भारत में 42 लाख तक हो सकता है कोरोना से मौतों का आंकड़ा! देखिए न्यूयॉर्क टाइम्स की पूरी रिपोर्ट

भारत में कोविड-19 के सरकारी आंकड़े देश में महामारी की वास्तविक गंभीरता को काफी कम दिखा रहे हैं। पिछले हफ्ते, भारत ने महामारी के दौरान किसी भी देश की तुलना में एक दिन में सबसे ज्यादा मौतें दर्ज कीं- फिर भी संभवतः यह आंकड़ा कम करके बताया गया है।

रिकॉर्ड के खराब रखरखाव और व्यापक पैमाने पर परीक्षण की कमी के चलते भारत में संक्रमणों की कुल संख्या की भी स्पष्ट तस्वीर प्राप्त करना कठिन है। मौतों की सही संख्या जानने के लिए संक्रमित लोगों में होने वाली मौतों की संख्या के आधार पर अनुमान लगाने वाली एक्सट्रापोलेशन तकनीक के एक और चरण के इस्तेमाल की जरूरत होती है।

देश में तबाही के सही स्वरूप को जानने के लिए द न्यूयॉर्क टाइम्स ने दर्जन भर विशेषज्ञों के साथ भारत में तारीखवार संक्रमणों और मौतों तथा बड़े पैमाने पर एंटीबॉडी परीक्षणों के परिणामों का विश्लेषण किया है ताकि अनेक संभावित अनुमानों पर पहुंचा जा सके।

इनमें से संक्रमण और मौतों के जो सबसे कम डरावने अनुमान हैं, वे भी सरकारी आंकड़ों से बहुत ज्यादा हैं। इनमें से सबसे निराशावादी अनुमान भी दसियों लाख मौतों के हैं-जो दुनिया के सभी देशों से ज्यादा विनाशकारी नुकसान है।

भारत की महामारी को सरकारी आकड़ों में कम क्यों दर्शाया जाता है

 भारत के आधिकारिक कोविड आँकड़े 24 मई तक 26,948,800 मामलों और 307,231 मौतों की रिपोर्ट करते हैं।

यहां तक कि बहुत सतर्क देशों में भी​ इस महामारी के दौरान संक्रमणों की संख्या रिपोर्ट की गयी संख्या से संभवतः बहुत ज्यादा होगी, क्योंकि बहुत से लोग वायरस के संपर्क में आये होंगे लेकिन उनकी जांच नहीं हुई होगी। शुक्रवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि वैश्विक स्तर पर कोविड-19 से मरने वालों की संख्या रिपोर्ट की गयी संख्या से दो या तीन गुना अधिक हो सकती है।

तकनीकी, सांस्कृतिक और व्यवस्थागत कारणों से भारत में संक्रमणों और मौतों की संख्या कम बताये जाने की संभावना और भी अधिक है। एमोरी विश्वविद्यालय के एक महामारी विज्ञानी कायोको शिओडा का कहना है कि चूंकि अस्पताल क्षमता से ज्यादा भरे हुए हैं,  इसलिए कोविड से होने वाली काफी मौतें, खासकर ग्रामीण इलाकों में, घरों पर ही हो जाती हैं, और वे सरकारी गिनती में आने ही नहीं पातीं। उन्होंने कहा कि मौत के कारणों की पुष्टि करने वाली प्रयोगशालाओं पर भी उतना ही बोझ है।

इसके अलावा, अन्य शोधकर्ताओं ने भी पाया है कि कोविड जांचों की सुविधा बहुत कम है। अकसर परिवार के लोग यह कहने को तैयार नहीं होते कि उनके प्रियजनों की मृत्यु कोविड से हुई है, और भारत में महत्वपूर्ण रिकॉर्ड रखने की प्रणाली काफी ढुलमुल है। कोविड-19 से पहले भी, भारत में हर पांच में से चार मौतों की कभी चिकित्सकीय जांच नहीं की जाती रही है।

सबसे कम बताने वाले अनुमान

(40.42 करोड़ संक्रमण और 6 लाख मौतें)

