‘ज़ब्तशुदा साहित्य’ पर उत्तर प्रदेश पत्रिका का एक अभिनव विशेषांक

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साल 2022 में हमने आज़ादी का अमृत महोत्सव मनाया। 15 अगस्त, 2021 से शुरू हुए देशव्यापी आयोजन, इस साल जाकर अपने समापन पर पहुंचे हैं। इस दरमियान तमाम देश भर के पत्र-पत्रिकाओं ने आज़ादी के आंदोलन और हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर कई ख़ास विशेषांक और परिशिष्ट निकाले। इसी कड़ी में एक अहम प्रकाशन, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, उत्तर प्रदेश की त्रैमासिक पत्रिका ‘उत्तर प्रदेश’ का आया है। जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेज़ी हुकूमत द्वारा ‘ज़ब्तशुदा साहित्य’ पर केन्द्रित है। यह वाक़ई एक महत्त्वपूर्ण अंक है। अंक क्या एक दस्तावेज़ है, आज़ादी के लिए हमारी जद्दोजहद का। किस तरह से आज़ादी के परवाने अपनी जान हथेली पर रखकर, अपने लेखन से देशवासियों को जागरूक कर रहे थे। विदेशी हुकूमत के काले कारनामों से उन्हें आगाह करके, उनमें वतन-परस्ती का जज़्बा जगा रहे थे।

यह अंक ख़ास तौर पर उन पत्र-पत्रिकाओं और उनके संपादकों की देशभक्त भूमिका को भी दर्शाता है, जब अंग्रेज़ी हुकूमत के काले कानूनों, पाबंदियों और जब्तियों के बावजूद, उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। उन्होंने जुर्माना भरा, जेल गए, यातनाएं सहीं, पर अपनी आवाज़ बुलंद किए रहे। वही किया जो वक़्त की ज़रूरत थी। आज़ादी के इन मतवालों की कुर्बानियों का ही नतीजा है कि आज हम आज़ाद और खुली हवा में सांस ले रहे हैं।

बीते अड़तालीस साल से लगातार निकल रही ‘उत्तर प्रदेश’ पत्रिका का यह विशेषांक, जो कि जनवरी-अप्रैल अंक है, अनेक खंडों ‘ज़ब्त इतिहास’, ‘जब्त पत्रिका’, ‘विशेष लेख’, ‘ज़ब्त कविताएं’, ‘ज़ब्त पुस्तकें’, ‘ज़ब्त कहानियां’, ‘संस्मरण’, ‘दस्तावेज़’, ‘ज़ब्त उपन्यास’, ‘ज़ब्त आत्मकथा’, ‘ज़ब्त व्यंग्य’, ‘ज़ब्त नाटक’, ‘ज़ब्त व्याकरण की पुस्तक’, ‘गुप्त रिपोर्ट’, ‘रोमांचक अध्याय’, ‘ज़ब्त भ्रमण-वृत्तान्त’ और ‘स्वतंत्रता आंदोलन में कला की भूमिका’ में बंटा हुआ है। जिसमें न सिर्फ़ इन क्रांतिकारी रचनाओं को शामिल किया गया है, बल्कि विस्तार से उन पर बात भी है।

‘ज़ब्त इतिहास’ के अंतर्गत विनायक दामोदर सावरकर की चर्चित किताब ‘द इंडियन वॉर ऑफ इंडेपेंडेंस 1857’ के दो अध्याय, ज्यों के त्यों प्रकाशित किए गए हैं। क़ाबिले ग़ौर बात यह है कि साल 1909 में किताब प्रकाशित हुई और छपते ही अंग्रेज़ी हुकूमत ने इसे ज़ब्त कर लिया।

‘ज़ब्त पुस्तकें’ के तहत जहां क्रांतिकारी शचीन्द्र नाथ सान्याल की प्रसिद्ध किताब ‘बंदी जीवन’ के चौथे संस्करण की भूमिका शामिल है, तो वहीं इस किताब की समीक्षा के साथ-साथ, साहित्यकार बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा संपादित ‘बंदी जीवन’ से कुछ पूरक तथ्यों को पेश किया गया है। इन तीनों को साथ पढ़ने से उस दौर की तूफ़ानी क्रांतिकारी गतिविधियों से हमारी बहुत हद तक वाक़फ़ियत हो जाती है।

प्रेमचंद का ‘सोजे-वतन’ और ‘अंगारे’ वह कहानी संग्रह हैं, जिन्हें अंग्रेज़ी हुकूमत की टेड़ी निगाहों का शिकार होना पड़ा। सरकार की नज़र में यह कहानी संग्रह इतने आपत्तिजनक लगे कि उसने इन किताबों पर पाबंदी लगा दी। अंक में ‘सोजे-वतन’ में संकलित पांच कहानियों में से दो कहानियों ‘यही मेरा वतन है’ और ‘शेख़ मख़मूर’ को जगह दी गई है, तो इसके साथ ही आशुतोष पार्थेश्वर ने कहानी ‘यही मेरा वतन है’ का विश्लेषण भी किया है। शकील सिद्दीक़ी ने ‘अंगारे’ की वैचारिक पृष्ठभूमि, कहानियों के कंटेंट और इस कहानी संग्रह के प्रकाशन के बाद भारतीय समाज में आए भूचाल का तथ्यात्मक ब्यौरा दिया है।

