एसआईआर फ़ैसले को वापस लिया जाना चाहिए, चुनाव आयोग ने तथ्यों को गलत तरीके से पेश कर सुप्रीम कोर्ट को गुमराह किया: पूर्व जज गौड़ा

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस वी गोपाला गौड़ा ने कहा कि मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (एसआईआर) को कराने के चुनाव आयोग के फ़ैसले को सही ठहराने वाले सुप्रीम कोर्ट के मई 2026 के फ़ैसले को वापस लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला चुनाव आयोग द्वारा कोर्ट को गुमराह करने और तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने का नतीजा था।

लाइव लॉ से बातचीत में जस्टिस गौड़ा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को खुद से इस फ़ैसले को वापस लेना चाहिए और चुनाव आयोग से सभी रिकॉर्ड मंगाने चाहिए। इससे यह पता चल सके कि एसआईआर शुरू करने का फ़ैसला ‘फुल कमीशन’ (पूरे आयोग) ने लिया था या नहीं, और क्या इसमें ज़्यादातर चुनाव आयुक्तों की सहमति और मंज़ूरी शामिल थी।

उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने कार्यवाही के दौरान तथ्यों को गलत तरीके से पेश करके कोर्ट के साथ “धोखाधड़ी” की थी।

जस्टिस गौड़ा के अनुसार, कोर्ट को चुनाव आयोग के भीतर फ़ैसला लेने की प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड की जांच करनी चाहिए ताकि यह पता चल सके कि एसआईआर के फ़ैसले को ‘फुल कमीशन’ की मंज़ूरी मिली थी या नहीं।

जस्टिस गौड़ा ने कहा, “(एसआईआर) फ़ैसले में गैर-कानूनीपन और असंवैधानिकता साफ़ तौर पर दिखती है।”

उन्होंने कहा कि ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की हालिया रिपोर्ट से पता चलता है कि एसआईआर से जुड़े कई फ़ैसलों पर दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी और मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव आयोग के नाम पर एकतरफ़ा तौर पर ये फ़ैसले लिए थे। हालाँकि, यह बात सुप्रीम कोर्ट के ध्यान में नहीं लाई गई थी। उन्होंने कहा कि जानबूझकर तथ्यों को छिपाना कोर्ट के साथ धोखाधड़ी करने जैसा है, और धोखाधड़ी फ़ैसले के आधार को ही खत्म कर देती है।

जस्टिस गौड़ा ने कहा कि भारत के चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को जो प्रेस रिलीज़ जारी की, उसमें असल में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट को मान लिया गया था। साथ ही, उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि बदले हुए ‘फॉर्म 6’ को सुप्रीम कोर्ट ने मंज़ूरी दे दी है। हालांकि, भारत के मुख्य न्यायाधीश ने हाल ही में इस बात से इनकार किया कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘फॉर्म 6’ में किसी बदलाव को सही ठहराया है। जस्टिस गौड़ा ने कहा कि इन बातों को देखते हुए एसआईआर फ़ैसले पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है।

जस्टिस गौड़ा ने सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुईयां का भी बचाव किया और कहा कि सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज रहते हुए जस्टिस भुईयां का बड़े पैमाने पर वोटिंग अधिकार छिनने के मुद्दे पर टिप्पणी करना कोई गलत बात नहीं थी, क्योंकि एक जज को संवैधानिक मुद्दे पर बोलने का अधिकार है।

जस्टिस गौड़ा ने पूछा, “लॉ के छात्रों से संवैधानिक अधिकारों के बारे में बात करने में क्या गलत है?” जस्टिस गौड़ा की ये बातें भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई द्वारा एसआईआर मुद्दे पर जस्टिस भुयान की टिप्पणियों की आलोचना के संदर्भ में आई हैं।

इस आलोचना का जवाब देते हुए, जस्टिस गौड़ा ने सवाल उठाया कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश गवई को जस्टिस भुईयां की आलोचना करने का क्या अधिकार है। उन्होंने एक उदाहरण का ज़िक्र किया जब पूर्व मुख्य न्यायाधीश गवई ने बॉम्बे हाई कोर्ट के जज रहते हुए ‘जज लोया केस’ पर टिप्पणी की थी, जबकि उस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही थी।

जस्टिस गौड़ा ने यह भी सवाल उठाया कि गवई ने उन रिपोर्टों पर लोगों की चिंताओं का जवाब क्यों नहीं दिया जिनमें कहा गया था कि चुनाव आयोग के अहम फ़ैसले दूसरे चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए थे।

जस्टिस गौड़ा ने बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में सीजेपी  द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। वहाँ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एसआईआर फ़ैसले से असहमति जताई और इसे “असंवैधानिक, गैर-कानूनी और अलोकतांत्रिक” बताया। फ्रीडम पार्क में हुई सभा में उन्होंने कहा, “भारत सरकार के कामकाज को संभालने वालों के समर्थन से मुख्य चुनाव आयुक्त  लोकतंत्र की हत्या कर रहे हैं। लोग उन्हें सबक सिखाएंगे।”

इसके अलावा  सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय ओक ने जस्टिस भुइयां का बचाव करते हुए कहा कि मौजूदा सुप्रीम कोर्ट जज ने कोई न्यायिक अनुचित काम नहीं किया। जस्टिस ओक ने कहा कि किसी दूसरी बेंच या अपनी ही बेंच के सामने चल रहे मामले के गुण-दोष पर मौजूदा जज का टिप्पणी करना शायद सही नहीं होगा। लेकिन जस्टिस भुइयां के भाषण में ऐसा कुछ नहीं हुआ।

उन्होंने कहा कि जज भी एक नागरिक होता है और राष्ट्रीय मुद्दों के प्रति उदासीन नहीं रह सकता। मौजूदा जज को संयम बरतना चाहिए, यानी वे किसी खास राष्ट्रीय मुद्दे पर अपने विचार लेकर मीडिया के सामने नहीं जा सकते या उस पर लिख नहीं सकते, लेकिन अगर वे किसी लॉ कॉलेज में जाते हैं, जहां किसी कानूनी मुद्दे पर बहस हो रही है, तो जज कानून के छात्र के तौर पर अपने विचार रख सकते हैं, बिना कोर्ट के किसी आदेश या चल रहे मामले पर टिप्पणी किए।

जस्टिस ओक ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि उन्होंने सीमा पार की है… बल्कि मुझे लगता है कि उन्होंने युवा छात्रों को वयस्क मताधिकार और लोकतंत्र में इसके महत्व के बारे में बताया है। मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ गलत है। असल में, व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि अगर जज एक नागरिक के तौर पर इस प्रक्रिया के बारे में बात करते हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं है… मैं एक कदम और आगे बढ़कर कहूंगा – बेशक कोई भी मौजूदा जज अपनी कोर्ट या किसी अन्य संवैधानिक कोर्ट या दूसरी बेंच में चल रहे मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी नहीं कर सकता, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन हो सकता है कि लॉ स्टूडेंट के तौर पर छात्रों के साथ कानून पर चर्चा करते हुए वह कहें कि सुप्रीम कोर्ट के किसी खास फैसले पर पुनर्विचार की ज़रूरत हो सकती है। इसका मतलब यह नहीं है कि वे न्यायिक पक्ष में भी वही राय रखेंगे।

ये टिप्पणियां लेक्स कॉन्सिलियम फाउंडेशन के संस्थापक-निदेशक और पूर्व जज एडवोकेट जनरल नीलेन्द्र कुमार के साथ बातचीत के दौरान की गईं।

(फोटो साभार : लाइव लॉ)

(जनचौक ब्यूरो)

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