Friday, January 27, 2023

जन्मदिन विशेष: साहिर के नग़मों में सियासी और समाजी नज़रिया

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साहिर लुधियानवी को अपनी नज़्मों से देश-दुनिया में ख़ूब मक़बूलियत मिली। अवाम का ढेर सारा प्यार मिला। कम समय में इतना सब मिल जाने के बाद भी साहिर के लिए रोजी-रोटी का सवाल वहीं ठिठका हुआ था। मुल्क की आज़ादी के बाद, अब उन्हें नई मंज़िल की तलाश थी। साहिर की ये तलाश फ़िल्मी दुनिया पर ख़त्म हुई। वे सपनों की नगरी बंबई आ गए। माया नगरी में जमना उनके लिए आसान काम नहीं था। संघर्ष के इस दौर में आजीविका के लिए साहिर ने कई छोटे-मोटे काम किए। ‘आज़ादी की रात’ (साल 1949) वह फ़िल्म थी, जिसमें उन्होंने पहली बार गीत लिखे। इस फ़िल्म में उन्होंने चार गीत लिखे। लेकिन अफ़सोस न तो ये फ़िल्म चली और न ही उनके गीत पसंद किए गए। बहरहाल फ़िल्मों में कामयाबी के लिए उन्हें ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा। साल 1951 में आई ‘नौजवान’ उनकी दूसरी फ़िल्म थी। एसडी बर्मन के संगीत से सजी इस फिल्म के सभी गाने सुपर हिट साबित हुए। फिर नवकेतन फ़िल्मस की फिल्म ‘बाजी’ आई, जिसने साहिर को फ़िल्मी दुनिया में बतौर गीतकार स्थापित कर दिया। इत्तेफ़ाक़ से इस फ़िल्म का भी संगीत एसडी बर्मन ने तैयार किया था। आगे चलकर एसडी बर्मन और साहिर लुधियानवी की जोड़ी ने कई सुपर हिट फ़िल्में दीं। ‘सजा’, ‘जाल’, ‘बाजी’, ‘टैक्सी ड्राइवर’, ‘हाउस नं. 44’, ‘मुनीम जी’, ‘देवदास’, ‘फंटूश’, ‘पेइंग गेस्ट’ और ‘प्यासा’ वह फ़िल्में हैं, जिनमें साहिर और एसडी बर्मन की जोड़ी ने कमाल का गीत-संगीत दिया है। फिल्म ‘प्यासा’ को भले ही बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी न मिली हो, लेकिन इसके गीत ख़ूब चले। ये गीत आज भी इसके चाहने वालों के होठों पर ज़िंदा हैं। फ़िल्मी दुनिया में गानों के एवज में साहिर को बेशुमार दौलत और शोहरत मिली।

हिंदी फ़िल्मों में साहिर लुधियानवी ने दर्ज़नों सुपरहिट नग़मे दिए। उनके इन नग़मों में भी अच्छी शायरी होती थी। साहिर के आने से पहले हिंदी फ़िल्मों में जो गाने होते थे, उनमें शायरी कभी-कभार ही देखने में आती थी। लेकिन जब फ़िल्मी दुनिया में मजरूह सुल्तानपुरी, कैफ़ी आज़मी और साहिर आये, तो फ़िल्मों के गीत और उनका अंदाज़ भी बदला। गीतों की ज़बान बदली। हिंदी, उर्दू से इतर गीत हिंदुस्तानी ज़बान में लिखे जाने लगे। इश्क-मोहब्बत के अलावा फ़िल्मी नग़मों में समाजी-सियासी नज़रिया भी आने लगा। इसमें सबसे बड़ा बदलाव साहिर ने किया। अपने फ़िल्मी गीतों की किताब ‘गाता जाए बंजारा’ की भूमिका में साहिर लिखते हैं,‘‘मेरी हमेशा यह कोशिश रही है कि यथा संभव फ़िल्मी गीतों को सृजनात्मक काव्य के नज़दीक ला सकूं और इस तरह नए सामाजिक और सियासी नज़रिये को आम अवाम तक पहुंचा सकूं।’’ साहिर की ये बात सही भी है। उनके फ़िल्मी गीतों को उठाकर देख लीजिए, उनमें से ज़्यादातर में एक विचार मिलेगा, जो श्रोताओं को सोचने को मज़बूर करता है। ‘‘जिन्हें नाज़ है हिंद पर’’, ‘‘ये तख़्तों ताजों की दुनिया, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो’’ (प्यासा) आदि ऐसे उनके कई गीत हैं, जिसमें ज़िंदगी का एक नया फ़लसफ़ा नज़र आता है। ये फ़िल्मी गीत अवाम का मनोरंजन करने के अलावा उन्हें शिक्षित और जागरूक भी करते हैं। उन्हें एक सोच, नया नज़रिया प्रदान करते हैं।