भारत में कोविड संक्रमणों और मौतों के अधिक विश्वसनीय अनुमानों पर पहुंचने के लिए, हमने तीन राष्ट्रव्यापी एंटीबॉडी परीक्षणों के आंकड़ों का उपयोग किया है, जिन्हें सेरोसर्वे कहा जाता है।

प्रत्येक सेरोसर्वे में, आबादी के एक हिस्से (भारत के 1.4 अरब लोगों में से लगभग 30,000) की कोविड-19 एंटीबॉडी के लिए जांच की जाती है। शोधकर्ता एक बार जब पता लगा लेते हैं कि उनमें से कितने लोगों के रक्त में एंटीबॉडी पाए गये हैं, तो वे उस प्रतिशत को पूरी आबादी पर एक्स्ट्रापोलेट (विस्तारित अनुमान) करते हैं, जिसे सेरोप्रेवलेंस कहा जाता है, ताकि पूरी आबादी का अनुमान लगाया जा सके।

एंटीबॉडी परीक्षण सरकारी रिकॉर्ड को सही करने और कुल संक्रमणों और मौतों के बेहतर अनुमानों पर पहुंचने का एक तरीका प्रदान करते हैं। इसका कारण सरल है: लगभग हर कोई जो कोविड-19 से संक्रमित हो जाता है, उसमें उससे लड़ने के लिए एंटीबॉडी विकसित हो जाते हैं। ये संक्रमण के वे निशान हैं जिन्हें सर्वेक्षणों में पहचान लिया जाता है।

येल स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में महामारी विज्ञान के एक एसोसिएट प्रोफेसर डैन वेनबर्गर का कहना है कि, एक व्यापक पैमाने के सेरोसर्वे की भी अपनी सीमाएं होती हैं। भारत की आबादी इतनी बड़ी और विविधतापूर्ण है कि यह संभव नहीं है कि कोई भी सेरोसर्वेक्षण इसके पूरे विस्तार को अपने में शामिल कर सके।

डॉ वेनबर्गर का कहना है कि,  इसके बावजूद सर्वेक्षण मौत के अधिक यथार्थवादी आंकड़ों की गणना करने का एक नया तरीका मुहैय्या कराते हैं। वे कहते हैं कि, “ये हमें एक प्रारंभिक बिंदु तो दे ही देते हैं,” और “मुझे लगता है कि इनके आधार पर हम अनुमानों पर कुछ अंकुश तो रख ही सकते हैं।”

यहां तक ​​​​कि महामारी से होने वाली वास्तविक मौतों को सबसे कम बताने वाले अनुमानों के मुताबिक भी, संक्रमणों की संख्या सरकारी रिपोर्टों से कई गुना अधिक है। हमारे पहले, ‘सबसे अच्छे काल्पनिक परिदृश्य’ के अनुमान भी  दर्ज मामलों की सरकारी संख्या की तुलना में वास्तविक संक्रमणों की संख्या 15 गुना ज्यादा बताते हैं। इन अनुमानों में संक्रमण-मृत्यु दर, यानि कुल संक्रमितों में से मरने वालों का प्रतिशत, 0.15 माना गया है। ये दोनों संख्याएं हमारे विशेषज्ञों द्वारा एकत्रित आंकड़ों में न्यूनतम हैं।

इन नतीजों के हिसाब से मरने वालों की संख्या अब तक दर्ज मौतों से लगभग दोगुनी है।

एक ज्यादा संभावित परिदृश्य

(53.9 करोड़ संक्रमण और 16 लाख मौतें)

भारत में नवीनतम राष्ट्रीय सेरोप्रेवलेंस अध्ययन वर्तमान लहर से पहले जनवरी में समाप्त हुआ, और उसमें रिपोर्ट किए गए प्रति संक्रमण पर लगभग 26 वास्तविक संक्रमण का अनुमान लगाया गया। यह परिदृश्य 2020 के अंत में अमरीका में अनुमानित दर के अनुरूप 0.3% की संक्रमण-मृत्यु दर पर गणना करता है। इस परिदृश्य में, भारत में मौतों की अनुमानित संख्या सरकारी संख्या से पांच गुना अधिक है।

