Subscribe for notification
Categories: बीच बहस

कोरोना ने बनाया अपनों को बेगाना: बुजुर्ग मालिक को मिला सर्वेंट क्वार्टर तो एक पीड़ित को पड़ा इलाक़ा छोड़ना

पंजाब में कोरोना वायरस के चलते बीते 55 दिन से राज्य भर में जारी कर्फ्यू 18 मई को हट जाएगा। लॉकडाउन 31 मई तक जारी रहेगा। कर्फ्यू हटाने की विधिवत घोषणा मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने की है। देशव्यापी लॉकडाउन से पहले कर्फ्यू लगाने वाला पंजाब पहला राज्य था। सूबे ने इतना लंबा कर्फ्यू अतीत में कभी नहीं झेला। और न ऐसे नागवार हालात झेले जो अब दरपेश हैं। यक्ष प्रश्न है कि कर्फ्यू तो हट जाएगा लेकिन सामान्य जनजीवन आखिर पटरी पर कैसे आएगा?     

55 दिन की कर्फ्यू अवधि ने राज्य में जिंदगी से लेकर कारोबार तक, सब कुछ एकबारगी स्थगित कर दिया था। लुधियाना, अमृतसर, जालंधर महानगरों सहित अन्य कई शहरों की दिन-रात चलने वाली जिन फैक्ट्रियों अथवा औद्योगिक इकाइयों के गेट पर कभी ताले नहीं लगे थे, वहां एकाएक पूरी तरह सन्नाटा पसर गया। लाखों श्रमिक एक झटके में बेरोजगार हो गए और रोटी के लिए बेतहाशा बेजार। हर वर्ग की कमर टूट गई। लोग घरों में कैद होने को मजबूर हो गए। कोरोना-काल के कर्फ्यू ने पंजाबियों को बेशुमार जख्म भी दिए हैं। लाखों लोग भूख से बेहाल हुए तो हजारों अवसादग्रस्त। जिन्हें कोरोना तो क्या, मामूली खांसी-बुखार ने भी नहीं जकड़ा-वे स्थायी तनाव के गंभीर रोगी हो गए। तिस पर डॉक्टरों की  अमानवीय बेरुखी।

सरकार के कड़े आदेशों और सख्ती के बावजूद प्राइवेट अस्पतालों की ओपीडी आमतौर पर बंद ही रहीं। ब्लड प्रेशर और शुगर तक चेक नहीं किए गए। डॉक्टर मरीज को छूने तक से साफ इंकार करते रहे। मेडिकल हॉल के दुकानदार बाकायदा डॉक्टरों की भूमिका में आ गए। चिकित्सा जगत की उपेक्षा का नागवार नतीजा था कि कर्फ्यू के इन 55 दिनों में 2000 से ज्यादा लोग हृदय रोग, कैंसर, लीवर, किडनी और मधुमेह की बीमारियों से चल बसे। राज्य का स्वास्थ्य विभाग भी मानता है कि इससे पहले कभी इतनी अवधि में बीमारियों से लोगों ने दम नहीं तोड़ा। ईएनटी, आंखों और दांतों की बीमारियों के इलाज करने वाले क्लीनिक और अस्पताल एक दिन के लिए भी नहीं खुले। मनोचिकित्सक तो मानो भूल ही गए कि समाज के एक बड़े तबके को इन दिनों उनकी कितनी जरूरत है। गोया अवाम की जिंदगी बेमूल्य हो गई। अमीर और गरीब एक कतार में आ गए।                           

पंजाब में सवा सौ से ज्यादा मौतें कोरोना वायरस से हुईं हैं। संक्रमितों की संख्या हजारों में रही और वे एकांतवास में ठीक होकर घरों को लौट आए। लेकिन कोरोना मरीज होने का ठप्पा उन्हें निरंतर यातना दे रहा है। पंजाब के हर इलाके से उनके सामाजिक बहिष्कार की खबरें हैं। सामाजिक दूरी का संकल्प कोरोना वायरस से ठीक हुए मरीजों के लिए सामाजिक नफरत में तब्दील हो गया है। जालंधर और आसपास के इलाकों में इस पत्रकार ने कोरोना से ठीक होकर सही-सलामत लौटे कुछ मरीजों से मुलाकात में पाया कि वे मृत्यु के डर से तो निकल आए हैं लेकिन रिश्तेदारों और आस-पड़ोस के लोगों की घोर उपेक्षा उन्हें मनोरोगी बना रही है। दिनेश कुमार (बदला हुआ नाम) लगभग एक महीना एकांतवास में रहे। इलाज चला। अस्पताल में तो किसी ने क्या मिलने आना था, घर लौटे तो अपनों ने भी किनारा कर लिया।

पत्नी और बच्चों के सिवा कोई बात नहीं करता। जबकि घर में माता-पिता और दो भाई तथा उनके परिवार हैं। वह फफकते हुए कहते हैं, “कोरोना से ठीक हो कर घर लौटा तो उम्मीद थी कि सब खुश होंगे और तगड़े उत्साह के साथ मुझे गले लगाएंगे। लेकिन कोई मत्थे लगने तक को तैयार नहीं हुआ। जैसे ही मैं लौटा, मेरा भाई अपनी बीवी और बच्चों के साथ ससुराल चला गया। यह कहकर कि या तो यह यहां रहेगा या हम।” नवांशहर शहर के नसीब सिंह भी कोरोना को पछाड़कर सेहतमंद होकर अपनी लंबी-चौड़ी कोठी में लौटे तो बेटों ने उनका सामान पिछवाड़े के सर्वेंट क्वार्टर में रखा हुआ था और उनसे कहा गया कि अब वे वहीं रहेंगे। पिछले साल उनकी पत्नी का देहांत हो गया था। सारी जायदाद वह अपने दो बेटों के नाम कर चुके हैं। यह पत्रकार जब सर्वेंट क्वार्टर में कोठी के मालिक रहे नसीब सिंह से बात कर रहा था तो बारिश आ रही थी और सर्वेंट क्वार्टर की छत से पानी चू रहा था।

