Friday, March 1, 2024

हैदराबाद गैंग रेपः गुनहगारों को सजा नहीं है एनकाउंटर

हैदराबाद एनकाउंटर के बाद जश्न का माहौल है। पुलिस को मिठाइयां खिलाई जा रही हैं। तेलंगाना के मंत्री कह रहे हैं कि जो कोई विरोध करेगा, वह राष्ट्र विरोधी होगा। बाबा रामदेव कह रहे हैं कि पुलिस और सुरक्षा बलों को हर ऐसे गुनहगार के साथ ऐसा ही करना चाहिए। फैसला ऑन स्पॉट।

एनकाउंटर कानूनी शब्द है। ऐसी परिस्थिति में यह पुलिस का एक्शन होता है जब ऐसा करना ही एकमात्र विकल्प रह गया हो। एनकाउंटर पर उंगली तब उठती है जब ये फर्जी होते हैं। हैदराबाद एनकाउंटर में ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है कि इसे फर्जी माना जाए। मगर, एनकाउंटर पर जो उल्लास दिख रहा है उसकी वजह यह नहीं है कि यह एक आम एनकाउंटर है। उसकी वजह ऐसी मान्यता है कि इससे महिला डॉक्टर के गुनहगारों को सज़ा मिल गई है, लेकिन क्या यह सच है?

महिला डॉक्टर से बलात्कार करने और बाद में जला देने के आरोपियों को सज़ा के तौर पर इस एनकाउंटर को देखा जा रहा है। क्या एनकाउंटर को सज़ा माना जा सकता है? क्या यह एनकाउंटर बलात्कार और हत्या के आरोपियों को सज़ा है?

पुलिस ने बलात्कार के चारों आरोपियों को इसलिए मारा है, क्योंकि वे पुलिस के चंगुल से भाग निकलने की कोशिश कर रहे थे। इसलिए नहीं कि वे बलात्कारी और हत्यारे थे। इसका मतलब ये है कि रेप के आरोपियों को सज़ा नहीं मिली है। सज़ा मिली है उनको जो पुलिस से छूटकर भागने की कोशिश कर रहे थे। अगर यह बारीक फर्क जनता महसूस कर पाती तो जश्न नहीं मना रही होती। जनता जश्न इसलिए मना रही है कि जो मारे गए हैं वे बलात्कारी और हत्यारे थे।

आरोपी दुर्घटना या हादसा में मारे गए होते तो क्या जश्न मनाती जनता? सोचिए अगर ये आरोपी आत्म हत्या कर लेते जैसा कि निर्भया मामले में भी एक आरोपी ने जेल में किया था, तो क्या यह मान लिया जाता कि न्याय हो गया? मान लीजिए कि ये आरोपी किसी दुर्घटना के शिकार हो जाते, तो क्या हम खुद को समझा पाते कि डॉ. रेड्डी के गुनहगारों को सज़ा मिल गई? इन सवालों का उत्तर है नहीं।

कहने का अर्थ ये है कि सामूहिक बलात्कार और हत्या का दंड जो होना चाहिए, वही होना चाहिए। न्यायिक प्रक्रिया के तहत साबित होते हुए सज़ा-ए-मौत। एनकाउंटर इसका दंड नहीं हो सकता।

दूसरा पहलू यह है कि अगर यह एनकाउंटर फर्जी है तो स्थिति और भी भयावह है। उस स्थिति में पुलिस को मिल रही मिठाइयां, उस पर हो रही पुष्प वर्षा और पुलिस के लिए लग रहे जयकारे एक कायरतापूर्ण घटना के लिए माना जाएगा। माना यह जाएगा कि जघन्य अपराध करने वालों के सामने सभ्य समाज हार गया। वह भी उस जैसा ही असभ्य हो गया।

दोनों ही स्थितियों में चाहे एनकाउंटर सही हो या फर्जी हो अपराधियों की मौत पर जश्न मनाने का मौका नहीं बनता। जश्न मनाने का मौका तब होता है जब अपराधियों को उनके मूल अपराध के लिए दंडित किया जाए, जब उन्हें न्यायपूर्ण तरीके से सज़ा दी जाए।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल विभिन्न न्यूज चैनलों के पैनल में उन्हें बहस करते देखा जा सकता है।)

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