मोदी तंत्र के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है भारतीय लोकतंत्र

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प्रधानमंत्री मोदी, उनके सिपहसालार अमित शाह और उनके राजनीतिक तथा वैचारिक अभिभावक आरएसएस ने शायद ही सोचा होगा कि 2021 का साल आते ही भारत का वह लोकतंत्र, जिसे उन्होंने सुला देने की दम भर कोशिश की थी, उठ कर खड़ा हो जाएगा तथा उनसे दो-दो हाथ करने लगेगा। उन्हें तो लगा था कि मीडिया के साथ मिल कर वे आक्सीजन व दवाई न मिलने से हो रही मौतों के आंकड़े छिपा लेंगे। उन्होंने सोचा था कि वैक्सीन कंपनियों को कमाने की छूट दे देंगे, टीकाकरण में विफलता का दोष राज्य की सरकारों पर मढ़ देंगे और बच निकलेंगे। उन्होंने तय किया था कि चुनाव आयोग को मिला कर बंगाल में आठ चरणों में मतदान कराएंगे, हजारों करोड़ खर्च करेंगे और जीत जाएंगे। लेकिन कोरोना से मरने के सवाल पर हाईकोर्टों तथा सुप्रीम कोर्ट ने घेर लिया और बंगाल के चुनावों में जनता ने हरा दिया। लोकतंत्र जिसकी छाती को पिछले सात साल से वे रौंद रहे हैं, 2021 में उठ खड़ा हुआ है और अपने कई रूपों में सामने आकर लड़ने लगा है।

दिल्ली की सीमा पर डटा किसानों का मोर्चा, कार्टूनों में मोदी का मजाक उड़ा रहे कार्टूनिस्ट तथा सोशल मीडिया पर उग आई वैकल्पिक पत्रकारिता उसी भारतीय लोकतंत्र के अलग-अलग रूप हैं जिसे खत्म कर एक नफरत और विषमता से भरे तंत्र को बनाने का सपना वे देख रहे हैं। हिंदी के लोकप्रिय शायर दुष्यंत कुमार के शब्दों में कहें तो धीरे धीरे मौसम बदलने लगा है। लेकिन कई सवालों को गहराई से देखना होगा।
पिछले साल बिना किसी इंतजाम के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन लगा दिया था और लोगों ने इसे खामोशी से उसी तरह सह लिया जिस तरह उन्होंने नोटबंदी को सहा था। सड़कों पर मीलों पैदल चल कर घर वापस आने की मार्मिक तस्वीरों का कोई असर केंद्र सरकार पर नहीं पड़ा। लोगों की आजीविका खत्म हो गई। लेकिन सरकार ने कुछ नहीं किया।

यही नहीं प्रधानमंत्री ने अयोध्या में राम मंदिर का भूमि-पूजन किया जिसका बरसों पहले शिलान्यास हो चुका था। हरिद्वार में कुंभ स्नान चलता रहा। मोदी-शाह की जोड़ी पूरे साल सरकार गिराने तथा भाजपा की सरकार बनाने में लगी रही। सीबीआई-ईडी तथा बाकी सभी संस्थाएं भाजपा की पार्टी इकाइयों की तरह काम करती रहीं। इस जोड़ी के लिए चुनाव लड़ना एक शगल हो गया है। हैदराबाद की महानगरपालिका से लेकर बिहार-बंगाल जैसे बड़े राज्यों के विधान सभा चुनावों तक वही दोनों नजर आने लगे। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली पार्टी का यह हाल हो गया है कि दोनों ने मिल कर जिसे चाहा उम्मीदवार बनाया,  जिसे चाहा नेता बना दिया। आसाम के मुख्यमंत्री कांग्रेस से हैं और बंगाल विधान सभा में विपक्ष के नेता तृणमूल से आयातित हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। लोभ-लालच के कारण या सीबीआई-ईडी के डर से आए लोग जगह-जगह आकर बैठते जा रहे हैं।  

