78 में आयी आनंद पटवर्धन की बहुचर्चित दस्तावेजी फिल्म ‘ज़मीर के बंदी’ [Prisoners of Conscience] में आपातकाल के दौरान 1 दिसम्बर, 1975 को फांसी पर चढ़ाये गए क्रांतिकारी भूमैया और किस्ता गौर का भी जिक्र है।
मोंताज तकनीक के माध्यम से जहाँ एक दृश्य दोनों की फांसी [ग्राफिक्स के जरिये] का है तो कट के तुरंत बाद दूसरा दृश्य राजपथ पर 26 जनवरी की भव्य परेड का है। पृष्ठभूमि में राष्ट्र गान बज रहा है- ‘सारे जहाँ से अच्छा…….’ इस 20 सेकंड के पावरफुल मोंताज से आनंद पटवर्धन साफ़ सन्देश देते हैं कि हमारे गणतंत्र की परेड भूमैया और किस्ता गौर जैसे कितने आदिवासियों, दलितों, क्रांतिकारियों के सीने को कुचलते हुए आगे बढ़ती है।
जिस वक़्त भूमैया और किस्ता गौर को फांसी पर चढ़ाने के लिए मुशीराबाद जेल [सिकंदराबाद] में रखा गया था, उसी समय उसी जेल में क्रांतिकारी कवि वरवर राव भी ‘सिकंदराबाद षड्यंत्र केस’ के तहत विरसम के अन्य कॉमरेडों के साथ बंद थे। जब उन्हें यह पता चला कि इसी जेल में रसोई के उस तरफ के फाँसीघर में भूमैया और किस्ता गौर अपनी मौत का इंतजार कर रहे हैं तो वे उनसे मिलने को विकल हो उठे। उन्होंने जेलर से अनुरोध किया और जेलर ने थोड़ी देर के लिए उन्हें भूमैया और किस्ता गौर से मिलवा दिया।
भूमैया और किस्ता गौर से इस मुलाक़ात और ‘आज़ाद’ भारत की इस पहली राजनीतिक फांसी के बहाने सत्ता के चरित्र और तत्कालीन क्रांतिकारी-लोकतान्त्रिक आन्दोलन पर वरवर राव ने अपनी कलम चलाई जो कविता, डायरी, संस्मरण और लेख के रूप में मौजूद है। वरवर राव के इस शानदार लेखन में न सिर्फ उस समय का आलोड़ित समय सांस लेता है, बल्कि किस्ता गौर और भूमैया भी सहसा जिंदा हो उठते है। इन्हें पढ़ते हुए शब्द दर शब्द उनकी गर्म सांसें पाठक को लगातार यह अहसास दिलाती हैं कि भूमैया और किस्ता गौर जैसे क्रांतिकारी मरते नहीं बल्कि हमारे बीच हर बार और ज्यादा ताकत के साथ लौट आते हैं। वरवर राव ने श्री श्री की एक कविता को उद्धृत करते हुए इसे यूं कहा है-
‘’मां, मैं तुम्हारे गर्भ में दुबारा जन्म लूँगा
मेरे गले में पड़े फांसी के नीले निशान से तुम मुझे पहचान लेना।’’
तेलंगाना स्थित क्रांतिकारी प्रकाशन जनसाहिती [Janasahiti] ने इसी साल जुलाई में वरवर राव की इस लेखनी को Let Us Abolish This Executioner’s System नाम से एक किताब के रूप में छापा है। महज एक तथ्य से आप जनसाहिती प्रकाशन के बारे में अंदाजा लगा सकते हैं कि यहाँ से छपने वाली लगभग सभी किताबों की भूमिका वरवर राव ने लिखी है।
जैसा कि किताब के नाम से स्पष्ट है कि वरवर राव ने भूमैया और किस्ता गौर की फांसी के बहाने फांसी देने की बर्बर व्यवस्था पर ही सवाल खड़े किये हैं और प्रस्तावित किया है कि जिस दिन भूमैया और किस्ता गौर को फांसी हुई थी, उस दिन यानि 1 दिसम्बर को मृत्यु दंड की इस बर्बर व्यवस्था को खत्म करने लिए संघर्ष के दिन के रूप में मनाया जाए।
कुल 193 देशों में से सिर्फ 53 देशों ने ही मृत्यु-दंड की इस क्रूर व्यवस्था को कायम कर रखा है। इसमें अमेरिका को छोड़कर ज्यादातर देश तीसरी दुनिया के गरीब देश हैं।
