हंगामा है या हकीकत! आखिर भारत के लोकतंत्र को हुआ क्या है? 

23 सितंबर 2026 को द इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट में बताया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज की। कुछ आपत्तियां एक ही दिन में चार बार आईं। रिपोर्ट के अनुसार दोनों आयुक्तों का कहना था कि कई निर्णय उनकी जानकारी के बिना लिए और जारी किए गए। 

दस महीनों में चौदह बार

जिस प्रकार से दस महीनों में चौदह बार चुनाव आयुक्तों ने अपनी सहमतियां जाहिर की हैसियत उससे समझ में आने लायक बात यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव आयुक्तों की असहमतियों को आपत्तियां नहीं माना! असहमतियों को आपत्ति नहीं मानने के पीछे की चालाकियों को समझना क्या बहुत मुश्किल है? 

यह साफ-साफ सामने है कि एसआईआर के पहले और दूसरे चरण में 7.8 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिये गए थे। तीसरे चरण में 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहा है। इन में 36 करोड़ मतदाताओं में से अब तक 6.18 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। इतना ही नहीं 5.43 करोड़ मतदाताओं को अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने का नोटिस जारी किया गया है। चुनाव आयुक्त सहित कई महत्वपूर्ण सरकारी पदों, संवैधानिक पदों पर काम कर चुके या कर रहे लोगों के नाम भी संदिग्ध करार दिए गए हैं, नोटिस जारी किया गया है।

मुख्य चुनाव आयुक्त के मनमानेपन को लेकर हुआ खुलासा भारत के लोकतंत्र की बहुत ही चिंताजनक अंदरूनी कहानी है। साधारण मतदाता, खासकर जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए या जिन्हें परेशानी झेलनी पड़ी उन के मन में सवाल उठ रहे हैं कि क्या ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर बने रहने का अधिकार है?

याद है न पलासी! क्या होता है विश्वासघात! 

यह सीधा-सरल शब्दों में विश्वासघात का मामला बनता हुआ दिख रहा है। क्या यह संवैधानिक संकट नहीं है? क्या यह  राष्ट्रपति के नैतिक-अंकुश और न्यायिक हस्तक्षेप का मामला नहीं बनता है? सुप्रीम कोर्ट के पृच्छा का अधिकार के अंतर्गत नहीं आता है? 

फॉर्म-6 में बदलाव तो चुनाव आयोग सर्वसम्मति के आधार पर भी नहीं ले सकता था। सर्वसम्मति तो एक तरफ यहां तो बताया जाता है कि दोनों आयुक्तों ने फॉर्म-6 को वैधानिक फॉर्म माना और मतदाता सूची में नाम पंजीकरण 1960 में उपयुक्त में संशोधन के बिना बदला नहीं जा सकता। बताया जाता है कि संधू ने इसे “अनधिकृत और अवैध” बताया।

असहमति में आपत्ति नहीं, फिर सहमति में आपत्ति कैसे नहीं! 

चुनाव आयोग की सफाई है कि आंतरिक नोट्स, टिप्पणियां और अलग राय विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं। अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए और उन पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। आंतरिक टिप्पणियों को अंतिम फैसले के खिलाफ औपचारिक डिसेंट नहीं माना जा सकता। मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग एक दूसरे के पर्याय नहीं हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त की सफाई को आयोग का जवाब मानना क्या तर्क-संगत हो सकता है? चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को असहमतियां बताने की चालाकियों में माहिर है चुनाव आयोग! तो फिर! इन परिस्थितियों में इस सफाई को चुनाव आयोग का सर्वसम्मत वक्तव्य माना जा सकता है?  

यहीं टकराव है। एक तरफ चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियां हैं, दूसरी तरफ आयोग का दावा कि अंतिम आदेश सामूहिक हैं। 

सामान्य नागरिकों की समझ के अनुसार अनुच्छेद 324 चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार चुनाव आयोग को देता है, अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त को नहीं। मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव आयोग का पर्याय नहीं माना जा सकता है। 

2023 का मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम स्पष्ट करता है कि आयोग का काम जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होना चाहिए। असहमति होने पर बहुमत का मत प्रभावी होगा। तीन सदस्यीय आयोग में दो चुनाव आयुक्त बहुमत बना सकते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त “प्रथम समानों में” हैं, बॉस नहीं। उनके पास कोई कास्टिंग वोट नहीं है। अगर दो आयुक्त किसी प्रस्ताव के खिलाफ हैं, तो वह प्रस्ताव नहीं चल सकता। 

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी और ओपी रावत जैसे अधिकारियों ने कहा है कि आयोग में असहमतियां पहले भी हुई हैं (जैसे 2019 में अशोक लवासा), लेकिन वे आमतौर पर चर्चा के बाद सर्वसम्मति में बदल जाती थीं। असहमतियों के बातचीत के माध्यम से सर्वसम्मति में बदलने की बात यहां लागू नहीं हो सकती है क्योंकि चुनाव आयुक्तों के अनुसार चुनाव आयोग के बहुमत कई निर्णयों का पता भी नहीं था! तो यह बिल्कुल साफ-साफ समझ में आने लायक बात है कि “जहां तक संभव हो सर्वसम्मति या बहुमत” के सिद्धांत का षड़यंत्रपूर्ण उल्लंघन दिखता है। 

क्या यह विश्वासघात या संवैधानिक संकट नहीं है?

