कॉरपोरेट नहीं चाहता कि देश में रहे लोकतंत्र

इंडियन एक्सप्रेस द्वारा चुनाव आयोग में चल रही कथित अनियमितताओं और आयोग के भीतर की कार्यप्रणाली से संबंधित रिपोर्टों को उजागर किए जाने के बाद देश में एक महत्वपूर्ण बहस शुरू हुई है। एक बार फिर संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक संचालन का प्रश्न सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में है। इस पूरे घटनाक्रम से कम से कम तीन गंभीर प्रश्न सामने आते हैं – नए मतदाताओं के पंजीकरण में इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में किए गए बदलाव, मतदाता सूची से नाम हटाने, जोड़ने और पुनर्बहाल करने की प्रक्रिया तथा मतदाता डेटाबेस और सॉफ्टवेयर के केंद्रीकरण, और सबसे महत्वपूर्ण बिहार से शुरू होकर अन्य राज्यों तक विस्तारित विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (एसआईआर) की वैधानिकता। इसके साथ यह बात भी उभरी है कि चुनाव आयोग जिसमें तीन सदस्य होते हैं उसमें नियमों के अनुसार लोकतांत्रिक संचालन न होकर मनमाने और एकतरफा फैसले लिए गए।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ. एस.वाई. कुरैशी ने देशव्यापी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वैधानिकता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पूरे देश में इस प्रकार के पुनरीक्षण का कोई स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान नहीं है और न ही पीपुल्स रिप्रेजेंटेशन एक्ट और नियमों में इसकी व्यवस्था है। इस संदर्भ में चुनाव आयोग द्वारा संविधान के अनुच्छेद 324 तथा जनप्रतिनिधित्व कानूनों के तहत प्राप्त शक्तियों का उल्लेख किया जाता है। जबकि ये चुनाव आयोग को किसी विशेष परिस्थिति में किसी एक क्षेत्र या उसके किसी भाग में एसआईआर कराने की शक्ति देते हैं। एसआईआर की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मूल मतदाता सूची से हटाए जाने की रिपोर्टें सामने आई हैं। विभिन्न राज्यों के संबंध में करीब 13 करोड़ नाम हटाए गए हैं, जिसमें महाराष्ट्र में 2.07 करोड़ और उत्तर प्रदेश में 2.05 करोड़ मतदाता हैं। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जिन नागरिकों के नाम हटाए गए, उन्हें पर्याप्त सूचना, सुनवाई और अपील का अवसर मिला ही नहीं।

फॉर्म-6 में बदलाव भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा है। मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के नियम 13 (क) और नियम 26 में निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार मतदाता पंजीकरण के लिए निर्धारित फॉर्म 6 में बदलाव का प्रश्न केवल प्रशासनिक आदेश से नहीं, बल्कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। इसीलिए इस वैधानिक फॉर्म के साथ जोड़ी गई माता/पिता या रिश्तेदार के पूर्व एसआईआर में नाम होने की जानकारी की अतिरिक्त घोषणा या दस्तावेज को दो चुनाव आयुक्तों ने अवैधानिक व अनधिकृत कहा है। यही नहीं, हालत यह है कि प्रतिवर्ष दो बार नए वोटरों को जोड़ने वाले अभियान एसएसआर को भी नहीं चलाया गया, जिससे 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके नई पीढ़ी के नौजवानों का नाम नहीं जुड़ सका।

इसी तरह मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या पुनर्बहाल करने की प्रक्रिया में स्थानीय स्तर के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों की भूमिका निर्धारित है। इसके स्थान पर मतदाता डेटाबेस और सॉफ्टवेयर का संचालन अत्यधिक केंद्रीकृत हो गया, जिससे पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक की शिकायत निवारण व्यवस्था के साथ निष्पक्षता का महत्वपूर्ण सवाल सामने आया।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर मतभेद और असहमति से संबंधित गंभीर सवाल उठाते हुए कहा गया कि चुनाव आयोग में नवंबर 2025 से लेकर अगस्त 2026 तक 14 बार दो चुनाव आयुक्तों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई और बाकायदा कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथ को अपनी आपत्ति को लिखकर भेजा। चुनाव आयोग के कानून व नियमों के अनुसार निर्णय बहुमत या सर्वसम्मत से लिए जाने चाहिए, जिसका पालन नहीं हुआ। इस सबकी जानकारी सरकार के शीर्ष पर बैठे लोगों, यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री को थी, पर वह मौन रहकर इसे होता देखते रहे।