यह बतलाना लाज़िमी होगा कि ‘सोजे-वतन’ हो या फिर ‘अंगारे’ इन दोनों किताबों के रचनाकार प्रेमचंद, सज्जाद ज़हीर, डॉ. रशीद जहां, अहमद अली और महमूदुज़्ज़फ़र इन सभी का वास्ता प्रगतिशील लेखक संघ से था। जो आज़ादी के आंदोलन में अपने लेखन से हिंदुस्तानी क़ौम को जगाने का काम कर रहे थे। प्रोग्रेसिव राइटर एसोसिएशन की मैगज़ीन ‘न्यू इंडिया लिटरेचर’ भी अंग्रेज़ी हुकूमत के दमन का शिकार बनी।

अंग्रेज सरकार का गृह मंत्रालय, प्रोग्रेसिव ख़यालात की इस मैगज़ीन से इतना ख़ौफ़ज़दा था कि उसने इसके खि़लाफ़ तीन सर्कुलर निकाले और सभी अंकों को ज़ब्त कर लिया। भारतीय साहित्य-संस्कृति की नुमाइंदगी करने वाली इस पत्रिका से अंग्रेज़ सरकार घबरा गई और उसने भारतीयों के विचारों पर पाबंदी लगाने के लिए दमन का सहारा लिया। आलोचक वीरेन्द्र यादव ने अपने आलेख में इस पूरे प्रकरण को तफ़्सील से लिखा है, तो वहीं ब्रिटिश गृह सचिव के तीनों सर्कुलर को भी पेश किया है।

‘चांद’, ‘हिंदू पंच’ और ‘महारथी’ उन पत्रिकाओं में शामिल हैं, जिन्होंने अपनी लेखन सामग्री से बरतानिया हुकूमत की नाक में दम कर रखा था। ‘चांद’ का फांसी अंक, ‘हिंदू पंच’-बलिदान अंक और ‘महारथी’ पत्रिका के ‘खूने लाजपत’ अंक से अंग्रेज सरकार इतनी परेशान हो गई कि उसने इन तीनों पत्रिकाओं को ज़ब्त कर लिया।

सुधीर विद्यार्थी, कुमार वीरेन्द्र और अवनीश यादव ने इन ख़ास अंकों की सामग्री और उससे पैदा हुए भूचाल को अपने लेख में विस्तार से जगह दी है। क्रांतिकारियों पर उल्लेखनीय कार्य करने वाले सुधीर विद्यार्थी ने ‘चांद’ के ‘फांसी’ अंक पर तो रोशनी डाली है, साथ ही पत्रिका के संपादक रामरख सिंह सहगल के क्रांतिकारी कारनामों का लेखा-जोखा भी दिया है। मालूम हो कि रामरख सिंह सहगल ही वह शख़्स थे, जिन्होंने अपनी प्रेस से पंडित सुंदरलाल की मशहूर किताब ‘भारत में अंग्रेज़ी राज’ का प्रकाशन किया था। जिसके ऐवज में उन्हें अंग्रेज़ी सरकार को कोपभाजन बनना पड़ा। पत्रिका और किताब की ज़ब्ती, जुर्माना और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

उत्तर प्रदेश के ‘जब्तशुदा साहित्य’ विशेषांक के अतिथि संपादक विजय राय ने इस अंक को ख़ास बनाने के लिए अपनी ओर से काफ़ी मेहनत की है, जो पत्रिका को देखते ही मालूम चल जाती है। पत्रिका में उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों ‘मेरा जेल जीवन’ (गणेश शंकर विद्यार्थी), ‘सरदार भगत सिंह के बयान, पत्र और परिपत्र’ (सरदार भगत सिंह), ‘फांसी की कोठरी से अमर शहीद बिस्मिल के स्मरणीय उद्गार’ (रामप्रसाद बिस्मिल), ‘रूस की चिट्ठी’ (रबीन्द्रनाथ टैगोर) को एक बार फिर प्रकाशित कर, हमारी नई पीढ़ी को उनसे वाक़िफ़ कराया है, तो कई ऐसे लेख ‘बलिदान तथा साम्प्रदायिकता’, ‘अंग्रेजों को थर्रा देने वाला आंदोलन ‘रेशमी रूमाल’, ‘नेताजी सुभाषचन्द्र बोस काकोरी के शहीदों की गाथा सुनाते थे’, ‘प्रतिबंधित साहित्य में क्रांतिकारी प्रवृतियां’, ‘समाचार पत्रों और पत्रकारों के बलिदान’, ‘बनारस की भूमिगत पत्रिकारिता’, ‘ज़ब्त हुई आज़ादी के खुमार में डूबी नज़्में’ आदि अलग-अलग विषयों को कवर करते हुए लेख भी लिखवाए हैं, जो स्वतंत्रता आंदोलन के दीगर पहलुओं पर विस्तृत रोशनी डालते हैं।

