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फिल्म छपाकः देह से अलग स्त्री सौंदर्य दिखाने का प्रयास

मेघना गुलज़ार निर्देशित ‘छपाक’ स्त्री सौंदर्य का एक ऐसा प्रतिमान स्थापित करती है, जो आज से पहले हिंदी सिनेमा में कभी किसी निर्देशक ने और न ही किसी अभिनेता-अभिनेत्री ने स्थापित करने का साहस किया था।

राज कपूर ने ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ (1978) में नायिका रूपा (ज़ीनत अमान) की कुरूपता को उसकी सेक्सुअलिटी के माध्यम से ढकने का प्रयास किया था, जो एक भद्दा प्रयास थ। इससे भी पहले ‘मेरी सूरत तेरी आंखें’ (1963) में अशोक कुमार को बदसूरत दिखाया गया था, लेकिन उसकी गायकी भी उसकी बदसूरती को ढक देती है, लेकिन ‘छपाक’ की नायिका मालती (दीपिका पाडुकोण) जिसका चेहरा एसिड फेंककर विकृत कर दिया गया था, सात सर्जरी के बावजूद जो अपने चेहरे के उस सौंदर्य के दसवें हिस्से को भी हासिल नहीं कर पायी थी, जो एसिड फेंके जाने से पहले था, उसके उसी चेहरे का सौंदर्य फ़िल्म में निरंतर निखरता चला जाता है।

अपने जले हुए चेहरे के साथ वह लगभग पूरी फ़िल्म के दौरान दर्शकों के सम्मुख मौजूद रहती है: दुखी, उदास, चीखती, रोती, हंसती, मुस्कराती, जीवन से निराश और जीने के पूरे जज्बे के साथ अपने आप से संघर्ष करते हुए जो मालती हमारे सामने आती है, उसके चेहरे की कुरूपता को उसकी आत्मा का सौंदर्य ढक लेता है।

दर्शक उसके चेहरे की कुरूपता देख ही नहीं पाते, क्योंकि वह कुरूपता उनके सामने बहुत थोड़े समय के लिए आती है, धीरे-धीरे उसके मन की निर्मलता उस चेहरे पर छाने लगती है और फिर आत्मा का सौंदर्य उसकी जगह ले लेता है।

ऐसे भयावह हादसे की शिकार मालती को एक त्रासद स्त्री की तरह नहीं बल्कि एक सहज और सरल स्त्री की तरह पेश किया गया है। वह चाहती है कि जिसने उसके चेहरे पर तेजाब डाला है कानून उसे कठोर से कठोर सजा दे, लेकिन एक क्षण के लिए भी ऐसा नहीं लगता कि उसमें प्रतिशोध की भावना है।

इसके विपरीत वह अपने घर-परिवार को लेकर चिंतित होने लगती है। उसे छोटी-मोटी नौकरी मिल जाए और वह अपने परिवार की मदद कर सके। जब वह अमोल (विक्रांत मैसी) के संपर्क में आती है, उसे काम भी मिल जाता है तो वह अपनी तरह एसिड की शिकार लड़कियों की चिंता करने लगती है और उनकी भी जो भविष्य में शिकार हो सकती हैं और वह अपनी ज़िंदगी का मकसद एसिड की खुली बिक्री पर रोक लगाने का कानून बनवाने को बना लेती है। वह अपने इस मकसद में अकेली नहीं है। लेकिन वह एक सीधी-सादी लड़की है।

वह न तो व्यवस्था के जटिल तंत्र को समझती है और न ही पुरुष वर्चस्व वाले समाज के उलझे ताने-बाने को, लेकिन वह चाहती है कि जिस भयावह हादसे से उसे गुजरना पड़ा, उससे और कोई न गुजरे। वह अपने आपको, अपने जैसी लड़कियों को और अपने आसपास की दुनिया को यह भी बताना चाहती है कि एसिड ने उसका सब कुछ छीन नहीं लिया है। उसकी हिम्मत, उसके जीने का जज्बा, दुख भरे पथरीले रास्ते में खुशियों के पल ढूंढ लेने की चाह और अपनी जैसी लड़कियों के दु:ख में शरीक होकर उनमें भी जीने की उमंग भरने की काबलियत उसके व्यक्तित्व को साधारण से असाधारण बना देती है।

