अपनी जड़ों की कहानियाँ कहिए : रवि राज मुर्मू

नई दिल्ली। झारखंड के फिल्मकार रवि राज मुर्मू ने युवा फिल्मकारों से अपनी भाषा, संस्कृति और समुदाय के बीच मौजूद कहानियों को फिल्मों में तलाशने की अपील की। उन्होंने कहा कि अपनी जड़ों की कहानियाँ कहिए।आदर्श परिस्थितियों का इंतजार मत कीजिए। फिल्म बनानी है तो बनाइए-जरूरत पड़े तो मोबाइल कैमरे से शुरुआत कीजिए।

72वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में अपनी संथाली फिल्म आंगेन के लिए निर्देशक की श्रेष्ठ पहली फ़िल्म श्रेणी के सम्मान के लिए चुने गए मुर्मू शनिवार को न्यू दिल्ली फ़िल्म फाउंडेशन के टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर के सितंबर चैप्टर में स्पॉटलाइट सत्र में ऑनलाइन जुड़े थे।

संथाली भाषा में फिल्म बनाने और सीमित संसाधनों के बावजूद आंगेन को राष्ट्रीय पहचान तक पहुंचाने की उनकी यात्रा इस सत्र का प्रमुख आकर्षण रही।

रवि राज ने बताया कि क्षेत्रीय भाषा और संस्कृति पर फिल्म बनाने की अपनी अलग चुनौतियां होती हैं, लेकिन अपने समुदाय के बीच काम करने की एक बड़ी ताकत यह भी है कि लोग और सहयोगी लगातार जुड़ते चले जाते हैं। उन्होंने बताया कि आंगेन लगभग शून्य बजट और बेहद सीमित संसाधनों में बनाई गई। उन्होंने युवा फिल्मकारों को प्रेरित करते हुए कहा कि फिल्म बनाने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। काम शुरू करने पर गलतियां भी होंगी, लेकिन उन्हीं गलतियों से सीखते हुए फिल्मकार अपने काम को बेहतर बना सकता है।

उन्होंने दर्शकों के सवालों के जवाब भी दिए और उन्हें अपनी क्षेत्रीय भाषा, स्थानीय संस्कृति और अपनी जड़ों से जुड़ी कहानियों को तलाशने तथा उन्हें रचनात्मक रूप से फिल्मों में बदलने के लिए प्रेरित किया। रवि राज ने कहा कि अपने समुदाय के साथ काम करने से न केवल कहानियां मिलती हैं, बल्कि फिल्म बनाने के लिए सहयोग और संसाधन भी धीरे-धीरे जुटते जाते हैं।

इससे पूर्व पहले सत्र में पटकथा लेखक शिरीष शर्मा ने ‘पहली कहानी से पहली पटकथा’ पर बातचीत करते हुए कहा कि लेखक की पहली कहानी अक्सर उसके निजी अनुभवों या आपबीती के आसपास बुनी होती है। उनके अनुसार कहानी का प्रेमाइस तय करते समय ऐसे किरदार को पकड़ना जरूरी है जो कहानी को आगे ले जा सके और परिस्थितियों से संघर्ष कर सके। तभी कहानी का आरंभ, मध्य और अंत स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।

शिरीष ने लेखन में लेखक की अपनी पीड़ा और अनुभव की महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जब तक लेखक किसी तकलीफ या संघर्ष से नहीं गुजरता, उसके लेखन में वह गहराई आना मुश्किल है। उन्होंने युवा लेखकों से कहा कि लिखते समय माहौल, किरदार और संघर्ष को लेकर स्पष्टता जरूरी है। उनके अनुसार “लिखने में बात से बात बनती है”- एक-एक किरदार के साथ परिस्थिति और उसकी चुनौती को सामने रखते हुए कहानी आगे बढ़ती है और फिर उसका क्लाइमेक्स तथा रेजोल्यूशन अपने आप धीरे-धीरे सामने आता जाता है।

कार्यक्रम के म्यूजिक चैप्टर में बोध से बात की गई जो हाल ही में सेनोरिटा के अपने हरियाणवी अंदाज के वीडियो के जरिए सोशल मीडिया पर चर्चा में आए। उन्होंने अपनी संगीत यात्रा साझा करते हुए बताया कि वायरल हुआ यह वीडियो भी लगभग खेल-खेल में तैयार हो गया था। बोध ने अपनी कई नई धुनें भी सुनाईं, जिन्हें दर्शकों ने खूब सराहा। उन्होंने बताया वह जल्द ही अपना म्यूजिक एल्बम लॉन्च करने की तैयारी कर रहे हैं।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)

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