हमे धनंजय चैटर्जी का केस याद रखना चाहिए जिसे एक बलात्कार और हत्या के आरोप में उसके 39 वें जन्मदिन पर ही 14 अगस्त, 2004 को फांसी पर चढ़ा दिया गया था। बाद में विख्यात Indian Statistical Institute के तीन प्रोफेसरों देबाशीष सेन गुप्ता, प्रोबल चौधरी और पारामेष गोस्वामी ने काफी छानबीन और शोध करके एक किताब लिखी- Court-Media-Society and The Hanging of Dhananjoy और साबित किया कि धनंजय निर्दोष था। लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था। धनंजय को तो फांसी हो चुकी थी।
खैर, भूमैया और किस्ता गौर पर वापस लौटते हैं। गोदावरी नदी के दोनों किनारों पर बसने वाले भूमैया और किस्ता गौर तेलंगाना की उस पीढ़ी के गिने चुने लोगों में से थे, जिन्होंने चारू मजूमदार के नेतृत्व में नक्सलबाड़ी आन्दोलन के साथ ही गौरवशाली तेलंगाना आन्दोलन [1946-51] में भी भाग लिया था और दमन झेला था। वरवर राव बताते हैं कि तेलंगाना आन्दोलन के दौरान किस्ता गौर की जांघ में लगी गोली वहीं फंसी रह गयी थी।
नक्सलबाड़ी आन्दोलन के दौरान भूमैया और किस्ता गौर पर क्रमशः एक जमींदार और एक पुलिस पटेल को मारने का आरोप था। चूँकि दोनों ही घटनाएँ जन कार्यवाही [mass action] का हिस्सा थीं, इसलिए भूमैया और किस्ता गौर के खिलाफ कोई व्यक्तिगत सबूत नहीं था। यहीं पर वरवर राव एक दिलचस्प जानकारी देते हुए बताते हैं कि संबंधित क्षेत्र के जमींदारों ने मिलकर उस वक़्त सेशन जज को 30 हजार रूपये दिए ताकि भूमैया और किस्ता गौर को फांसी की सजा सुनाई जा सके।
इस किताब की एक और खास बात यह है कि यहाँ वरवर राव ने सुप्रसिद्ध तेलगु कवि श्री श्री को बेहद प्यार से याद करते हुए उनकी कई शानदार कविताओं को भी उद्धृत किया है। दरअसल श्री श्री भी मृत्यु का इंतजार करते भूमैया और किस्ता गौर से जेल में मिलने आये थे। मिलने के बाद उन्होंने भूमैया और किस्ता गौर को क्रमशः धरती और आकाश की संज्ञा दी। 2 दिसम्बर, 1975 की सुबह भूमैया और किस्ता गौर को फांसी पर चढ़ा दिए जाने की खबर पढ़कर श्री श्री ने अपनी एक सशक्त कविता में उन्हें यूं याद किया –
‘’वे रोसेनबर्ग जैसे बुद्धिजीवी नहीं थे
न ही सेंको और वैन्जेती जैसे निर्दोष
इन दोनों में से एक था धरती, और दूसरा आकाश।‘’
वरवर राव ने लिखा कि क्या विडंबना है कि इस ‘धरती’ और ‘आकाश’ को इसीलिए फांसी पर चढ़ाया गया क्योकि उन्होंने ‘जमीन जोतने वाले को’ [land to the tiller] नारे के तहत अपना हक माँगा था।
श्री श्री सिर्फ कविता में ही अपना समर्थन नहीं व्यक्त कर रहे थे, बल्कि वे भूमैया और किस्ता गौर की फांसी के खिलाफ चलने वाले आन्दोलन में सक्रिय हिस्सेदारी भी कर रहे थे। यह आन्दोलन इतना जबरदस्त था कि इसकी अनुगूंज विदेशों में भी सुनाई दे रही थी और ज्या पाल सात्र, तारिक अली तथा नोम चोम्स्की जैसे बुद्धिजीवी भी भारतीय दूतावासों के सामने खड़े होकर इस बर्बर फांसी का विरोध कर रहे थे।
वरवर राव आगे बताते हैं कि हुज़ुराबाद में एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए श्री श्री ने महान रूसी लेखक दोस्तोवस्की का जिक्र करते हुए कहा कि जार तक ने उन्हें अंत समय में माफ़ी देते हुए फांसी के तख्ते से वापस लौटा दिया था। क्या इंदिरा गाँधी जार से भी ज्यादा क्रूर दिखना चाहती हैं?
