यकार भी हैं, तो उनकी किताबों में साहित्यिक भाषा और मानवीय संवेदनाओं का गहन चित्रण होता है। यही वजह है कि सुधीर विद्यार्थी की किताबें अलग से पहचानी जाती हैं। किताबों के कई संस्करण और भारतीय भाषाओं में अनुवाद उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है।
एनसीईआरटी की शैक्षणिक किताबों में भी उनके कुछ लेख पाठ्यक्रम में शामिल हैं। सुधीर विद्यार्थी सिर्फ़ साहित्यकार ही नहीं सोशल एक्टिविस्ट भी हैं। क्रांतिकारियों की स्मृतियों को सहेजने के लिए वे स्मारकों के निर्माण और उनके नाम पर जगहों के नामकरण करने के आंदोलन में भी शामिल रहे हैं। और इस काम में उन्हें कामयाबी भी मिली है।
पुस्तिका ‘विप्लव राग’ क्रांतिकारी आंदोलन के कुशल प्रवक्ता सुधीर विद्यार्थी के संग एक लंबा संवाद है। और उनके साथ यह संवाद बिपिन तिवारी, अभिषेक गुप्ता और रोहताश ने किया है। ‘बनास जन’ ने यह पुस्तिका प्रकाशित की है। ‘बनास जन’ के सम्पादक पल्लव अपनी साहित्यिक पत्रिका के सामान्य और विशिष्ट अंकों के साथ इस तरह की छोटी-छोटी पुस्तिकाएं लगातार निकालते रहते हैं। यह पुस्तिकाएं पाठकों के बीच ख़ूब लोकप्रिय भी रही हैं। लोकप्रियता की वजह, कम दाम में विशिष्ट सामग्री।
‘विप्लव राग’, ‘बनास जन’ के इसी सिलसिले की अगली कड़ी है। हिन्दी साहित्य में साक्षात्कार विधा को कभी इतनी अहमियत नहीं मिली, जितनी कि वह इसकी हक़दार है। पत्र-पत्रिकाओं में साक्षात्कार बराए-नाम ही होते हैं। ऐसे निराशाजनक माहौल में बिपिन तिवारी की तारीफ़ की जाना चाहिए कि वे लगातार साक्षात्कार के ज़रिए हिन्दी साहित्य जगत को समृद्ध करने का महती काम कर रहे हैं। वे अभी तक सत्तर से ज़्यादा साहित्यकारों का साक्षात्कार ले चुके हैं।
और यह साक्षात्कार उनके यूट्यूब चैनल ‘किताबी दुनिया’ पर भी देखे-सुने जा सकते हैं। बहरहाल, इस साक्षात्कार में न सिर्फ़ सुधीर विद्यार्थी की लेखन प्रक्रिया, परिवार और जीवन संघर्ष सामने आया है, बल्कि जनपदीय इतिहास से लेकर क्रांतिकारी आंदोलन के लेखन पर उनका नज़रिया भी परिलक्षित हुआ है। उन्होंने बड़े ही ईमानदारी और बेबाकी के साथ तमाम सवालों का जवाब दिया है।साक्षात्कारकर्ताओं ने अपने सवालों से काफ़ी कुछ समेटने का प्रयास किया है।
इस साक्षात्कार के ज़रिए पाठक जाने-माने क्रांतिकारी भगतसिंह, अशफ़ाक़ उल्ला, रामप्रसाद बिस्मिल, पंडित सुंदरलाल, पंडित परमानंद, विशम्भर नाथ पांडे, यतीन्द्रनाथ दास, बटुकेश्वर दत्त, चन्द्रसिंह गढ़वाली, जयदेव कपूर के बारे में तो नई-नई जानकारियाँ पाते हैं, बल्कि साक्षात्कार में क्रांतिकारी आंदोलन के उन गुमनाम क्रांतिकारी साथियों रामकृष्ण खत्री, डॉ. गयाप्रसाद, भारत वीर मुकुंदी लाल, सुनीति चौधरी, शांति घोष, बीना दास, राजकुमार सिन्हा, विजय कुमार सिन्हा, दामोदर स्वरूप सेठ, भवानी सिंह रावत आदि का भी ज़िक्र आता है, जिन पर बहुत कम बात होती है। जिनके क्रांतिकारी कारनामों से नई पीढ़ी बिल्कुल भी वाक़िफ़ नहीं।
सुधीर विद्यार्थी अपने इस साक्षात्कार में साहित्यकार, पत्रकार और यशस्वी सम्पादक राधामोहन गोकुल, गणेशशंकर विद्यार्थी, शांतिनारायण भटनागर, रामरख सिंह सहगल, अमीर चंद बम्बवाल, मन्मथनाथ गुप्त, बनारसीदास चतुर्वेदी का भी स्मरण करते हैं, जिन्होंने अपने साहित्य और पत्रकारिता से देश में जन जागरण का काम किया। देशवासियों में राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति की भावना फैलाई। इस साक्षात्कार में सुधीर विद्यार्थी ने क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े कई वैचारिक सवालों का भी विस्तार से जवाब दिया है।
मसलन आज़ाद भारत की राजनीति में क्रांतिकारियों की सीमित हिस्सेदारी के पीछे कौन ज़िम्मेदार है? भगतसिंह की छवि को जो बार-बार बदलने की कोशिश होती है, उसके पीछे कौन-सी राजनीति काम करती है? क्रांतिकारियों की विरासत बौद्धिक सम्पदा पर वंशानुगत अधिकार कितना उचित है? अकादमिक क्षेत्र में क्रांतिकारी आंदोलन पर शोध और विमर्श की दयनीय स्थिति क्यों है?