फ़िल्म की खूबसूरती यही है कि वह चेहरे की बदसूरती को किसी पर भी हावी नहीं होने देती। और इसका काफी हद तक श्रेय दीपिका पादुकोन के संतुलित अभिनय को है, जिसने एक ऐसी चुनौती को स्वीकार किया जिसे स्वीकार करने का साहस बहुत कम अभिनेत्रियों में होगा।

व्यावसायिक सिनेमा की लोकप्रियता का एक जरूरी स्तंभ स्त्रियों का आभिजात्यपूर्ण और सेक्सुअल सौदर्य है। दीपिका पादुकोन की एक अभिनेत्री के तौर पर इससे पहले तक की सफलता में इसी सौंदर्य प्रतिमान का काफी हद तक योगदान रहा है। हालांकि बीच-बीच में वह कुछ ऐसी फ़िल्में भी करती रही हैं, जिसमें उसके दैहिक सौंदर्य से ज्यादा उसकी अभिनय क्षमता का योगदान रहा है। ‘पीकू’ भी एक ऐसी फ़िल्म थी जिसका कथानक गैरपरंपरागत और गैररोमांटिक था।

इस फ़िल्म में दीपिका पादुकोन ने एक ऐसी आधुनिक लड़की की भूमिका निभायी थी जो मध्यवर्गीय भारतीय स्त्रियों को घेरे रहने वाले निषेधों (टेबूज) से काफी हद तक अपने को मुक्त रखती है। इस तरह की भूमिका को स्वीकार करना कम चुनौतीपूर्ण नहीं था। और शायद पीकू की भूमिका की व्यापक स्वीकृति ने दीपिका को यह साहस दिया हो कि वह मालती का चरित्र न केवल निभाये बल्कि ‘छपाक’ जैसी चुनौतीपूर्ण फ़िल्म के निर्माण से भी अपने को जोड़े।

‘छपाक’ के रिलीज होने से दो दिन पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संघर्षरत छात्रों के बीच पहुंचना और उन्हें समर्थन देना उसके अपने दर्शकों पर यकीन को भी दर्शाता है। अभी फ़िल्मों से जुड़े युवा अभिनेता-अभिनेत्रियों, लेखकों, निर्देशकों का बड़ी संख्या में एकजुट होकर प्रतिरोध में सामने आना दर्शाता है कि ग्लैमर की जिस चकाचौंध घेरेबंदी में फ़िल्म के कलाकारों ने अपने को कैद कर रखा था, उसे वे अपनी सामाजिक पहलकदमियों द्वारा तोड़ रहे हैं। 

निश्चय ही इसमें उन युवा फ़िल्म निर्देशकों का बड़ा हाथ है जो फार्मूलाबद्ध फ़िल्मों की परंपरा से बाहर निकलकर ज्यादा समसामयिक और चुनौतीपूर्ण फ़िल्में बना रहे हैं और अपने कलाकारों को चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं निभाने के अवसर प्रदान करते हैं। मेघना गुलज़ार उनमें से एक है जिसने अपनी पिछली दोनों फ़िल्मों ‘तलवार’ और “राज़ी’ में यह साबित किया कि वह नये समय की और नये सोच की निर्देशक है। ‘छपाक’ उसी परंपरा में एक और मील का पत्थर  है।

‘छपाक’ एसिड हमले की शिकार एक लड़की की त्रासद कहानी ही नहीं है, वह उससे आगे जाकर उस लड़की के साहसपूर्ण संघर्ष की, उस संघर्ष को जीते हुए एक बड़े मकसद से अपने को जोड़कर अपने जीवन को एक सार्थक दिशा देने की कहानी भी है। यही इस फ़िल्म की ताकत भी है। मेघना गुलज़ार को इस बात का श्रेय भी जाता है कि फ़िल्म को व्यावसायिक रूप से कामयाब बनाने के प्रचलित फार्मूलों से परहेज किया।

भावुकता और नाटकीयता दोनों से बचते हुए उसके टोन को नियंत्रित रखा। मालती के जीवन की त्रासद विडंबना को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए मेघना यह बताना नहीं भूलतीं कि कड़े कानून कुछ हद तक ही सहायक हो सकते हैं। बहुत लाउड न होते हुए वह यह संदेश देने में कामयाब रहती हैं कि जब तक स्त्रियों  के प्रति पुरुष मानसिकता में बदलाव नहीं होता, तब तक एसिड हमले और रेप जैसे अपराध होते रहेंगे।

जवारिमल पारिख

This post was last modified on January 14, 2020 6:03 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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