सेंटर फॉर डिजीज डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी के निदेशक डॉ. रमणन लक्ष्मीनारायण कहते हैं कि, “अधिकांश देशों की तरह, भारत में भी कुल संक्रमणों और मौतों की गिनती कम दिखायी गयी है।…सबसे संभावित परिदृश्य पर पहुंचने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि विभिन्न स्रोतों से आंकड़ों के त्रिकोण पर आधारित गणना की जाए। इस गणना के आधार पर लगभग 50 से 60 करोड़ लोग संक्रमित हुए हैं।”

एक बदतर परिदृश्य

(70.07 करोड़ संक्रमण और 42 लाख मौतें)

यह परिदृश्य वर्तमान लहर की गणना में संक्रमण के प्रत्येक ज्ञात मामले पर वास्तविक संक्रमण के थोड़ा बढ़े हुए अनुमान लगाता है। वर्तमान लहर के दौरान भारत की स्वास्थ्य प्रणाली पर पड़े जबरदस्त दबाव को ध्यान में रखते हुए इसमें संक्रमण-मृत्यु दर भी अधिक रखी गयी है – पिछले परिदृश्य की दर से दोगुनी, 0.6 प्रतिशत। चूंकि हाल के हफ्तों में अस्पतालों में बिस्तर, ऑक्सीजन और अन्य चिकित्सा सुविधाएं दुर्लभ हो गयी हैं, इसलिए वायरस से संक्रमितों में से काफी लोगों की मृत्यु हुई होगी, जिससे संक्रमण-मृत्यु दर अधिक हो गयी होगी।

    संख्याओं का अन्वेषण करें

डॉ. शिओडा कहती हैं कि, चूंकि संक्रमण दर और संक्रमण-मृत्यु दर, दोनों भिन्न अज्ञात राशियां हैं,  इसलिए भारत में वास्तविक संक्रमण और मृत्यु की विश्वसनीय संख्या की हदें काफी विस्तृत हो जाती हैं। वे कहती हैं कि, “सार्वजनिक स्वास्थ्य अनुसंधान आमतौर पर एक विस्तृत अनिश्चितता वाली हदें मुहैया कराता है, और पाठकों को उस तरह की अनिश्चितता का अहसास कराना शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण काम है।”

यानि अपने निष्कर्षों के लिए इन संभावित परिदृश्यों का खुद अन्वेषण करें।

हमने संक्रमणों के गुणकों का अनुमान कैसे लगाया

भारत ने अब तक कोविड-19 महामारी के दौरान तीन राष्ट्रीय सेरोसर्वे किए हैं। तीनों ने पाया है कि संक्रमण की सही संख्या उस समय पुष्टि किए गए मामलों की संख्या से काफी अधिक थी।

जिस समय प्रत्येक सर्वेक्षण के परिणाम जारी किए गए, उन्होंने संकेत दिया कि महामारी में उन जगहों पर भारत द्वारा रिपोर्ट किए गए मामलों की तुलना में वास्तविक संक्रमण 13.5 से 28.5 गुना तक ज्यादा था। हो सकता है कि अंतिम सेरोसर्वे के पूरा होने के बाद से आंकड़े कम बताने की स्थिति में बढ़ोत्तरी हुई हो, या कमी आयी हो, लेकिन अगर इसे यथावत मान लें तो इसका अर्थ है कि भारत की लगभग आधी आबादी वायरस से संक्रमित हो चुकी लगती है।

डॉ. शिओदा कहती हैं कि सेरोसर्वेक्षणों में पाए जाने वाला बड़ा गुणक भी हो सकता है कि वास्तविक संक्रमणों की कम गिनती पर आधारित हों। उनके ऐसा कहने का कारण यह है कि संक्रमण के बाद के महीनों में एंटीबॉडी की सांद्रता कम होती जाती है, जिससे उनकी पहचान कठिन हो जाती है। इसलिए यदि सर्वेक्षण उन सभी लोगों का पता लगाने में सक्षम होते जो वास्तव में संक्रमित थे, तो सही संख्या संभवतः इससे भी ज्यादा होती।