हालाँकि तथ्यतः यह बात सही नहीं है। जार ने अपने को जनता के सामने उदार दिखाने के लिए दोस्तोवस्की को माफ़ कर देने की यह घटना प्रायोजित की थी। दोस्तोवस्की की असल सजा साइबेरिया में निर्वासन थी। और तथाकथित माफ़ी के बाद उन्हें साइबेरिया ही भेज दिया गया।
वरवर राव बताते हैं कि भूमैया और किस्ता गौर ने अपनी अंतिम इच्छा के बतौर अपनी आँखें दान कर दी थी। बाद में इप्टा से जुड़े मशहूर फिल्मकार केए अब्बास ने लिखा कि भूमैया और किस्ता गौर की आँखें आज भी हमें देख रही हैं।
भूमैया और किस्ता गौर की फांसी से प्रभावित होकर बहुत सा साहित्य लिखा गया और अनेक फ़िल्में भी बनीं। ऐसी ही एक फिल्म ‘आँखे बोले’ [The Eyes Speak] का जिक्र करते हुए वरवर राव ने लिखा है कि उस दौरान इस फिल्म की बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग की गयी थी।
वरवर राव भूमैया और किस्ता गौर के संघर्ष और बलिदान को मानवता के सर्वकालिक द्वंदात्मक-ऐतिहासिक सत्य से जोड़ते हुए एक बार फिर श्री श्री को उद्धृत करते हुए कहते हैं-
‘’कल गोरे लोग तुम्हें भगत सिंह कहते थे,
आज भूरे लोग तुम्हें नक्सलवादी कहकर बदनाम करते हैं,
लेकिन कल दुनिया तुम्हें भोर के तारे के रूप में सलाम करेगी’’
यह किताब आज के समय में इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह भूमैया और किस्ता गौर की फांसी के बहाने भारत के उस गौरवशाली क्रांतिकारी इतिहास को सामने लाती है, जिसे झुठलाने और मिटाने का प्रयास इस वक़्त जोर-शोर से किया जा रहा है।
हमें फ़क्र है कि इस घुटन भरे समय में वरवर राव और उनकी शानदार लेखनी हमारे साथ है, जहाँ हम न सिर्फ क्रांतिकारी इतिहास की धड़कन सुन सकते हैं, बल्कि उम्मीद की गर्माहट भी महसूस कर सकते हैं।
और अंत में भूमैया और किस्ता गौर पर वरवर राव की लिखी एक शानदार कविता के एक अंश से ही इस लेख को खत्म करना उचित होगा-
‘’क्या तुम वही किसान गुरिल्ले हो,
जो गोदावरी नदी के किनारे
बाँस के झुरमुट में अंकुरित हुए थे—
और अब फाँसी के फंदे पर
अपना गला रख रहे हो,
ताकि यह पीढ़ी सुन सके
जन-संघर्ष का संगीत?
(मनीष आज़ाद लेखक और टिप्पणीकार हैं।)