फर्श पर गंदगी का ढेर था और नसीब सिंह का लिबास बेहद मैला था। उन्होंने बताया कि जो नौकर आज से एक महीना पहले उनके आगे पीछे सेवा-टहल के लिए भागते-दौड़ते रहते थे, अब उनका निवास बना दिए गए सर्वेंट क्वार्टर में झांकने तक को तैयार नहीं और न कपड़े धोने को। खाने की थाली भी बाहर रख दी जाती है। एक पानी की सुराही भर दी जाती है। रूआंसे होकर नसीब सिंह कहते हैं, “मुझे कोरोना हुआ तो इसमें मेरा क्या कसूर। अब डॉक्टरों ने मुझे पूरी तरह फिट घोषित कर दिया है। बाकायदा इसका सर्टिफिकेट भी दिया है। लेकिन बच्चे मुझे अभी रोगी मानते हैं। मुझसे कौड़ियों जैसा सुलूक किया जा रहा है। मैं करोड़ों का साहिबे-जायदाद रहा हूं और इस बीमारी ने मुझे एकदम कंगाल बना दिया। बेटों को पास बुलाकर मैं उनसे बात करना चाहता हूं कि अगर उनकी यही मर्जी है तो मुझे वृद्ध आश्रम में दाखिल करवा दें लेकिन कोई पास खड़ा होने तक को तैयार नहीं। मुझसे मेरा फोन भी ले लिया गया है।”           

दिनेश कुमार और नसीब सिंह जैसी बदतर हालत ठीक हुए बेशुमार कोरोना मरीजों की है। लुधियाना में कोरोना वायरस से मरे एसीपी के परिजनों का पड़ोसियों ने आपत्तिजनक बहिष्कार किया और उस प्रकरण में स्थानीय पुलिस को दखल देनी पड़ी। उनके भांजे को ‘कोरोना फैमिली’ कहा गया और उस गली में जाने से रोका गया, जहां उनका अपना घर है। चार ऐसे मामले चर्चा में आए कि संक्रमण से मरे लोगों के शव उनके परिजनों ने लेने से दो टूक इनकार कर दिया। पुलिस-प्रशासन और सेहत महकमे को मृतकों के संस्कार और अंतिम रस्म में अदा करनी पड़ीं। किसी को श्मशान घाट के माली ने मुखाग्नि दी तो किसी को सफाईकर्मी ने। जबकि यह लोग भरे पूरे और संपन्न परिवार से थे।                                 

‘कोरोना फैमिली’ पंजाब में इन दिनों प्रचलित नया गालीनुमा मुहावरा है और यह किन के लिए इस्तेमाल किया जाता है, बताने की जरूरत नहीं। इस कथन के पीछे छिपी दुर्भावना व नफरत बेहद पीड़ादायक है। बल्कि यातना है। जालंधर के ही नीरज कुमार को उनके करीबी दोस्तों ने ‘कोरोना कुमार’ कहना शुरू किया तो वह गंभीर अवसाद रोगी बन गए। अब खुदकुशी की मानसिकता का शिकार हैं। वायरस से ठीक हुए एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि पड़ोसियों ने एकजुट होकर फैसला किया कि कभी हमारे घर नहीं आएंगे। वह कहते हैं, “लॉकडाउन और कर्फ्यू खुलते ही हम यह इलाका छोड़कर कहीं और घर खरीद लेंगे। दुकान का ठिकाना भी बदलना पड़ेगा।”                           

लॉकडाउन और कर्फ्यू के बीच पंजाब में बड़े पैमाने पर श्रमिकों का सामूहिक पलायन हो रहा है। उनकी भीड़ और दशा देख कर लगता है कि 1947 का विभाजन काल मई, 2020 में लौट आया है। जो श्रमिक घर वापसी के लिए प्रतीक्षारत हैं या फिलवक्त जा नहीं पा रहे उन्हें उनके मकान मालिक जबरन घरों-खोलियों से निकाल रहे हैं। उनसे मारपीट और छीना-झपटी रोजमर्रा का किस्सा है। यह हर शहर में हो रहा है। कहने को 55 दिन कर्फ्यू रहा लेकिन मजदूरों से अलग किस्म की हिंसा होती रही और हो रही है। जाने वाले प्रवासी श्रमिकों में से बहुतेरे ऐसे हैं जो मन और देह पर जख्म लेकर जा रहे हैं।             

लॉकडाउन और कर्फ्यू ने समाज का सारा ताना-बाना बदल दिया है। सामाजिक दूरियों ने दिलों की दूरियां भी बढ़ाईं हैं। इस बीच कई रिश्ते टूटे। बार-बार विवाह स्थगित होने से उपजे तनाव ने एक लड़की को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। कम से कम 10 आत्महत्याएं कोरोना वायरस की दहशत की देन हैं।

(अमरीक सिंह पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)        

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

Share