साहिर एक ग़ैरतमंद शायर थे। अपनी कला और स्वाभिमान से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। फ़िल्मी दुनिया में अब तो ये जैसे एक रिवायत बन गई है कि पहले संगीतकार गीत की धुन बनाता है, फिर गीतकार उस धुन पर गीत लिखता है। पहले भी ज़्यादातर संगीतकार ऐसा ही करते थे, लेकिन साहिर लुधियानवी अलग ही मिट्टी के बने हुए थे। वे इस रिवायत के ख़िलाफ़ थे। अपने फ़िल्मी करियर में उन्होंने हमेशा गीत को धुन से ऊपर रखा। पहले गीत लिखा और फिर उसके बाद उसका संगीत बना। अपनी फ़िल्मी मसरूफ़ियत की वजह से साहिर लुधियानवी अदब की ज़्यादा ख़िदमत नहीं कर पाए। लेकिन उन्होंने जो भी फ़िल्मी गीत लिखे, उन्हें कमतर नहीं कहा जा सकता। उनके गीतों में जो शायरी है, वह बेमिसाल है। जब उनका गीत ‘‘वह सुबह कभी तो आएगी….’’ आया, तो यह गीत मेहनतकशों, कामगारों और नौजवानों को ख़ासा पसंद आया। इस गीत में उन्हें अपने जज़्बात की अक्कासी दिखाई दी। मुंबई की वामपंथी ट्रेड यूनियनों ने इस गीत के लिए साहिर को बुलाकर उनका सार्वजनिक अभिनंदन किया और कहा, ‘‘यह गीत हमारे सपनों की तस्वीर पेश करता है और इससे हम बहुत उत्साहित होते हैं।’’ ज़ाहिर है कि एक गीत और एक शायर को इससे बड़ा मर्तबा क्या मिल सकता है। ये गीत है भी ऐसा, जो लाखों लोगों में एक उम्मीद जगा जाता है। गीत दो हिस्सों में है। गीत के पहले हिस्से में एक उम्मीद है, ‘‘वह सुबह कभी तो आएगी/…..बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर, यह भूख के और बेकारी के/टूटेंगें कभी तो बुत आखिर, दौलत की इजारेदारी के/जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी।’’, तो दूसरे हिस्से में यह उम्मीद, एक पक्के इरादे में बदल जाती है, ‘‘वह सुबह हमीं से आएगी/जब धरती करवट बदलेगी, जब कैद से क़ैदी छूटेंगे/जब पाप घरौंदे फूटेंगे, जब जुल्म के बन्धन टूटेंगे/उस सुबह को हम ही लाएंगे, वह सुबह हमीं से आएगी।’’

फ़िल्म ‘नया दौर’ के एक और गीत में मेहनतकशों को आह्वान करते हुए साहिर ने लिखा,‘‘साथी हाथ बढ़ाना/….जो कुछ इस दुनिया में बना है, बना हमारे बल से/कब तक मेहनत के पैरों में दौलत की जंजीरें ?/हाथ बढ़ाकर छीन लो अपने ख़्वाबों की तस्वीरें।’’ आज़ादी के बाद मुल्क के सामने अलग तरह की चुनौतियां थीं। इन चुनौतियों का सामना करते हुए साहिर ने कई अच्छे गीत लिखे। लेकिन उनके सभी गीतों में एक विचार ज़रूर मिलेगा। जिस विचार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी, उसी विचार को उन्होंने अपने गीतों के ज़रिए आगे बढ़ाया। उनका एक नहीं, कई ऐसे गीत है, जिसमें उनकी विचारधारा मुखर होकर सामने आई है। फ़िल्मी दुनिया में भी रहकर उन्होंने अपनी विचारधारा से कभी समझौता नहीं किया। मेहनतकशों और वंचितों के हक में हमेशा साथ खड़े रहे। ‘‘अब कोई गुलशन न उजड़े, अब वतन आजाद है/..दस्तकारों से कहो, अपनी हुनरमंदी दिखायें/उंगलियां कटती थीं जिस की, अब वो फ़न आज़ाद है।’’ गोया कि साहिर लुधियानवी को फ़िल्मों में जहां भी मौका मिला, उन्होंने अपनी समाजवादी विचारधारा को गीतों के ज़रिए आगे बढ़ाया। मिसाल के तौर पर उनके इस गीत पर नज़र डालिए, ‘‘धरती मां का मान, हमारा प्यारा लाल निशान !/नवयुग की मुस्कान, हमारा प्यारा लाल निशान/पूंजीवाद से दब न सकेगा, ये मजदूर किसान का झंडा/मेहनत का हक लेके रहेगा, मेहनतकश इंसान का झंडा।’’आज इस तरह के सोशल नग़मों का फ़िल्मों में तसव्वुर भी नहीं कर सकते। यदि आज कोई शायर या गीतकार इस तरह के गीत लिखना भी चाहे, तो सेंसर बोर्ड उस पर पाबंदी लगा दे। कट्टरपंथी और तंगनज़र लोग गीत के ख़िलाफ़ फ़तवे ज़ारी कर दें।