साफ है कि यह पूरा विवाद केवल चुनाव आयोग तक सीमित नहीं है। इसके पीछे लोकतंत्र को समाप्त करने की कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ की पूरी विचार प्रक्रिया काम कर रही है। जो देश में बढ़ती आर्थिक असमानता और पूंजी के केंद्रीकरण से जुड़ी हुई है। वर्ल्ड असमानता डेटाबेस और वर्ल्ड बैंक इकोनॉमिक रिव्यू सहित विभिन्न आर्थिक अध्ययनों के अनुसार भारत में राष्ट्रीय संपत्ति और आय का बड़ा हिस्सा आबादी के ऊपरी हिस्से में केंद्रित है। उपलब्ध अनुमानों के अनुसार शीर्ष 1 प्रतिशत आबादी के पास राष्ट्रीय संपत्ति का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि निचले 50 प्रतिशत लोगों की संपत्ति में हिस्सेदारी लगभग 6 प्रतिशत के आसपास है। इसी प्रकार आय के वितरण में भी भारी असमानता दिखाई देती है। शीर्ष 1 प्रतिशत की आय में हिस्सेदारी 23.3 प्रतिशत और शीर्ष 10 प्रतिशत की 57 प्रतिशत है। वहीं नीचे के 50 प्रतिशत तबके की आय में हिस्सेदारी मात्र 13 प्रतिशत है।

पिछले एक दशक में भारत में अरबपतियों की संख्या और उनकी कुल संपत्ति में भी तेज वृद्धि हुई है। 2014 के आसपास देश में लगभग 56 अरबपति थे, जिनकी संपत्ति 191.5 अरब डॉलर थी, जबकि 2026 तक यह संख्या 229 हो चुकी है, जिनकी कुल संपत्ति 1000 अरब डॉलर से भी ज्यादा है। शीर्ष अरबपतियों के पास केंद्रित संपत्ति इस बात का संकेत है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में पूंजी का केंद्रीकरण किस तेजी से बढ़ा है। गौतम अडानी की संपत्ति का उदाहरण लें तो उपलब्ध वैश्विक अरबपति सूची के अनुसार 2014 में उनकी संपत्ति 2.8 अरब डॉलर थी, जबकि 2026 तक यह 29 गुना बढ़कर लगभग 81 अरब डॉलर से अधिक हो गई, यह वृद्धि 2821 प्रतिशत है। इस वृद्धि के पीछे शेयर बाजार में कंपनियों के मूल्यांकन में खेल, सरकारी सहयोग से बंदरगाह, ऊर्जा, सार्वजनिक निवेश योजनाओं में अधिपत्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक है।

मूल प्रश्न यह है कि जब आर्थिक शक्ति कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों में लगातार केंद्रित होती जाती है, तब लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और जवाबदेही उनके लिए खतरा बनने लगती है। पूरी दुनिया में वैश्विक पूंजी लोकतंत्र और कल्याणकारी राज्य को खत्म करने पर आमादा है। भारत में भी यही प्रक्रिया जारी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शुरुआत से ही भारत में संवैधानिक लोकतंत्र के खिलाफ रहा है। वह संविधान में दिए ‘एक व्यक्ति, एक मत और एक राजनीतिक मूल्य’ के सिद्धांत को पसंद नहीं करता है और मताधिकार को कुछ संपन्न व समृद्ध तबकों तक सीमित करना चाहता है। इसलिए लोकतंत्र को खत्म करने में लगे कॉरपोरेट के लिए भाजपा-आरएसएस की अधिनायकवादी राजनीतिक विचारधारा सबसे उपयोगी बनी हुई है।

ऐसे वक्त में आज जरूरत एसआईआर को रद्द करने और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर तो आंदोलन तेज करने की है ही, साथ ही आर्थिक असमानता और पूंजी के बढ़ते केंद्रीकरण के सवाल को भी जोड़ना होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, भूमि और आवास जैसे अधिकारों को मजबूत किए बिना लोकतंत्र को वास्तविक अर्थों में मजबूत नहीं किया जा सकता। इसका व्यापक लक्ष्य होना चाहिए – आर्थिक शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण के विरुद्ध जनतांत्रिक हस्तक्षेप, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, पारदर्शिता व जवाबदेही और हर नागरिक के मताधिकार व संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा।

(दिनकर कपूर ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट, उत्तर प्रदेश के महासचिव हैं।)

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