डॉ. शिओदा कहती हैं कि, “जो लोग कुछ समय पहले संक्रमित हुए होंगे, वे भी शायद इस सर्वेक्षण में न चिह्नित हो पाये हों।… इसलिए ये आंकड़े भी संभवतः संक्रमित हुई आबादी का वास्तविक से कम आकलन हों।”

इस लेख के लिए संपर्क किए गए लगभग सभी शोधकर्ताओं की तरह, डॉ. शिओडा ने भी यही कहा कि अनुमान की यह पद्धति भारत में संभावित मृत्यु दर की विस्तृत हदों को समझने का एक अच्छा तरीका प्रदान करती है।

कोलंबिया विश्वविद्यालय के एक महामारी विज्ञानी जेफरी शमन कहते हैं कि “स्लाइडर,” या स्लाइडिंग कैलकुलेटर (खिसकाकर अलग-अलग आंकड़ों के लिए अलग-अलग अनुमानों की गणना करने वाले कैलकुलेटर) काफी उपयोगी हैं। इनसे आसानी से संक्रमण-मृत्यु दर और संक्रमण की वास्तविक संख्या व सरकारी संख्या के अनुपातों के अलग-अलग आंकड़ों के साथ संभावित परिणामों की गणना आसानी से की जा सकती है।

हमने मृत्यु दर का अनुमान कैसे लगाया

यहां प्रकाशित संक्रमण-मृत्यु दर के कई अनुमानों की गणना भारत में कोविड की हालिया लहर के पहले की गयी थी, इसलिए यह हो सकता है कि इस ताजा लहर के आंकड़ों के साथ गणना करने पर वास्तविक संक्रमण-मृत्यु दर और भी ज्यादा आये। इस दर में उम्र के अनुसार भी काफी भिन्नता आ जाती है: खास करके बुजुर्गों के लिए यह दर बढ़ जाती है। भारत की आबादी तुलनात्मक रूप से युवा है -इसकी औसत आयु लगभग 29 साल है- जिसका अर्थ है कि ज्यादा बुजुर्ग आबादी वाले देशों की तुलना में वहां कम संक्रमण-मृत्यु दर है।

संक्रमण-मृत्यु दर और सेरोप्रेवलेंस दोनों के मामले में देश के भीतर भी अत्यधिक परिवर्तनशीलता है। दुनिया भर से सेरोसर्वे डेटा संकलित करने वाली वेबसाइट सेरोट्रैकर के अनुसार, भारत में तीन राष्ट्रीय सेरोसर्वे के अलावा, स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर 60 से अधिक सेरोसर्वे किए गए हैं।

भारत में तीन स्थानों से सेरोसर्वे डेटा का उपयोग करके संक्रमण दर की जांच करने वाले डॉ. पॉल नोवोसाद, जो डार्टमाउथ कॉलेज में अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर हैं, अपने एक शोधपत्र में बताते हैं कि, जनसंख्या के नमूने के आधार पर दरों में भारी परिवर्तनशीलता पायी गयी है। वे बताते हैं कि, “हमने पाया कि आयु-विशिष्ट संक्रमण-मृत्यु दर लॉकडाउन में घर वापस आ रहे प्रवासियों में अमीर देशों की तुलना में बहुत ज्यादा थी।… इसके विपरीत कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे अमीर दक्षिणी राज्यों में पहली लहर के दौरान संक्रमण-मृत्यु दर अमीर देशों की तुलना में काफी कम थी।”

जैसा कि यहां प्रस्तुत अनुमानों में हम देख सकते हैं कि भारत जैसे बड़े देश में, संक्रमण-मृत्यु दर में एक छोटे से उतार-चढ़ाव से भी मौतों की संख्या में लाखों का अंतर हो सकता है।

हालांकि समय और क्षेत्र के लिहाज से अनुमानों में भिन्नता आ सकती है, फिर भी एक बात बिल्कुल स्पष्ट है: भारत में महामारी का आकार आधिकारिक सरकारी आंकड़ों की तुलना में बहुत बड़ा है।

(‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ से साभार लिए गए लाज़ारो गामियो और जेम्स ग्लैंज़ के इस लेख का हिंदी अनुवाद शैलेश ने किया है।)

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