क्या यह संस्थागत प्रक्रिया का अनजाने में हुआ उल्लंघन का मामला है! नहीं यह तो निर्धारित प्रक्रियाओं का जानबूझकर, सोद्देश्यपूर्ण और का इरादातन किया गया उल्लंघन का मामला दिखता है। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता इस बात पर टिकी है कि वह सामूहिक निकाय के रूप में काम करे, न कि एक व्यक्ति के निर्देश पर। अगर दो सदस्य बार-बार लिखित रूप से कहते हैं कि फैसले उनकी जानकारी के बिना हो रहे हैं, और फिर भी उन फैसलों को आयोग के नाम पर जारी किया जाता है, तो संस्था की आंतरिक जांच-संतुलन कमजोर पड़ती दिखती है।

यहां यह सवाल जरूर उठता है कि दो सदस्यों की जानकारी के बिना फैसले हो रहे थे, तो इसे सार्वजनिक जानकारी में लाने के लिए प्रतिरोध के बिना किसी पत्रकार का इंतजार क्यों किया जा रहा था!  

लोकतंत्र में उम्मीद कायम रखने की पैरवी करनेवाले इस स्थिति को लोकतंत्र का संवैधानिक संकट मान रहे हैं। संवैधानिक संकट तब बनता है जब कोई संवैधानिक संस्था संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन जानबूझकर सोद्देश्यपूर्ण तरीके से करने लगे। उसके इरादे में लोकतंत्र की मूल प्रक्रिया यानी मतदाता सूची की शुद्धता को प्रभावित करना शामिल हो। 

एसआईआर के माध्यम से मतदाता सूची से करोड़ों मतदाता के नाम को हटाये जाने के बाद यह सवाल नागरिकों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार से स्पष्ट रूप से जुड़ गया है। यह जबरदस्त संकट है। विपक्ष इसे “एक-व्यक्ति की तानाशाही” बता रहा है और महाभियोग की मांग कर रहा है।

क्या किसी भी स्तर की कोई भी स्वायत्तता संवैधानिक संप्रभुता से अधिक ताकतवर हो सकती है? सीधा-सरल जवाब है — नहीं। 

संविधान प्रदत्त स्वायत्तता की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश का कोई-न-कोई संवैधानिक प्रावधान जरूर होगा! लेकिन सवाल तो यही है कि लोकसंरक्षकों में नैतिक साहस की कमी हो तो राज्य शक्ति के निरंकुश होते भला कितनी देर लगती है! लोकसंरक्षकों के नैतिक साहस में क्यों कमी आती चली गई, कुछ भी कहना मुश्किल भले हो, समझना बिल्कुल ही मुश्किल नहीं है।  

महामहिम राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट, न्यायिक सेवा के अधिकारियों को नागरिकों के मन में उठते सवालों का सही समाधान न मिलना क्या जरा-सा भी नहीं, रत्ती भर भी परेशान नहीं कर रहा है? 

न अनधिकृत की परवाह, न अवैध की चिंता  

असहमतियों को “आपत्ति” न मानना तकनीकी रूप से संभव है क्योंकि अंतिम आदेशों पर तीनों के हस्ताक्षर हैं। लेकिन बार-बार लिखित आपत्तियां, “अनधिकृत-अवैध” जैसे शब्द और जानकारी के बिना निर्णय लिए जाने का आरोप संस्था की पारदर्शिता पर गहरी छाया डालते हैं। चुनाव आयोग की ताकत उसकी सामूहिकता और तटस्थता में है। बहुमत होने के बावजूद दो चुनाव आयुक्त खामोश से किनारे लगा दिए गए! लोकतंत्र में भरोसे की बुनियाद के उखड़ने का ही लक्षण है यह!   

सच के उत्सव में बदलने का त्योहारी मौसम और लोकतंत्र की साफ-सफाई  

यह मामला अभी रिपोर्ट और सफाई के स्तर पर है। पूरी सच्चाई आंतरिक फाइलों के सार्वजनिक होने या न्यायिक जांच से ही सामने आएगी। तब तक सबसे जरूरी बात यह है कि आयोग खुद अपनी निर्णय प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाए — कौन सा नोट विचार-विमर्श था और कौन सा औपचारिक असहमति, यह स्पष्ट हो। बिना इसके संदेह बना रहेगा कि संस्था अपने संवैधानिक स्वरूप से कितनी दूर चली गई है।

हे स्वायत्त लोगों रहम करो! 

(प्रफुल्ल कोलख्यान लेखक और सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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