कोरोना काल का कभी इतिहास लिखा जाएगा तो इतिहासकार सिर्फ गंगा में तैरती तथा किनारे की रेत मे दबी लाशों की चर्चा नहीं करेंगे, बल्कि इस बारे में भी बताएंगे किस तरह कुछ बड़ी कंपनियों के फायदे के लिए मोदी सरकार ने तीन कृषि कानून संसद में जैसे-तैसे पारित करा लिए। वे यह लिखेंगे कि मोदी ने सालों की लड़ाई से मजदूरों को हासिल अधिकार खत्म कर दिए तथा लेबर कोड लागू कर दिया। बीमारी में फंसे मुल्क से उसी तरह उसके ही खिलाफ लिखे गए दस्तावेजों पर सहमति ले ली गई जैसे बीमार आदमी से उसकी जायदाद लिखा ली जाती है। इतिहास यह भी दर्ज करेगा कि अडानी तथा सरकार के चहेते उद्योगपतियों ने कोरोना काल में कई गुना ज्यादा कमाई की। इसके उलट सामान्य लोगों की आमदनी खत्म हो गई या घट गई।

लेकिन किसी ने सोचा कि ऐसे कठिन दौर में भी मोदी-शाह की जोड़ी मस्त कैसे घूम रही है? पिछले सात सालों में भारतीय लोकतंत्र और इसके महान संविधान पर इस जोड़ी ने अनगिनत हमले किए हैं और उसे लहूलुहान कर दिया है। संविधान-निर्माता डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर ने कहां इसकी कल्पना की होगी कि सुप्रीम कोर्ट राम मंदिर से लेकर राफेल के मामलों में सरकार के मनमाफिक फैसला सुनाएगा और इसे सुनाने वाले चीफ जस्टिस रिटायरमेंट के बाद राज्य सभा में मनोनीत हो जाएंगे। उन्होंने कहां सोचा होगा कि जनता की आवाज का इतना ही असर रह जाएगा कि नागरिकता संशोधन कानून वापस लेने की मांग कर रही शाहीन बाग की उन महिलाओं को ही बदनाम किया जाएगा जो भयंकर ठंड को इस लिए बर्दाश्त कर रही थीं कि उन्हें भरोसा था कि भारत अभी भी अपने संविधान से चलता है। किसे इसका अंदाजा होगा कि तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमा पर लाखों किसान आ डटेंगे और सरकार उन्हें डराने-धमकाने से लेकर फूट डालने के वे सारे हथकंडे अपनाएगी जो अंग्रेज सरकार भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ अपनाती थी?

मौत के साए में जी रहे इस देश का प्रधानमंत्री बंगाल में ‘‘दीदी ओ दीदी’’ की भद्दी टिप्पणी तथा इसका गृह मंत्री ममता बनर्जी को उखाड़ फेंकने की घोषणा करने की हिम्मत इसलिए कर रहा था क्योंकि उसे भरोसा हो गया था कि उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की गर्दन दबा दी है।
लेकिन यह समझना बहुत जरूरी है कि दशकों तक भारतीय लोकतंत्र के साथ चलने वाली और उसके साथ ही बड़ी होने वाली पार्टी अपने बूते सत्ता में आते ही लोकतंत्र मिटाने में क्यों लग गई। वह इतने सालों तक पार्टियों के सत्ता में आने-जाने का खेल देखने के बाद भी ऐसी हिम्मत कहां से जुटा ले आई? इसके कारण ढूंढने के लिए हमें कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है।

हमें भाजपा के पीछे खड़े संगठन पर नजर डालनी होगी। आरएसएस की हिंदुत्व की विचारधारा में लोकतंत्र के बुनियादी उसूलों के लिए जगह नहीं है। उसे मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना है और भारतीय संस्कृति का नाम लेकर वह आपस में मेलजोल से रहने की सदियों पुरानी परंपरा को खत्म करना चाहता है। वह बराबरी के दर्शन के खिलाफ है। उसे उस लोकतंत्र तथा संविधान को समाप्त करना है जो आजादी के आंदोलन की विचारधारा पर आधारित है। यही वजह है कि पिछले सात सालों में इसके निशाने पर सबसे ज्यादा मुसलमान रहे क्योंकि संविधान की मूल भावना सेकुलरिज्म को खत्म करने के लिए यह जरूरी था। उन्हें निशाना बनाने के लिए तीन तलाक कानून और नागरिकता संशोधन कानून बनाए गए।