पंडित सुंदरलाल की किताब ‘भारत में अंग्रेज़ी राज’ का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में विशेष योगदान रहा है। इसकी अहमियत से इंकार नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि इस क्रांतिकारी किताब पर विशेषांक में दो आलेख शामिल किए गए हैं। कुमार वीरेन्द्र और इतिहासकार राजगोपाल सिंह वर्मा ने किताब की मुख़्तसर जानकारी के साथ-साथ, अंग्रेज़ी हुकूमत द्वारा इस किताब पर उठाए ऐतराज़ात का लंबा ब्यौरा दिया है। ‘ज़ब्त उपन्यास’ के तहत साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने शरतचंद्र चटर्जी के बांग्ला उपन्यास ‘पथेर-दाबी’ की ज़ब्ती की कहानी बयां की है।

गुलाम भारत में देशवासियों की अभिव्यक्ति पर पूर्णतः पाबंदी थी। अभिव्यक्ति के तमाम साधनों पर उसके पहरे थे। व्यंग्य, नाटक, रिपोर्ताज, कला और यहां तक कि उसने व्याकरण की किताबों ‘रस’ और ‘अलंकार’ को भी अपने लिए ख़तरा माना और उनको ज़ब्त कर लिया। रामकृष्ण ने अपने आलेख में इसके ज़ब्ती के पीछे के कारणों का उल्लेख किया है।

‘नील दर्पण’ वह इंक़लाबी ड्रामा था, जिसे अंग्रेज़ हुकूमत बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसने न सिर्फ़ इस पर पाबंदी लगा दी, बल्कि मुक़दमा भी क़ायम कर दिया। पत्रिका में नाटक पर केंद्रित तीन आलेख शामिल हैं। दीनबंधु मित्र ने ‘नील दर्पण’ की कथावस्तु, विजय पंडित ने इस पर प्रतिबंध और डॉ. शरद नागर ने नाटक के रोमांचक फ़ैसले को अपने आलेख का विषय बनाया है। इन आलेखों को पढ़ने से पाठक नाटक की पूरी पृष्ठभूमि और इसके हक़ में आये फ़ैसले से बेहतर तरीके से वाकिफ़ होते हैं।

मिथिलेश श्रीवास्तव ने स्वतंत्रता संग्राम में कला की भूमिका पर अपनी क़लम चलाई है और बतलाया है कि किस तरह विभिन्न कलाकार और कलाएं देशवासियों को जागरूक करने का अहम काम कर रही थीं।

विशेषांक में दक्षिण भारत की नुमाइंदगी न के बराबर है। महज़ एक अध्याय में क्रांतिकारी लीडर अल्लुरि सीताराम राजू पर लेख शामिल है। ‘1916 की लखनऊ सभाएं’ पर एक गुप्त रिपोर्ट से भी पाठक नये पहलुओं से परिचित होते हैं। परतन्त्रता के दौरान जिन कहानियों, कविताओं और नज़्मों को अंग्रेजी हुकूमत के दमन और पाबंदियों का सामना करना पड़ा, वे सब पत्रिका में शामिल हैं।

प्रेमचंद के अलावा पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, विशम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’, सज्जाद ज़हीर, अहमद अली की कहानियां और रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला खां, इक़बाल, अली सरदार जाफ़री, मखदूम, जांनिसार अख़्तर, साहिर लुधियानवी, सागर निज़ामी आदि की नज़्मों, ग़ज़लों से यह अंक कुछ ख़ास बन पड़ा है।

यह रचनाएं हमें बतलाती हैं कि विषम परिस्थितियों में भी हमारे अदीब, शायर किस दिलेरी से अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे थे। अंग्रेजी हुकूमत के दमन और पाबन्दियों की परवाह न करके, वे अपनी रचनाओं से देशवासियों को बेदार कर रहे थे।

वाक़ई यह एक अहमतरीन विशेषांक है, जो लंबे अरसे तक याद रखा जाएगा। एक ऐसे दौर में जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहले से कहीं ज़्यादा पहरे हैं, लिखने वालों को सच लिखने से पहले दस बार सोचना पड़ रहा है, ‘उत्तर प्रदेश’ पत्रिका के ‘जब्तशुदा साहित्य’ विशेषांक से उन्हें निश्चित तौर पर प्रेरणा मिलेगी।

पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता की हां में हां मिलाना और उसका बचाव करना नहीं, बल्कि उसके जन विरोधी निर्णयों की मुख़ालफ़त और अवाम के हक़ों की पैरवी करना है। यदि हम अपने अतीत से सबक़ लेंगे, तो हमारा मुस्तक़बिल भी उजला होगा। वरना, हम एक बार फिर गुलाम होने के लिए अभिशप्त होंगे।

(ज़ाहिद ख़ान रंगकर्मी और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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