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छत्तीसगढ़ में चारों तरफ रही आदिवासी दिवस की धूम, सभी जगहों पर उठा जल-जंगल और जमीन का सवाल

रायपुर। पूरे छत्तीसगढ़ में विश्व आदिवासी की धूम रही। गांव-गांव शहर-शहर सुप्रीम कोर्ट द्वारा वन भूमि से बेदखली का मुद्दा जोर शोर से इस वर्ष आदिवासी दिवस में  आदिवासियों ने उठाया। इस वर्ष छत्तीसगढ़ में सरकार ने विश्व आदिवासी के दिन छुट्टी की भी घोषणा की थी। इस मौके पर उनके नेताओं ने केंद्र सरकार पर आदिवासी विरोधी क्रियान्वयन और जल,जंगल ,जमीन के मालिकाना हक को हड़पने का भी आरोप लगाया। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग, सरगुजा संभाग, भिलाई में पारंपरिक वेशभूषा में आदिवासियों के जत्थों ने नृत्य करते अपने जल-जंगल जीमन को बचाने का प्रण लिया।

बस्तर संभाग, रायपुर, दुर्ग/भिलाई, कवर्धा, जशपुर के जिला मुख्यालयों से लेकर तहसील गांव तक छत्तीसगढ़ के अन्य क्षेत्रों में भी बाइक रैली, सभा समेत कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किए गए। परंपरागत नृत्य और आदिवासी लोक कलाओं से सजी विश्व आदिवासी दिवस की महफिल पूरी तरह से रंगीन हो गई। पारंपरिक वाद यंत्रों के साथ सड़कों पर नृत्य करते रैली निकली गयी।

जगह-जगह जल-जंगल-जमीन के संरक्षण को लेकर प्रण लिया गया। पूंजीवादी नीति के तहत कॉरपोरेट लूट जल, जंगल, जमीन के दोहन, आदिवासियों को दिए अधिकारों के हनन, संवैधानिक व्यवस्था को कायम रखने और नक्सल उन्मूलन के नाम पर आदिवासियों की हत्याओं को लेकर लड़ाई तेज करने की बात कही गई।

आपको बता दें कि विश्व के इंडीजेनस पीपुल (आदिवासियों) के मानवाधिकारों को लागू करने और उनके संरक्षण के लिए 1982 में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने एक कार्यदल (यूएनडब्ल्यूजीईपी) के उप आयोग का गठन हुआ जिसकी पहली बैठक 9 अगस्त 1982 को हुई थी और यूएन ने अपने गठन के 50वें वर्ष में यह महसूस किया कि 21 वीं सदी में भी विश्व के विभिन्न देशों में निवासरत आदिवासी समाज अपनी उपेक्षा, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा का अभाव, बेरोजगारी एवं बंधुआ व बाल मजदूरी जैसी समस्याओं से ग्रसित है।

अतः 1993 में यूएनडब्ल्यूजीईपी कार्यदल के 11 वें अधिवेशन में आदिवासी अधिकार घोषणा प्रारुप को मान्यता मिलने पर 1993 को आदिवासी वर्ष व 9 अगस्त को आदिवासी दिवस घोषित किया गया। और आदिवासियों को अधिकार दिलाने और उनकी समस्याओं के निराकरण, भाषा संस्कृति, इतिहास के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा 9 अगस्त 1994 को जेनेवा शहर में विश्व के आदिवासी प्रतिनिधियों का विशाल एवं विश्व का प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस सम्मेलन आयोजित किया गया।

आदिवासियों की संस्कृति, भाषा, आदिवासियों के मूलभूत हक को सभी ने एक मत से स्वीकार किया और आदिवासी भी बराबर का हक रखते हैं इस बात की पुष्टि कर दी गई। इसके साथ ही विश्व राष्ट्र समूह ने ” हम आपके साथ हैं ” यह वचन आदिवासियों को दिया। आश्चर्य इस बात का है कि घोषणा के इतने वर्ष बाद भी भारत के अधिकांश आदिवासियों और उनके जनप्रतिनिधि, समाज चिन्तक, बुध्दिजीवियों व अधिकारियों को पूर्ण रुप से यह ज्ञात भी नहीं हुआ कि आदिवासी दिवस क्या है?

आज भी प्राचीन विरासत और उससे जुड़े लोगों, संस्कृतियों, जीवन शैली, प्रकृति और इस अंतर्राष्ट्रीय दिवस का कोई नामलेवा नहीं है। इससे जनजातियों के प्रति भेदभाव स्पष्ट है। पर अब अपने अधिकारों को लेकर आदिवासियों में चेतना आ गई है। सोशल मीडिया ने यह जागरूकता बढ़ाई है।

(रायपुर से जनचौक संवाददाता तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट।)

This post was last modified on August 10, 2019 2:37 pm

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