मोदी-भाजपा-संघ ने अपने बहुमत का इस्तेमाल लोकतांत्रिक संस्थाओं को ध्वस्त करने में इतनी सफाई से किया है कि तबाही के निशान दशकों बाद तक दिखाई देंगे। उन्होंने सिर्फ राजनीति के खुले मंच पर नाटक नहीं खेला है। लोकतंत्र पर असली हमला तो मंच के बाहर से हुआ है। आरएसएस की झूठ की पाठशाला से निकले बुद्धिजीवी और भाजपा के आईटी सेल के साथ सरकार, पार्टी और संघ ने जो हमले भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ पर किए हैं उसका दर्द बरसों रहेगा। उन्होंने भारतीय राजनीति में बहस की भाषा बदल दी। महिलाओं तथा नौजवानों को विनय-शील की शिक्षा देने वाले आरएसएस ने देश में गालियों और बदतमीजी वाली भाषा की ऐसी नाली बहाई है जिसकी बदबू जल्द नहीं जाएगी। असहमति के विचारों पर संगठित हमले का ऐसा दृश्य पहले कभी नजर नहीं आया था। जहां तर्क नहीं चला, वहां शारीरिक हमले पर उतर आए।

अगर गोरक्षक गोमांस के कारोबार पर हमले के नाम पर निर्दोष मुसलमानों की मॉब लिंचिंग कर रहे थे तो टीवी चैनलों पर बैठे प्रवक्ता विरोधी विचारों वाली पार्टी और व्यक्तियों को देशद्रोही बता कर उनकी डिजिटल लिंचिंग में लगे थे। एक ओर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रगतिशील परंपरा को ध्वस्त करने की कोशिश में कन्हैया कुमार तथा शेहला रसीद जैसे नौजवानों को टुकड़े-टुकड़े गैंग का नाम दिया जा रहा था तो दूसरी ओर नेहरू के व्यक्तित्व पर कालिख पोतने की कोशिश की जा रही थी। उनके बरसों सहयोगी रहे पटेल को उनके विरोध में खड़ा किया जा रहा था। नेहरू पर हमले का सिलसिला नीचता की सीमाओं को लांघ गया है। झूठ की इस हिंदुत्ववादी पाठशाला ने व्यक्तियों, दलों तथा विचारधारा पर इसी तरह के हमले किए हैं।

इन हमलों के खिलाफ व्यक्ति खड़े होने लगे हैं और संस्थाएं खड़ी होने लगी हैं। राजनीति के खुले मंच पर तो सब कुछ आसान है, लेकिन परदे के पीछे से काम कर रहे आरएसएस को बेनकाब किए बगैर लोकतंत्र बचाने की कोई लड़ाई संभव नहीं है। मोदी-तंत्र को असल में संघ चला रहा है। एक ऐसे संगठन से राजनीतिक लड़ाई आसान नहीं है जो सब कुछ करता है, लेकिन उसे जनता को किसी चीज का हिसाब देने की जरूरत नहीं है। वह चुनाव में भाग लेता है, उम्मीदवार तय करता है, वही फैसला करता है कि मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे और वही तय करता है कि योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होंगे। वह देश के भविष्य से जुड़े ऐसे महत्वपूर्ण फैसले लेता है, लेकिन उसके फैसलों के बारे में पूछने का हक देश के नागरिकों को नहीं है।

किसी ने सोचा कि प्रधानमंत्री मोदी प्रेस कांफ्रेंस क्यों नहीं करते हैं? उत्तर साफ है कि उन्हें प्रेस को जवाब देने की जरूरत नहीं है क्योंकि उन्हें सिर्फ आरएसएस के सवालों का जवाब देना है। साल 1979 में उठाया गया समाजवादी नेता मधुलिमये का यह सवाल आज भी प्रासंगिक है कि किसी राजनीतिक पार्टी का सदस्य किसी बाहरी संगठन के प्रति जवाबदेह कैसे हो सकता है? यह सवाल वाकई महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी राजनीतिक पार्टी का सदस्य होने का मतलब है कि आप संविधान तथा देश के नागरिकों के प्रति जवाबदेह हैं। आप जैसे ही एक ऐसे संगठन के प्रति जवाबदेह हो जाते हैं जिसे अपने फैसलों के लिए न तो संवैधानिक संस्थाओं को जवाब देना है और न ही देश के नागरिकों को, आप लोकतंत्र के बुनियादी उसूलों को तोड़ देते हैं। लोकतंत्र में सभी को जनता और संविधान के प्रति जवाबदेह होना है। जब लोकतंत्र की ताकतें मोदी-तंत्र से टकरा रही हैं तो उन्हें ऐसे हर सवाल को उठाना होगा।

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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