साहिर लुधियानवी साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के साथ-साथ साम्प्रदायिकता के भी कड़े विरोधी थे। अपनी नज़्मों और फ़िल्मी गीतों में उन्होंने साम्प्रदायिकता और संकीर्णता का हमेशा विरोध किया। अपने एक गीत में वे हिन्दोस्तानियों को एक प्यारा पैग़ाम देते हुए लिखते हैं,‘‘तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा/इंसान की औलाद है इंसान बनेगा/मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया/हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया।’’ साहिर लुधियानवी महिला-पुरुष समानता के बड़े हामी थे। औरतों के ख़िलाफ़ होने वाले किसी भी तरह के अत्याचार और शोषण का उन्होंने अपने फ़िल्मी गीतों में जमकर प्रतिरोध किया। हिन्दुस्तानी समाज में औरतों के क्या हालात हैं ?, जहां इसका उनके गीतों में बेबाक चित्रण मिलता है, तो वहीं इन हालात के ख़िलाफ़ एक गुस्सा भी है। फ़िल्म ‘‘साधना’ में साहिर द्वारा रचित इस गीत को औरत की व्यथा-कथा का जीवंत दस्तावेज कहा जाए, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी,‘‘औरत ने जनम दिया मर्दों को/मर्दों ने उसे बाज़ार दिया/जिन सीनों ने इनको दूध दिया, उन सीनों का व्यापार किया/जिस कोख़ में इनका जिस्म ढला, उस कोख़ का कारोबार किया/जिस तन में उगे कोंपल बनकर, उस तन को जलीलो-ख़्वार किया।’’

महिलाओं की मर्यादा और गरिमा के विरुद्ध जो भी बातें हैं, साहिर ने अपनी गीतों में इसका पुरजोर विरोध किया। औरतों के दुःख-दर्द को वे अच्छी तरह से समझते थे। यही वजह है कि उनके गीतों में इसकी संजीदा अक्कासी बार-बार मिलती है। फ़िल्म ‘‘प्यासा’ के एक गीत में साहिर ने खोखली परंपराओं, झूठे रिवाज़ों और नारी उत्पीड़न को लेकर जो सवाल खड़े किए है, वह आज भी प्रासिंगक हैं, ‘‘ये कूचे ये नीलामघर दिलकशी के/ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के/कहां हैं ? कहां हैं ? मुहाफ़िज़ ख़ुदी के ?’’ वहीं फिल्म ‘‘वह सुबह कभी तो आएगी’ में वे दुनिया की आधी आबादी के लिए पूरी आज़ादी का तसव्वुर कुछ इस तरह से करते हैं,‘‘दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जायेगा/चाहत को न कुचला जाएगा/गैरत को न बेचा जायेगा/अपनी काली करतूतों पर जब यह दुनिया शर्माएगी।’’ किताब ‘तल्ख़ियां’, ‘परछाईयां’ और ‘आओ कि कोई ख़्वाब बुने’ में जहां साहिर लुधियानवी की ग़ज़लें और नज़्में संकलित हैं, तो ‘गाता जाए बंजारा’ किताब में उनके सारे फ़िल्मी गीत एक जगह मौजूद हैं।  साहिर लुधियानवी को अवाम की ख़ूब मुहब्बत मिली और उन्होंने भी इस मुहब्बत को गीतों के मार्फ़त अपने चाहने वालों को बार-बार सूद समेत लौटाया। आज भले ही साहिर लुधियानवी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ग़ज़लें, नज़्में और नग़में मुल्क की फ़िज़ा में गूंज-गूंजकर इंसानियत और भाईचारे का पाठ पढ़ा रहे हैं।

ज़ाहिद ख़ान का लेख

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