सुधीर विद्यार्थी देश में क्रांति की संभावना, विरोध की चेतना तथा लोकतांत्रिक मूल्यों का क्या भविष्य देखते हैं? इस सवाल का जवाब भी उन्होंने बड़े ही तर्कसंगत ढंग से दिया है-‘‘क्रांति की संभावना के लिए उद्यम जरूरी है। हमारे चारों तरफ़ प्रतिरोध की चेतना का ह्रास हुआ है। राजनीति पूरी तरह सत्तामुखी हो चुकी है। साहित्यकारों ने भी अपनी सीमाएँ तय कर ली हैं। मध्य वर्ग ने अनेक क्रांतिकारी नायकों को पैदा किया है, लेकिन इन दिनों इस वर्ग ने बड़े सपने देखना बंद कर दिया है।
उनके सपने नितान्त ओछे और आत्मकेन्द्रित हो चले हैं। बाजार और पूँजी के प्रवाह ने पूरे मार्ग को अवरुद्ध कर दिया है। एक कैरियरवादी पीढ़ी से हम सामाजिक परिवर्तन की उम्मीद नहीं कर सकते। तब्दीली के लिए बलिदान देना पड़ता है। देश और दुनिया के बड़े सपने देखने और उन्हें हल करने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए सामाजिक क्रांति का ताना-बाना बुने जाने की ज़रूरत है। निश्चय ही हमारी यह कार्रवाई क्रांतिकारी संग्राम के उसूलों और सिद्धान्तों से प्रेरित होगी।
यह रास्ता वही होगा जिसे हमारे विप्लवी अपने समय में तय कर गए थे। समय और परिस्थितियों के अनुसार हमें उसका खाका बनाना होगा। रास्ता यहीं से निकलेगा।”
‘बनास जन’ की पुस्तिकाओं का अभी तक जिस तरह का स्वरूप और प्रस्तुतिकरण रहा है, ‘विप्लव राग’ भी ठीक उसी तरह प्रकाशित हुई है। पुस्तिका का कवर पेज आकर्षक है, जो सुधीर विद्यार्थी की किताबों का कोलाज है। काग़ज़ और छपाई भी हमेशा की तरह बढ़िया है। लेकिन कुछ बातों की और अगर ध्यान दिया जाता, तो पुस्तिका की पेशकश और भी बेहतर नज़र आती। मसलन सुधीर विद्यार्थी से संवाद करने वालों के नाम कवर पेज पर देने के अलावा सुधीर विद्यार्थी के परिचय के साथ उनका एक फोटो भी ज़रूरी था।
यही नहीं पुस्तिका में जो सवाल हैं, उनको इटैलिक की बजाए अगर बोल्ड कर दिया जाता, तो यह और भी ज़्यादा रेखांकित होते। अलग नज़र आते। पुस्तिका में फॉन्ट साइज काफ़ी छोटा है, जिसकी वजह से कुछ पाठकों को पढ़ने में परेशानी भी पेश आ सकती है। बावजूद इसके पुस्तिका ‘विप्लव राग’ पाठकों तक अपने मक़सद और पैग़ाम को पहुँचाने में पूरी तरह कामयाब रही है।
साक्षात्कारकर्ताओं बिपिन तिवारी, अभिषेक गुप्ता और रोहताश ने सुधीर विद्यार्थी के संग साक्षात्कार कर उस गौरवशाली क्रांतिकारी विरासत को एक बार फिर सामने लाने का अहम काम किया है, जिसे हमारी नई पीढ़ी बिसराती जा रही है। और सच बात तो यह है कि इसे सामने लाना हमारी साझा ज़िम्मेदारी है।
पुस्तक : ‘विप्लव राग सुधीर विद्यार्थी से संवाद’, संवाद: बिपिन तिवारी, अभिषेक गुप्ता और रोहताश
प्रकाशक: बनास जन
मूल्य: 50 रुपए
पेज: 72
समीक्षा : ज़ाहिद ख़ान